पीपीपी यानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी अब देश के बुनियादी ढांचा विकास में निजी निवेश का संकेत देने वाला एक स्वीकृत संक्षिप्त रूप बन चुका है। भारत के ब्रिटिशकालीन बुनियादी ढांचे के निर्माण में कई परियोजनाएं निजी उपक्रमों के रूप में सामने आई थीं। गारंटीशुदा रिटर्न वाले स्टर्लिंग बॉन्ड्स ने रेलमार्ग, ट्रामवे और बिजली वितरण को वित्तपोषित और संचालित किया। टाटा पावर की स्थापना 1911 में हुई थी। अन्य निजी बिजली संयंत्र भी मौजूद थे। स्वतंत्रता के बाद भारत के बुनियादी ढांचे में निजी पूंजी का उतारचढ़ाव का सफर आठ चरणों में सामने आया।
इकलौता निर्माता राज्य (1947-1992): 1950 में स्थापित योजना आयोग ने अधिकांश राष्ट्रीय निवेश निर्णयों को नियंत्रित किया। बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश हुआ लेकिन यह सार्वजनिक धन से हुआ। ऐसी परियोजनाओं में विशाल जलविद्युत परियोजनाएं और रेलवे नेटवर्क का विस्तार शामिल था, लेकिन निजी पूंजी इसमें शामिल नहीं थी। 1991 के उदारीकरण कदमों के बाद सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि में तेजी आने पर नीति-निर्माताओं ने निजी पूंजी की भागीदारी पर गंभीरता से विचार करना शुरू किया क्योंकि बुनियादी ढांचे की कमी एक चेतावनी के रूप में सामने थी।
पीपीपी का आरंभ (1992-1997): इस समय निजी क्षेत्र को शामिल करना नीतिगत हलकों में गति पकड़ने लगा। उस दौर में पीपीपी के प्रयोग अपने पैमाने के लिहाज से नहीं बल्कि प्रतीकात्मक रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण थे। आठ निजी फास्ट ट्रैक बिजली परियोजनाओं में से केवल दो ही बनीं। जीवीके का 216-मेगावाॅट जेगुरुपाडु संयंत्र बिजली खरीद समझौते के तहत एक शुरुआती प्रायोगिक स्वरूप बना। आईएलऐंडएफएस ने मध्य प्रदेश में राऊ और पीथमपुर के बीच 12 किलोमीटर लंबी टोल सड़क बनाई जो भारत का पहला निजी टोल परिचालन था। 1996 में राकेश मोहन विशेषज्ञ समूह ने निष्कर्ष निकाला कि केवल सार्वजनिक बजट भारत के बुनियादी ढांचे को वित्तपोषित नहीं कर सकते।
पीपीपी का उद्भव (1997-2007): 1997 में पीपीपी ने निर्णायक मोड़ लिया जब देश के पहले समर्पित अधोसंरचना वित्तपोषक के रूप में आईडीएफसी की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य निजी पूंजी को अधोसंरचना की ओर ले जाना था। उसी वर्ष भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की स्थापना की गई जो पहला स्वतंत्र अधोसंरचना नियामक था। बंदरगाह शुल्क और निजी क्षेत्र की भागीदारी की निगरानी के लिए प्रमुख बंदरगाहों के लिए टैरिफ प्राधिकरण का गठन किया गया।
न्हावा शेवा के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट ने भारत के पहले बड़े निजी बंदरगाह परिचालन अधिकार पर हस्ताक्षर किए। बिजली अधिनियम 2003 ने उत्पादन और वितरण को लाइसेंस-मुक्त कर दिया, जिससे बिजली क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का मार्ग खुला। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) सड़क परियोजनाओं में निजी पूंजी आकर्षित करने के लिए नोडल एजेंसी बन गया।
पीपीपी का शिखर (2007-2012): प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अधोसंरचना डेवलपर्स से कारोबारी उत्साह दिखाने का आह्वान किया। 11वीं पंचवर्षीय योजना ने अधोसंरचना निवेश को जीडीपी के 5 फीसदी से बढ़ाकर 9 फीसदी तक ले जाने का लक्ष्य रखा। कुल अधोसंरचना निवेश में निजी पूंजी का हिस्सा 22 फीसदी से बढ़कर 37 फीसदी हो गया। एनएचएआई का पीपीपी कार्यक्रम सड़कों के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी का स्वर्णकाल साबित हुआ।
जीएमआर ने दिल्ली हवाई अड्डे को रूपांतरित किया जबकि जीवीके ने मुंबई हवाई अड्डे का पुनर्विकास किया। दोनों मामलों में दीर्घकालिक पीपीपी परिचालन अधिकार दिए गए। मुंद्रा बंदरगाह ने दिखाया कि निजी क्षेत्र परिवर्तनकारी बदलाव ला सकता है। बैंकों के जबरदस्त ऋण वितरण के चलते अवसंरचना निवेश जीडीपी के 7 फीसदी से ऊपर चला गया। थोड़े समय के लिए भारत दुनिया के सबसे बड़े पीपीपी बाजारों में से एक बन गया।
पीपीपी का स्याह पक्ष (2012-2014): अब यह महसूस होता है कि पीपीपी में संस्थागत आधार की कमी थी। करीब 40,000 मेगावॉट से अधिक की निजी ताप बिजली क्षमता स्थगित है और राजमार्ग संबंधी कई पीपीपी ढह गए। अनेक अधोसंरचना कंपनियां दिवालिया हो गईं। सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज 2010 के 2.5 फीसदी से 2016 तक 14.6 फीसदी जा पहुंचा। निजी बैंकों में यह केवल 4.7 फीसदी है। कॉरपोरेट दिवालिया डिफॉल्ट में अधोसंरचना का हिस्सा 50 फीसदी हो गया, और फंसे हुए कर्ज लगभग 18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गए। स्पष्ट था कि पीपीपी का क्रियान्वयन संस्थागत तैयारी से पहले ही कर दिया गया था।
ईपीसी की ओर वापसी (2014-2023): राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जल्दबाजी में इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, कंस्ट्रक्शन (ईपीसी) रणनीति की ओर वापसी की। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के नेतृत्व में राजमार्ग विकास एक बार फिर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक वित्तपोषण पर आधारित हो गया। 2019-20 तक राजमार्ग निर्माण 8-9 किलोमीटर प्रतिदिन से बढ़कर 28-29 किलोमीटर रोजाना हो गया। हाइब्रिड एन्युइटी (एक प्रकार का वित्तीय अनुबंध) मॉडल के तहत सरकार 40 फीसदी अग्रिम अनुदान देती है और डेवलपर्स 60 फीसदी एन्युइटी के माध्यम से वसूलते हैं, जिससे निजी पूंजी आकर्षित हुई। फिर भी सार्वजनिक वित्तपोषण सीमा तक पहुंच रहा था। केलकर समिति ने नवंबर 2015 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें पीपीपी को पुनर्जीवित करने के उपाय सुझाए गए थे।
कोर सेक्टर की परिपक्वता और नए क्षितिज (2023-2025): 2025 और 2026 के केंद्रीय बजट में पहली बार अधोसंरचना, राजमार्ग या रेलवे जैसे शब्द शीर्षक विषयों के रूप में शामिल नहीं थे। यह नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, बैटरी भंडारण और हाई-स्पीड रेल जैसे नए क्षितिजों की ओर बढ़ने का संकेत था। निजी पूंजी का हिस्सा अब 11वीं योजना अवधि के उच्चतम 37 फीसदी से घटकर 20 फीसदी से भी कम हो गया था।
मुद्रीकरण नया पीपीपी है (2026 से आगे): फरवरी 2026 में राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) 2.0 शुरू की गई जिसका लक्ष्य वित्त वर्ष 30 तक लगभग 16.72 लाख करोड़ रुपये जुटाना है (एनएमपी 1.0 के आकार से 2.6 गुना)। प्रमुख मुद्रीकरण क्षेत्रों के रूप में राजमार्ग, बिजली, रेलवे और बंदरगाह आदि पहचाने गए। एनएचएआई का इनविट पहले ही 2022 में लगभग 14,300 करोड़ रुपये जुटा चुका था जिससे खुदरा और निजी संस्थागत निवेशकों की पुनर्विकास परियोजनाओं में रुचि दिखी। 2026-27 के केंद्रीय बजट में सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा की गई, जिनका अनुमानित व्यय 4,000 किलोमीटर के लिए करीब 16 लाख करोड़ है। यह स्पष्ट मान्यता दिखी कि केवल सार्वजनिक क्षेत्र से धन जुटाना यथार्थवादी नहीं है।
वर्तमान स्थिति: निजी पूंजी अधोसंरचना निवेश में लगभग 20 फीसदी पर अटकी हुई है जबकि आवश्यकता 40 फीसदी की है। पाइपलाइन सही है और कठिन सबक भी मिले हैं। ऐसे में केवल एक प्रश्न शेष है: क्या भारत अंततः निजी निवेश की गाड़ी आगे बढ़ाने से पहले संस्थागत तैयारी को वरीयता देगा?
(लेखक इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंध न्यासी हैं। शोध में मुटुम चाओबिसाना ने सहयोग किया है)