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अनगिनत फायदे देता रहेगा अंतरिक्ष अनुसंधान

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अंतरिक्ष की खोज में अनिश्चितता तो है और तत्काल फायदा मिलना भी जरूरी नहीं है। कई दशक बाद अंतरिक्ष की खोजबीन फायदेमंद कारोबार हो सकता है

Last Updated- March 19, 2025 | 10:42 PM IST
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पिछले दिनों अमेरिका के टेक्सस प्रांत के ह्यूस्टन की निजी कंपनी इंट्यूटिव मशीन्स ने चांद पर अपना मानव रहित यान एथेना उतार दिया। कंपनी ने यह कारनामा दूसरी बार किया है। टेक्सस की ही एक और कंपनी फायरफ्लाई एरोस्पेस भी इसी महीने अपना ब्लू गोस्ट यान चांद पर उतारने में सफल रही। इसके साथ ही वह निजी क्षेत्र की दूसरी कंपनी बन गई, जो चांद पर पहुंची है।

दोनों अभियान अमेरिका के नैशनल एरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेस कार्यक्रम का हिस्सा हैं। 2.6 अरब डॉलर के इस कार्यक्रम की लागत कम करने और आर्टेमिस अभियान में मदद करने के लिए नासा ने निजी उद्योग से हाथ मिलाया है। आर्टेमिस मानव को चांद पर दोबारा उतारने का अभियान है।

एथेना चांद पर बर्फ तलाशेगा और 4 जी नेटवर्क को आजमाएगा। साथ ही वह नया हॉपिंग ड्रोन ग्रेस (कंप्यूटर के क्षेत्र में अहम काम करने वाली शुरुआती शख्सियत ग्रेस हॉपर के नाम पर) और चांद पर चलने के लिए तीन रोवर भी उतारेगा। इससे पहले फरवरी 2024 में इंट्यूटिव मशीन्स का लैंडर ओडीसियस भी चंद्रमा की सतह पर उतरा था मगर ठीक से खड़ा नहीं रह पाया था। डर तो एथेना के भी ठीक ढंग से नहीं उतर पाने का है। दोनों लैंडर 4.8 मीटर ऊंचे और पतले हैं यानी जिराफ जितने ऊंचे। ज्यादातर लैंडर कम ऊंचाई वाले और चौड़े होते हैं क्योंकि इस तरह की बनावट का गुरुत्व केंद्र नीचा होता है और ये स्थिर खड़े रह सकते हैं।

लैंडर में कई तरह के उपकरण होते हैं, जिनमें निजी खर्च पर भेजे गए पेलोड (सामान या वैज्ञानिक उपकरण) और नासा के कई उपकरण रहते हैं। इन उपकरणों में लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर और कम फ्रीक्वेंसी वाला रेडियो रिसीवर भी है। रेट्रोरिफ्लेक्टर पृथ्वी से भेजी गई लेजर किरणों को वापस वहीं भेज देता है और रेडियो रिसीवर वहां मौजूद कणों में आवेश को मापता है।

एक रोवर नोकिया के नए राउटर का इस्तेमाल कर 4जी नेटवर्क स्थापित करने का प्रयास करेगा। यह राउटर सभी रोवर और लैंडर को आपस में जोड़ेगा। प्रयोग सफल रहा तो दूसरे चंद्रयानों में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा और आर्टेमिस मिशन को मोबाइल सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। आर्मेटिस मिशन के तहत एक स्टेशन चांद की परिक्रमा करता रहेगा और चांद की सतह पर एक प्रयोगशाला होगी, जिसमें मनुष्य काम करेंगे।

ग्रेस कूदते हुए तेजी के साथ एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकेगा। चांद मंगल की तरह नहीं है। मंगल पर नासा ने इनजेन्युइटी नाम का हेलीकॉप्टर सफलतापूर्वक उड़ाया था मगर चांद पर हवा नहीं होने के कारण रॉकेट के बगैर नहीं उड़ा जा सकता। ग्रेस ड्रोन इतनी गहरी घाटी में उतरेगा, जहां कभी सूर्य की रोशनी तक नहीं पहुंच पाई है। यह काम कर गया तो खोज करना और भी आसान हो जाएगा।

फायरफ्लाई के ब्लू गोस्ट लैंडर का मकसद दूसरा है। फायरफ्लाई चांद की सतह तक हरेक यात्रा में 150 किलोग्राम तक पेलोड ले जाएगा। यह मॉड्यूल बार-बार इस्तेमाल हो सकता है और मानवयुक्त अभियान के लिए सामान की जरूरतें पूरी करने में यह अहम भूमिका निभाएगा क्योंकि ऐसे अभियानों में अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक चांद पर ही रहते हैं। फायरफ्लाई से पहली खेप में कई वैज्ञानिक उपकरण भेजे गए थे। मिट्टी जांचने के साथ ही ब्लू गोस्ट रेडिएशन-रोधी गणना उपकरण भी वहां लगाएगा।

यह एक बड़ी सफलता हासिल कर भी चुका है। इसके एक परीक्षण के दौरान इटली की अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा बनाए गए नासा के लूनर जीएनएसएस रिसीवर एक्सपेरिमेंट (लूगर) ने पृथ्वी की कक्षा से भेजे गए जीपीएस सिग्लन सफलतापूर्वक ग्रहण किए हैं।
सैद्धांतिक तौर पर इसका मतलब यह है कि चांद में स्थानों का सटीक तरीके से पता लगाया जा सकता है और ग्रिड पर उतने ही सटीक तरीके से लगाया जा सकता है। यह काम काफी जटिल और महंगा होगा मगर इससे नक्शा तैयार करने और खोजबीन करने का काम बहुत बेहतर हो जाएगा। मोबाइल नेटवर्क से जुड़ने के बाद मनुष्य के लिए खोज करना काफी सुरक्षित हो सकता है और पृथ्वी तथा चांद के बीच यात्राओं की योजना सटीक ढंग से बनाने में मदद मिल सकती है।

चांद बेशक छोटा है मगर हमें नहीं पता कि इसका एक हिस्सा कैसा लगता है। कथित ‘अंधेरा हिस्सा’ (डार्क साइड) हमेशा से विपरीत दिशा में रहता है। चांद की सतह पर पानी नहीं होने के कारण इसकी सतह का क्षेत्रफल पृथ्वी के सतह वाले क्षेत्र का करीब एक चौथाई है, जबकि इसकी कुल सहत पृथ्वी के धरातल की बमुश्किल 7 प्रतिशत है।

आर्टेमिस का मकसद 2027 तक मनुष्य को चांद की कक्षा में बिठाना और मानवयुक्त अभियान को चांद पर उतार देना है। इसमें कुछ विलंब हो सकता है मगर स्पेसएक्स भी इन अभियानों में शामिल है, जिससे ईलॉन मस्क की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। इसलिए रकम की कमी तो नहीं होगी। आर्टेमिस में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और निजी भारतीय कंपनियों की भी हिस्सेदारी है।

अंतरिक्ष की खोज में अनिश्चितता तो है और तत्काल फायदा मिलना भी जरूरी नहीं है। कई दशक बाद अंतरिक्ष की खोजबीन फायदेमंद कारोबार हो सकता है किंतु निकट भविष्य में व्यावसायिक फायदा चाहिए तो बेहतर तकनीक अपनानी होगी और समझ भी गहरी करनी होगी।
अंतरिक्ष की खोज ने अब तक सौर ऊर्जा, रोबॉटिक्स, वैश्विक संचार और जलवायु विज्ञान की बेहतर समझ दी है। इसके अलावा कॉम्पैक्ट जिम उपकरण, ऑटोनॉमस वाहन, हाइड्रोपॉनिक्स, टेलीमेडिसिनऔर जीपीएस आदि भी हैं। अंतरिक्ष ऐसा तोहफा है, जो कुछ न कुछ देता ही रहता है।

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First Published - March 19, 2025 | 10:20 PM IST

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