इस समाचारपत्र ने खबर दी है कि केंद्र सरकार सात नए द्रुतगामी रेल मार्गों के विकास की योजना बना रही है जिन पर करीब 10 लाख करोड़ रुपये की लागत आ सकती है। इनमें चेन्नई-मैसूर जैसे अधिक यातायात वाले मार्गों के अलावा दिल्ली-वाराणसी जैसे कुछ मार्ग भी शामिल हैं जिन्हें राजनीतिक वजहों से जोड़ा गया है। मुंबई और अहमदाबाद के बीच पहले से प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना पर ही 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक लागत आने का अनुमान है। वैसे इस परियोजना के लिए जापानी वित्तीय क्षेत्र से रियायती दर पर वित्त का इंतजाम किया जा रहा है। जहां तक नए द्रुतगामी मार्गों का सवाल है तो उनके लिए प्रति किलोमीटर दरें शहरी इलाकों में मेट्रो रेल चलाने के लिए जरूरी दरों के समकक्ष हैं। मेट्रो ट्रेन की दरें अपने आप में ही अधिक हैं लेकिन शहरी ढांचागत विकास के लिए उनकी खास जरूरत है।
सरकार की यह कोशिश प्रशंसनीय है लेकिन यह ध्यान भी रखना चाहिए कि वास्तविकता को नजरअंदाज न किया जाए। तीव्र गति वाले रेल नेटवर्क का विस्तार करने के पहले मौजूदा परियोजनाओं से मिले सबक को लेकर सवाल पूछे जाने चाहिए। मुंबई-अहमदाबाद मार्ग पहले ही विलंबित हो चुका है। इसका भविष्य भी खतरे में है क्योंकि महाराष्ट्र सरकार का रवैया काफी ठंडा है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इसे ‘सफेद हाथी’ बताते हुए पर्यावरण एवं आजीविका पर इसकी लागत और कर्ज के बोझ जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देने को कहा है। इतनी विशाल लेकिन विवादास्पद ढांचागत परियोजना पर राजनीतिक सहमति होना अनिवार्य है। लेकिन अभी तक इस पर सहमति नहीं बन पाई है। नदियों को जोडऩे वाली परियोजना की ही तरह द्रुतगामी रेल मार्गों के विकास पर भी सहमति बन पाना असंभव ही होगा, जब तक कि इसकी लागत की तुलना में इसके लाभ अधिक होने के पुख्ता साक्ष्य न हों। मुंबई-अहमदाबाद समेत आठ प्रस्तावित रेल मार्गों में से केवल दो मार्ग ही 300-500 किलोमीटर लंबे होंगे। हाई-स्पीड रेल के लिए इस दूरी को ‘स्वीट स्पॉट’ माना जाता है क्योंकि इस मार्ग पर चलने वाली ट्रेनें परिवहन के अन्य साधनों से प्रतिस्पद्र्धा कर सकती हैं।
दूसरे शब्दों में, द्रुतगामी रेल मार्गों में निवेश को राजनीतिक परिधि से अलग करते हुए इसका मूल्यांकन पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए। ऐसे किसी मूल्यांकन का पूर्वानुमान अधिक उम्मीद नहीं जगाता है। दुनिया भर में तमाम जगहों पर राजनीतिक कारणों, आशावादिता और आकांक्षा ने द्रुतगामी रेल नेटवर्क को गति दी है लेकिन आखिर में वे भारी कर्ज बोझ का ही सबब बने। बेहद सफल माने जाने वाले चीनी रेल नेटवर्क ने भी चाइना रेलवे पर करीब 800 अरब डॉलर का भारी-भरकम कर्ज ही लादा है जिसे चुकाने के बारे में उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। स्पेन का उदाहरण तो और भी अधिक शिक्षाप्रद है क्योंकि इसकी योजना कई दशक पहले बनाई गई थी। यह साफ नहीं है कि स्पेन ने अपने रेल नेटवर्क के विकास पर अब तक कितना खर्च किया है लेकिन वर्ष 2020 तक आंकड़ा करीब 140 अरब डॉलर होने का अनुमान है। लागत एवं लाभ का विस्तृत आकलन नहीं होने से हालिया सर्वेक्षणों में दिखा है कि यह रकम ऐसे नेटवर्क पर गलत खर्च की गई है जो ‘न तो समाज और न ही कारोबार के लिए फायदेमंद’ है। इस बीच स्पेन राजकोषीय टाइम बम की चपेट में है जिससे इसकी योजना लगातार खतरे में है, भले ही इसकी उधारी को यूरोपीय वित्तीय संस्थानों ने गारंटी दी हुई है।
ऐसी स्थिति में भारत सरकार को कई दशकों तक चलने वाली इस परियोजना पर कोई भी फैसला करने के पहले अपने कदम थोड़ा पीछे खींचकर विचार करना चाहिए। कम-से-कम इस परियोजना पर राजनीतिक सहमति बनाने के अलावा संभावित लागत एवं लाभ का स्पष्ट मात्रात्मक विश्लेषण करने की जरूरत है। ऐसी स्थिति में उसे मौजूदा रेल ढांचे के उन्नयन और कम दूरी एवं अधिक यातायात वाले मार्गों पर एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत रफ्तार बढ़ाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।