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तकनीकी तंत्र: मध्यम आमदनी के जाल की अनदेखी के मायने

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मार्च 2024 तक भारत के जीडीपी के लिए सबसे आशावादी अनुमान लगभग 4.1 लाख करोड़ डॉलर के आसपास है।

Last Updated- February 21, 2024 | 9:41 PM IST
तकनीकी तंत्र: मध्यम आमदनी के जाल की अनदेखी के मायने, Avoiding the middle-income trap

वर्ष 2018 में सरकार ने 2025 तक 5 लाख करोड़ डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। उस समय जीडीपी लगभग 2.7 लाख करोड़ डॉलर था जिसका मतलब यह है कि लक्ष्य हासिल करने के लिए लक्षित वृद्धि दर 9 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए। मार्च 2024 तक भारत के जीडीपी के लिए सबसे आशावादी अनुमान लगभग 4.1 लाख करोड़ डॉलर के आसपास है और 5 लाख करोड़ डॉलर का आंकड़ा पार करने की संभावना वर्ष 2027 के आसपास दिखाई दे रही है।

विश्व बैंक ने 2022 में जीडीपी का आकलन लगभग 3.4 लाख करोड़ डॉलर बताया था और कुछ अनुमान बताते हैं कि 2024 में जीडीपी 3.9 लाख करोड़ डॉलर के करीब है। यह लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ उचित भी लगता है (4.1 लाख करोड़ डॉलर का मतलब यह है कि वित्त वर्ष 2023 और वित्त वर्ष 2024 में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि दर होनी चाहिए)।

2025 तक 5 लाख करोड़ डॉलर का जीडीपी लक्ष्य भले ही हासिल करना मुश्किल दिखता हो, लेकिन लक्ष्य निर्धारित करते समय महत्त्वाकांक्षी होना हमेशा बुरी बात नहीं होती है। 5 लाख करोड़ डॉलर जीडीपी दरअसल प्रति व्यक्ति के हिसाब से 3,600-3,700 डॉलर के बराबर होगा, जिसे विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार ‘निम्न मध्यम आमदनी’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है क्योंकि यह 1,136 डॉलर और 4,465 डॉलर के दायरे में है।

वहीं ‘उच्च मध्यम आमदनी’ 4,466 डॉलर-13,845 डॉलर के दायरे में होती है और इससे ऊपर ‘उच्च आमदनी’ की श्रेणी मानी जाती है। अगर तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन प्रति व्यक्ति के लिहाज से 12,700 डॉलर के करीब है जो ‘उच्च मध्य आमदनी’ और ‘उच्च आमदनी’ के करीब जाता हुआ दिखता है।

सरकार में कई लोगों का आशावादी अनुमान है कि अर्थव्यवस्था 2030 तक 10 लाख करोड़ डॉलर के स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन वास्तविकता में ऐसा मुमकिन नहीं दिखता है, हां अगर अमेरिकी डॉलर बड़े पैमाने पर गिरा तब की बात और है। फिर भी, किसी बड़ी अप्रत्याशित घटना के बिना, भारत को 2030 के आसपास तक ‘उच्च मध्य आमदनी’ वाली श्रेणी में प्रवेश करना चाहिए। लेक‍िन ‘उच्च मध्यम आमदनी’ की श्रेणी काफी विस्तृत है। कई देश दशकों से इसी आमदनी वर्ग में फंसे रहते हैं और कुछ कभी भी ‘उच्च आमदनी’ की श्रेणी तक नहीं पहुंच पाते हैं। ‘उच्च मध्य आमदनी’ के दायरे में फंसे रहने के कई कारण हैं।

इसमें से एक कारण आधार प्रभाव है यानी जैसे-जैसे जीडीपी बढ़ता है तब उस वृद्धि दर को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। जब वृद्धि की रफ्तार धीमी होती है तब उत्पादकता में बढ़त मुश्किल होती जाती है। जनसांख्यिकीय बदलाव भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है। जब कोई देश ‘उच्च मध्य आमदनी’ के शीर्ष स्तर पर पहुंचता है तब आमतौर पर उसकी जनसंख्या वृद्धि कम हो जाती है और कार्यबल में बुजर्गों की संख्या बढ़ने के साथ ही उसका दायरा भी छोटा हो जाता है।

‘उच्च मध्य आय’ से ‘उच्च आय’ की श्रेणी तक पहुंचने के दौरान अपनी बाधाएं दूर करने वाले बड़े देशों में कुछ समानताएं होती हैं। ‘उच्च स्तर की आय’ की ओर बढ़ने वाले देशों में अक्सर शिक्षा, कानून का राज, सामाजिक सुरक्षा और खुली अर्थव्यवस्था पर जोर होता है। इन देशों में आमतौर पर आबादी उच्च शिक्षित होती है और यहां की शिक्षा प्रणाली भी उत्कृष्ट होती है जो उत्पादकता बढ़ाने की संभावनाओं को बेहतर बनाती है।

इन देशों में अच्छे कानून होते हैं और इन पर क्रियान्वयन भी बेहतर तरीके से होता है जिससे एक सुरक्षात्मक और कानूनी रूप से अनुकूल वातावरण बनता है। उनके यहां स्पष्ट और मध्यम श्रेणी की कर प्रणाली होती है जिन्हें ईमानदार अधिकारी समान रूप से लागू करते हैं। कई ‘उच्च आमदनी’ वाले देशों में अच्छी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं भी होती हैं और इनमें से कई की मुद्रा स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय मुद्रा होती हैं।

इनमें से ज्यादातर देशों में उच्च स्तर का लोकतंत्र हैं। फ्रीडम हाउस रैंकिंग के अनुसार, 2023 में 195 देशों में से 84 को ‘स्वतंत्र’ माना गया है, बाकी को ‘स्वतंत्र नहीं’ या ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ देश के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ‘स्वतंत्र’ देशों की सूची की तुलना विश्व बैंक की ‘उच्च आमदनी’ वाली सूची से करने पर, केवल अरब क्षेत्र के सऊदी अरब, ओमान, यूएई, कुवैत, और सिंगापुर ‘उच्च आमदनी’ की श्रेणी में आते हैं लेकिन वे स्वतंत्र देशों की श्रेणी में शामिल नहीं होते हैं।

इसकी वजह यह है कि अरब देशों के मामले में तेल की भूमिका अहम हो जाती है जबकि सिंगापुर एक छोटा, अत्यधिक कुशल देश है, जहां मुक्त बंदरगाह के साथ कर कम है और ईमानदार सरकार भी है। भारत में महिला श्रमबल भागीदारी बहुत कम है। अगर सामाजिक दृष्टिकोण बदलते हैं और अधिक महिलाएं काम करने आती हैं तब कार्यबल का विस्तार हो सकता है। भारत को वर्तमान में ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ जगह के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसकी रैंकिंग खराब ही हुई है।

इसके अलावा देश में लगातार कहीं न कहीं हिंसक संघर्ष चल रहा है, चाहे कश्मीर, मणिपुर, या छत्तीसगढ़ हो। इससे न केवल अस्थिरता पैदा होती है, बल्कि इंटरनेट बंद होने से डिजिटल अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। भारत में जटिल कर और वाणिज्यिक कानून हैं जिससे आर्थिक गतिविधियां और भी जटिल हो जाती हैं। भ्रष्टाचार भी एक व्यापक मुद्दा है।

जनसंख्या वृद्धि दर में कमी स्पष्ट रूप से दिख रही है। वहीं अधिकांश कार्यबल को 10 साल से कम की स्कूली शिक्षा मिली है। सवाल यह है कि दूरस्थ शिक्षा और शिक्षा प्रौद्योगिकी (एडटेक) के जरिये सुधार होगा? सामाजिक कल्याण के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवा पर खर्च कम किया जा रहा है। सख्त मुद्रा नियंत्रणों के कारण मुद्रा की मुक्त परिवर्तनीयता की उम्मीद कम है।

कारोबारी माहौल में बदलाव लाने के लिए व्यापक कानूनी और प्रशासनिक सुधारों की जरूरत है। इसके साथ ही भारत को रैंकिंग में ‘स्वतंत्र’ घोषित करने के लिए और भी बड़े प्रयास करने की आवश्यकता है। इन चुनौतियों को देखते हुए यह संभावना है कि भारत कुछ समय के लिए ‘उच्च मध्य आय’ वाली श्रेणी में बना रहेगा।

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First Published - February 21, 2024 | 9:40 PM IST

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