देश के शेयर बाजार को जब उसकी सबसे बड़ी कंपनियों और निफ्टी 50 के लेंस से देखा जाता है तो वह संघर्षरत नजर आता है। लेकिन अगर हम छोटी कंपनियों की ओर देखें तो एक अलग तस्वीर नजर आती है। एक ऐसी तस्वीर जहां जबरदस्त वृद्धि है, मुनाफे का विस्तार हो रहा है और मांग में तेजी बनी हुई है। यहां एक विरोधाभास पर गौर करना जरूरी है।
वर्ष 2025-26 की मार्च तिमाही में निफ्टी 50 कंपनियों के परिचालन लाभ में केवल 4.1 फीसदी की सालाना वृद्धि हुई और शुद्ध लाभ में मात्र 4.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह लगातार आठवीं तिमाही थी जब कमाई में वृद्धि एक अंक में रही। इसके विपरीत व्यापक निफ्टी 500 सूचकांक की कंपनियों ने परिचालन लाभ में 9.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जबकि उनके समायोजित शुद्ध लाभ में 16 फीसदी की उछाल आई।
इस अंतर को और अधिक उल्लेखनीय बनाता है यह तथ्य कि दोनों समूहों ने लगभग 11-12 फीसदी की बिक्री वृद्धि दर्ज की लेकिन छोटी कंपनियां मार्जिन की बेहतर रक्षा करने और बढ़ती लागत को संभालने में सक्षम रहीं। भारत की सबसे बड़ी कंपनियों का प्रभुत्व भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। सभी सूचीबद्ध कंपनियों के लाभ में उनका हिस्सा लगातार घटा है। यह वित्त वर्ष 25 की चौथी तिमाही के 51.8 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही में 49.8 फीसदी और चौथी तिमाही में 47.1 फीसदी रह गया। पिछली तिमाहियों की तरह सबसे आकर्षक प्रदर्शन माइक्रोकैप कंपनियों से आया। उनकी बिक्री 17.5 फीसदी बढ़ी जबकि परिचालन लाभ 22 फीसदी से अधिक बढ़ा।
ऐसे मजबूत प्रदर्शन का लगातार बने रहना आश्चर्यजनक है क्योंकि व्यापक आर्थिक परिदृश्य बिगड़ गया है। पिछले महीने शुद्ध कर राजस्व 6.3 फीसदी गिर गया। ऐसा मुख्यतः माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की कमजोर प्राप्तियों के कारण हुआ। फिर भी कई छोटी कंपनियां फल-फूल रही हैं। इसका स्पष्टीकरण उस बदलाव में निहित है जिस पर विश्लेषकों और सतर्क निवेशकों के समुदाय के बाहर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
आज भारत के पास सूचीबद्ध छोटी कंपनियों का असाधारण रूप से समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र है जो उन क्षेत्रों में काम कर रही हैं जिनमें शक्तिशाली और दीर्घकालिक विकास चालक मौजूद हैं। फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग, कैपिटल गुड्स, रक्षा और पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
बिजली: देश की अनुमानित चरम बिजली मांग वर्ष 2032 तक लगभग 460 गीगावॉट तक पहुंचने की उम्मीद है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए पारेषण अधोसंरचना में भारी निवेश की आवश्यकता होगी। इसमें 1,20,000 सर्किट किलोमीटर से अधिक नई लाइनों, अतिरिक्त सब स्टेशनों और ग्रिड को धीरे-धीरे 220 किलोवोल्ट (केवी) से 400 केवी और 765 केवी नेटवर्क में उन्नत करना शामिल है।
सैद्धांतिक रूप से ही देखें तो आवश्यकता कई लाख करोड़ रुपये की है। फिर भी नियोजित व्यय का एक अंश भी उन स्मॉलकैप कंपनियों के लिए विशाल अवसर प्रस्तुत करता है जो ट्रांसफॉर्मर, स्विचगियर, सर्किट ब्रेकर, इंसुलेटर, वोल्टेज रेगुलेटर, कैपेसिटर, प्रोटेक्टिव रिले, केबल और स्मार्ट मीटर का निर्माण करती हैं।
फार्मास्युटिकल सेवाएं: यह विकास का एक और शक्तिशाली स्रोत है। भारत की कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट ऐंड मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (सीडीएमओ) और कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऐंड मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (सीआरएमओ) कम लागत वाले आपूर्तिकर्ताओं से वैश्विक दवा कंपनियों के रणनीतिक साझेदारों में विकसित हो चुकी हैं। अनुमान है कि भारतीय सीडीएमओ बाजार का आकार 19 अरब से 23 अरब डॉलर है जिसकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 12 फीसदी है।
यह कई वर्षों तक टिकाऊ हो सकती है। भारत के पास अमेरिका के बाहर सबसे अधिक यूएस-एफडीए अनुपालन वाले विनिर्माण संयंत्र हैं। यह उद्योग फार्मास्युटिकल दिग्गजों द्वारा नियंत्रित नहीं है। यह एक ज्ञान-गहन व्यवसाय है जिसमें छोटी, विशेषीकृत कंपनियां अक्सर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ रखती हैं।
डेटा सेंटर: डिजिटल अधोसंरचना की मांग लगातार बढ़ रही है और इस क्षेत्र के इस वर्ष लगभग 30 फीसदी तक विस्तार करने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 27 के लिए केंद्रीय बजट ने पात्र विदेशी क्लाउड सेवा प्रदाताओं को 2047 तक कर राहत देकर इस प्रस्ताव को और आकर्षक बना दिया। वैश्विक स्तर पर 2026 में डेटा सेंटर में 180 अरब डॉलर से अधिक निवेश होने की उम्मीद है। लाभ मुख्यतः विभिन्न उपकरणों, बिजली उपकरणों, प्रशीतन प्रणाली, केबलिंग और अन्य सहायक अधोसंरचना के आपूर्तिकर्ताओं को मिलता है। यहां भी अधिकांश लाभार्थी छोटी कंपनियां हैं।
इंजीनियरिंग (पूंजीगत वस्तु, रक्षा): सरकारी पूंजीगत व्यय, रक्षा स्वदेशीकरण, सरकारी पूंजीगत व्यय, रक्षा स्वदेशीकरण, परिशुद्ध उपकरणों की बढ़ती मांग, फैक्ट्री स्वचालन और निर्यात अवसरों ने मिलकर एक सतत विस्तार चक्र बनाया है। कई कंपनियां आने वाले वर्षों में दो अंकों की वृद्धि की उम्मीद कर रही हैं। कई कंपनियों के पास पहले से ही तीन साल तक विस्तारित ऑर्डर बुक हैं। बड़े संस्थागत निवेशकों विशेषकर विदेशी निवेशकों की नजर से अधिकांश अब भी दूर हैं।
सेवाएं: दशकों तक सूचीबद्ध सेवा कंपनियां मुख्यतः सॉफ्टवेयर निर्यातकों का पर्याय थीं। लेकिन बढ़ती आय, शहरीकरण और संपन्न मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं ने सूचीबद्ध सेवा व्यवसायों की एक बढ़ती श्रृंखला को जन्म दिया है जिसमें वित्त ( धन प्रबंधन, परिसंपत्ति प्रबंधन, ब्रोकरेज, बीमा, डिपॉजिटरी, रजिस्ट्रार, एक्सचेंज), स्वास्थ्य सेवा (जांचें, अस्पताल) और रिटेलिंग (ऐप डिलिवरी, रिटेल चेन, ऑनलाइन स्टोर) शामिल हैं। हर साल दर्जनों नई सेवा कंपनियां सूचीबद्ध क्षेत्र में आ रही हैं जिनमें से अधिकांश सूचकांकों से बाहर की छोटी कंपनियां हैं।
भारत की व्यापक आर्थिक चुनौतियां अब भी कठिन हैं। राजकोषीय स्थिति दबाव में है। अप्रैल में सब्सिडी 52 फीसदी बढ़ गई जो खाद्य और उर्वरक समर्थन में वृद्धि से प्रेरित थी। ब्याज भुगतान 18 फीसदी बढ़ा जबकि अन्य व्यय 27 फीसदी उछल गया। ऐसे दबाव निस्संदेह कुछ व्यवसायों को प्रभावित करेंगे, विशेषकर वे जो सरकारी अनुबंधों या विवेकाधीन सार्वजनिक खर्च पर निर्भर हैं। लेकिन दो बड़े बाहरी झटकों यानी पिछले वर्ष अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक व्यापार शुल्क और होर्मुज स्ट्रेट के बंद रहने के बावजूद मांग मजबूत है और ऑर्डर सुरक्षित हैं।
इस प्रकार स्मॉलकैप का उल्लेखनीय उदय उन विशेषीकृत व्यवसायों के व्यापक सेट के उभरने को दर्शाता है जो उन उद्योगों में काम कर रहे हैं जहां क्षेत्र से जुड़ी अनुकूल परिस्थितियां व्यापक आर्थिक चुनौतियों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हैं।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)