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दुनिया की मझोली ताकतों की दुविधा: क्या वे टेबल पर हैं या शिकार बन रहे हैं?

मार्क कार्नी का कहना है कि जो देश फैसले लेने की हैसियत में नहीं हैं, उन्हें अपने खिलाफ फैसले कबूल करने पड़ते हैं। समझा रहे हैं मिहिर शर्मा

Last Updated- February 05, 2026 | 9:33 PM IST
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इलस्ट्रेशन- अजय मोहंती

किसी केंद्रीय बैंक के प्रमुख से आप कभी आपसी संबंध बिगाड़ देने वाले और दुनिया हिला देने वाले भाषण की उम्मीद नहीं कर सकते। केंद्रीय बैंक संभालना ऐसा पेशा है, जिसमें लोगों को सिखाया जाता है कि कम से कम और जरूरत भर ही बोलना चाहिए और वह भी सहज तथा शांत भाव से बोलना चाहिए।

मार्क कार्नी इस वक्त बेशक कनाडा के प्रधानमंत्री हैं मगर वह केंद्रीय बैंकों की कमान भी संभाल चुके हैं। वास्तव में वह इतने बड़े बैंकर थे कि दो-दो केंद्रीय बैंकों ने उन्हें अपनी बागडोर सौंपी थी। लिहाजा दावोस में इस साल के विश्व आर्थिक सम्मेलन (डब्ल्यूईएफ) उनका इस कदर चर्चा में रहना अप्रत्याशित था।

कार्नी ने भाषण तो टेक्नोक्रेट के अंदाज में दिया मगर भाषण की विषय-वस्तु काफी उत्तेजक थी। उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि कैसे नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ‘अब उस तरह काम नहीं कर रही है, जैसी प्रचारित की गई थी’और कैसे आर्थिक दबाव दुनिया भर में नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्र सिद्धांतों पर तभी चल पाते हैं, जब ऐसे दबावों का उन पर कम असर पड़ता है।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संपर्क-संवाद में विविधता लाने का आह्वान किया। (इसके जवाब में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ऐलान कर दिया कि वह कनाडा पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने के बारे में सोच रहे हैं और इस तरह कार्नी की बात सही साबित हुई।) मगर उनके भाषण के मूल में दुनिया की ‘मझोली शक्तियों’ का सीधा आह्वान था। उन्होंने तर्क दिया कि मझोली ताकतों को एक साथ काम करना चाहिए क्योंकि,‘अगर हम फैसले लेने में हिस्सेदारी नहीं करेंगे तो फैसले हमारे खिलाफ ही होंगे’।

ये वे राष्ट्र थे जिन्होंने उस दौर से बहुत लाभ उठाया था जिसमें दुनिया पहले द्विध्रुवीय और फिर एकध्रुवीय बन गई थी। उस दौर में शीत युद्ध या प्रभाव जमाने में अमेरिका की सुस्ती ने ‘मानदंडों’ और नियम आधारित व्यवस्था की बात को सच कर दिया था। जैसा कार्नी ने कहा कि इनमें से कई राष्ट्र अब यह महसूस करने लगे हैं कि न तो भूगोल और न ही किसी गठबंधन की सदस्यता उन्हें भू-राजनीतिक उथल-पुथल से बचा सकती हैं।

साथ ही अकेले चलने की ताकत उनके पास नहीं है – न तो उनका बाजार इतना बड़ा है, न ही सैन्य क्षमता और न ही उनके पास दूसरों को अपनी शर्तों पर चलाने की कुव्वत है। दुनिया भर में एक जैसी चिंताओं वाले राष्ट्र अपनी ताकत और कमजोरियों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं और परख रहे हैं कि इस वैश्विक उथलपुथल का फायदा वे किस तरह उठा सकते हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका देश ऊर्जा संसाधनों और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण का इस्तेमाल कर जितना फायदा उठा सकता है उठाएगा (उन्होंने अपने पेंशन फंड को भी रणनीतिक संपत्ति बताया)।

बाकी राष्ट्र भी ऐसी ही तैयारी कर रहे हैं। इंडोनेशिया ने अपनी पूरी विदेश नीति निकल जैसे संसाधनों के आस-पास केंद्रित कर ली है और इस तरह की धातुओं के व्यापार पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल वह अपनी स्वायत्तता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश के भीतर निवेश बढ़ाने के लिए करना चाहता है। यूक्रेन-रूस संघर्ष के दौरान तुर्किये बड़ी होशियारी के साथ सभी पालों में खेलता रहा। साथ ही उसने अपने लिए एक विस्तृत एवं रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण ‘तुर्की क्षेत्र’दोबारा तैयार कर खुद को उसके केंद्र में रखने का प्रयास भी किया है। सऊदी अरब ने अपना विशाल खजाना कई परियोजनाओं में झोंक दिया है जिसका मकसद अपना रुतबा बढ़ाना है जिनमें यमन और सूडान में हस्तक्षेप से लेकर लाल सागर के किनारे निर्माण परियोजनाएं शामिल हैं।

उनमें से कई देशों के लिए यह अपरिचित और असहज करने वाली कवायद है। उदाहरण के लिए ब्रिटेन इस सोच से खुश नहीं है कि वह अब अकेले नहीं चल सकता है। इसका रुतबा दशकों पहले समाप्त हो चुका है मगर वह अब भी यही सोचता है कि उसका रसूख पहले की तरह बना हुआ है। ‘ब्रेक्सिट’ जैसा आत्मघाती कदम भी उसके इसी भ्रम का नतीजा था। ब्रिटेन अब अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच फंसा हुआ है मगर दोनों में से किसी को भी न तो उस पर भरोसा है औ ही कोई उसे सुरक्षा की गारंटी दे रहा है।

किसी भी देश के लिए यह समझने में नाकाम रहना बहुत बड़ा खतरा है कि उसका रुतबा या तो खत्म हो चुका है या अभी बना ही नहीं है। इस वजह से वे उन संस्थाओं को छोड़ देते हैं, जिन्होंने उनकी रक्षा की थी, जैसे ब्रिटेन यूरोपीय संघ से निकल गया। इस भ्रम की वजह से ही वे अपनी सैन्य तथा कूटनीतिक ताकत को भी बढ़ा-चढ़ाकर आंकने लगते हैं, जैसे रूस को 2022 में लगा और उसने यूक्रेन पर हमला कर दिया। रूस को इस सदी की शुरुआत में बेशक महाशक्ति माना जाता होगा मगर यूक्रेन युद्ध के बाद वह मझोली शक्ति बनकर रह जाएगा और आर्थिक रूप से चीन के नीचे ही रहेगा।

बेशक रूस के पास परमाणु हथियार हैं मगर उनका इस्तेमाल मोलभाव के लिए करने की उसकी आदत बिल्कुल वैसे ही है, जैसे तुर्किये डार्डानेल्स जलसंधि या शरणार्थी आबादी का इस्तेमाल करता है और इंडोनेशिया निकल और पाल तेल को अपनी ढाल बनाता है।

अहम बात यह है कि अमेरिका या शायद चीन के अलावा कोई भी राष्ट्र वास्तव में अकेले नहीं चल सकता। कोई भी अपरिहार्य नहीं है और हर किसी पर दबाव डाला जा सकता है। वे सुरक्षित तभी हो सकते हैं, जब वे अपनी रक्षा के लिए किसी प्रभावी समूह का हिस्सा बनते हैं। कार्नी के शब्दों में,‘ऐसा गठबंधन, जिसके सदस्य देशों में काफी कुछ इतना समान हो कि वे एक साथ मिलकर चलें और बारी-बारी हर मुद्दे पर काम करें।’

कार्नी ने तर्क दिया कि अमेरिका या चीन जैसी शक्तियों के साथ द्विपक्षीय बातचीत करने की कोशिश करना केवल ‘संप्रभुता का प्रदर्शन’ है क्योंकि आप कमजोर जमीन पर खड़े होकर बात करेंगे। ब्रिटेन का उदाहरण लीजिए, जिसे यह बात तब समझ आई, जब अमेरिकी शुल्कों का सवाल आया। ब्रिटेन में अब जवाबी कार्रवाई करने की वह कुव्वत नहीं है, जो यूरोपीय संघ के पास है, इसीलिए अमेरिका उसे जो भी दे स्वीकार करना पड़ता है।

ऐसे में भारत का क्या? निश्चित रूप से हम अब इस तरह की मझोली शक्ति नहीं रह गए हैं? विदेश मंत्री कह चुके हैं कि भारत ‘संतुलन स्थापित करने वाली’ शक्ति से ‘नेतृत्व करने वाली’ शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है।

मगर हमें पता है कि अचानक हमारे खिलाफ हो गए अमेरिका के सामने हम बेअसर हैं। हमें अपनी उत्तरी सीमा पर नई और प्रतिकूल यथास्थिति को भी स्वीकार करना पड़ा है तथा हम चीन से निवेश को बढ़ावा भी दे रहे हैं। महान शक्तियों के लिए कार्नी के तीन पैमानों (बाजार का आकार, सैन्य क्षमता और सौदेबाजी की ताकत) में से हमारे पास केवल एक है मगर हमारा बाजार भी इतना बड़ा नहीं है कि दुनिया में अपनी बातें मनवा सके। हमारे कमजोर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकड़े यह बता ही देते हैं।

दुनिया की मझोली शक्तियों को महाशक्ति की धमकियों के सामने एकजुट होना ही पड़ेगा। सबसे ज्यादा जोखिम सबसे छोटे देशों पर नहीं है बल्कि उन पर है, जो अकेले चलने की कोशिश कर रहे हैं। आज हम खुद को कुछ भी कह लें या एक-दो दशक बाद हम कहीं भी पहुंच जाएं, इतिहास के इस पड़ाव पर तो यही सलाह भारत पर भी लागू होती है।

First Published - February 5, 2026 | 9:26 PM IST

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