राष्ट्रीय राजमार्ग पर मधुबनी से दरभंगा की ओर हमारी इंडिका कार तेजी के साथ बढ़ती जा रही थी कि तभी कार के ड्राइवर सचिन ने कहा, ‘लालू प्रसाद के शासनकाल में तो इस सड़क पर मैं अपनी कार लाने की सोच भी नहीं सकता था। उन दिनों इस रास्ते की हालत इतनी खराब हुआ करती थी।’
इस पर गाइड प्रकाश झा जो यहीं का रहने वाला है, ने बताया, ‘लालू के राज में तो मैं भी आपको इस रास्ते से होकर गुजरने की सलाह नहीं देता। नहीं तो आप डकैतों के शिकार हो जाते।’ यह सिर्फ एक सचिन या प्रकाश की बात नहीं है।
चाहे पटना के फ्रेजर रोड पर हाथरिक्शा खींचने वाला सीताराम भगत हो या फिर समस्तीपुर जिले में बाणबिरा गांव का हरिंदर राय सभी का यही मानना है कि नीतीश सरकार ने अपने शासनकाल में काम किया है। दरअसल, राज्य में आम लोगों को अपने जीवन में अब दो ही महत्वपूर्ण बदलाव याद हैं।
एक तो 24 नवंबर, 2005 की तारीख जब राष्ट्रीय जनता दल के 15 साल के शासनकाल पर विराम लगाते हुए नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से सत्ता छीनी थी। और दूसरी राज्य में बेहतर कानून और शासन व्यवस्था। राज्य में रोजमर्रा की जिंदगी में भी जिस तेजी के साथ बदलाव देखने को मिला है, उससे सभी खुश नजर आ रहे हैं।
पटना में कृषिविद एन के राय कहते हैं, ‘अभी रात के 9 बजे हैं और मेरी पत्नी घर के बाहर है, पर मैं चिंतित नहीं हूं। लालू प्रसाद के राज में तो मैं सूरज ढलने के बाद उसे घर से बाहर कदम रखने भी नहीं दे सकता था। हम एक ही रात में अचानक से बदलाव की उम्मीद नहीं करते हैं, पर बदलाव के संकेत आने तो जरूरी हैं।’
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के शासनकाल में नवंबर 2008 तक बिहार में 10,311 पुलिसकर्मियों को तैनात किया जा चुका था। वर्ष 2001 में जहां हत्या के 3,519 मामले थे, वहीं 2008 सितंबर तक यह घटकर 2,286 रह गई थी। इसी अवधि में चोरी की घटनाएं 1,293 से घटकर 491 रह गई हैं।
राज्य सरकार की ‘2008 रिपोर्ट कार्ड’ के मुताबिक लालू प्रसाद के शासनकाल में अपहरण सबसे बड़ी समस्या थी जो इस अवधि में 385 से घटकर महज 42 रह गई हैं। एशियाई विकास शोध संस्थान (एडीआरआई) सदस्य सायबाल गुप्ता बताते हैं, ‘अब आपराधिक मामलों में सजा सुनाने के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। नीतीश कुमार खुद शस्त्र कानून के मामलों पर जोर दे रहे हैं।
इस कानून के मुताबिक कर्मचारियों को भी गवाह माना जा सकता है और इसे मान लेने के बाद अब अदालत में गवाहों के पलटने के मामले कम होते दिख रहे हैं।’ पटना में ही रिक्शा चलाने वाले राजकुमार को भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव नजर आने लगा है।
वह कहता है, ‘पहले हम रात के 8-9 बजे घर लौट जाया करते थे। पर अब हम रात के 11 बजे तक रिक्शा चला सकते हैं।’ कानून व्यवस्था जैसे कुछ मामलों पर जहां नीतीश सरकार ने अच्छा काम कर दिखाया है, वहीं कुछ ऐसे भी मामले हैं जहां सरकार को अब भी काफी कुछ करना बाकी है।
इस बारे में गुप्ता कहते हैं, ‘साल 2006 में ही भूमि सुधार आयोग तैयार किया गया था। इस बारे में रिपोर्ट जमा कराई जा चुकी है पर इस सिलसिले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। जमीन के रिकॉर्ड में ताजा आंकड़े अब तक नहीं जोड़े गए हैं।’
खुद नीतीश कुमार को इस बात का एहसास है कि उनके काम की सराहना की जा रही है और यही वजह है कि वह विपक्षी नेताओं पर प्रहार करने की बजाय विकास पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। नीतीश कुमार भी यह मानते हैं कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव पांच साल में एक बार ही होने चाहिए क्योंकि हर साल चुनाव कराने से विकास का कार्य प्रभावित होता है।
वहीं विपक्षी पार्टियां उनके विकास कार्यों से कुछ खास खुश नजर नहीं आती हैं। वामपंथी पार्टी के उम्मीदवारों की शिकायत है कि नीतीश कुमार का विकास कार्यक्रम कुछ ही जिलों तक सिमटा हुआ है। पर वे भी इसे पूरी तरह से खारिज नहीं कर पा रहे हैं कि नीतीश सरकार ने राज्य में कोई विकास का काम नहीं किया है।
राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी नीतीश कुमार पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने भाजपा को फायदा पहुंचाया है, पर कानून और व्यवस्था के बारे में वह कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं। हालांकि राज्य में बिजली व्यवस्था अभी भी चिंता का विषय है।
भले ही अपने रिपोर्ट कार्ड में नीतीश सरकार ने बिजली की व्यवस्था का अलग से जिक्र कर रखा है और यह बताया है कि नई बिजली परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है फिर भी हालत में और सुधार कर दरकार है।
अपने 48 पन्नों के रिपोर्ट कार्ड में नीतीश सरकार ने विकास की कई योजनाओं का जिक्र किया है। मगर विपक्षी दलों का मानना है कि इनमें से कई योजनाओं की अब तक ठीक तरीके से शुरुआत नहीं हो सकी है।