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मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों के नियमों पर भी हो संसदीय निगरानी

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जो संस्थान सार्वजनिक नियामकीय शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें सार्थक निगरानी के दायरे से बाहर नहीं रहना चाहिए। बता रहे हैं एमएस साहू और सुमित अग्रवाल  

Last Updated- June 24, 2026 | 9:49 PM IST
Stock Market

कल्पना कीजिए कि एक सामान्य रूप से प्रयोग में लाई जाने वाली एल्गोरिद्म आधारित कारोबारी रणनीति को अचानक चालबाजी घोषित कर दिया जाए। इसके अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मसलन दंड, निलंबन और यहां तक कि आपराधिक कार्रवाई भी। यदि संसद या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) इस प्रकार का वर्गीकरण करता तो सामान्यतः इसमें सार्वजनिक परामर्श, विधायी समीक्षा और पारदर्शी कानून निर्माण प्रक्रिया शामिल होती। लेकिन बाजार अधोसंरचना संस्थान (एमआईआई) वैसी ही नियम-कायदे तय करने वाली ताकत का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उन पर वैसी लोकतांत्रिक निगरानी नहीं होती।

भारतीय प्रतिभूति बाजार ने ऐतिहासिक रूप से कई स्तरों वाले नियामकीय ढांचे के तहत काम किया है। संसद कानून बनाती है, सरकार नियम निर्धारित करती है, सेबी नियमन और अन्य निर्देश जारी करता है तथा एमआईआई अपनी नियम पुस्तिका के आधार पर व्यवस्था का परिचालन करते हैं। यह ढांचा मुख्यरूप से विधायी मंशा, नियामकीय लचीलेपन और संस्थागत क्रियान्वयन के बीच संतुलन बनाए रहा है। हालांकि प्रस्तावित प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025 (एसएमसी) एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक बदलाव को दर्शाता है। यह एमआईआई को ऐसे संस्थानों के रूप में मान्यता देता है जो सार्वजनिक और नियामक कार्य करते हैं और मानक-निर्धारक साधनों के माध्यम से बाजार व्यवहार को सक्रिय रूप से आकार देते हैं।

एमआईआई कोई साधारण निजी कंपनियां या केवल लेनदेन के प्लेटफॉर्म नहीं होते। वे सार्वजनिक कार्य करते हैं, विधियों से अधिकार प्राप्त करते हैं, आवश्यक बाजार अधोसंरचना प्रदान करते हैं और निवेशकों, मध्यस्थों तथा निर्गम जारी करने वालों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। उनके साधन बाजार तक पहुंच, खरीद-फरोख्त निष्पादन और निपटान, जोखिम प्रबंधन, निगरानी, प्रवर्तन और विवाद समाधान को निर्धारित करते हैं। स्टॉक एक्सचेंज का उदाहरण लीजिए। यह आमतौर पर नियमों, उपनियमों, विनियमों और परिपत्रों से बनी एक परतदार नियम-पुस्तिका के माध्यम से संचालित होता है। ये सब मिलकर बाजार प्रतिभागियों के लिए एक बाध्यकारी कानूनी व्यवस्था तैयार करते हैं।

नियम एक्सचेंज की संवैधानिक रीढ़ होते हैं जो सदस्यता, अनुशासनात्मक शक्तियों और कारोबार करने वाले सदस्यों की निगरानी को नियंत्रित करते हैं। तुलनीय विषय जब सेबी द्वारा प्रयोग किए जाते हैं तो वे संसदीय विधियों द्वारा शासित होते हैं। यदि ऐसे विषय सेबी द्वारा प्रयोग किए जाने पर विधायी उपचार की आवश्यकता रखते हैं, तो एमआईआई की समान शक्तियों को तुलनीय निगरानी से बाहर रखना उचित ठहराना कठिन है।

उपनियम बाजार की परिचालन संहिता होते हैं। ये सदस्यों और ग्राहकों के अधिकारों और दायित्वों को परिभाषित करते हैं, अनुबंधों और निपटानों को विनियमित करते हैं और मध्यस्थता, डिफॉल्ट, मार्जिन और निवेशक संरक्षण का प्रावधान करते हैं। एसएमसी उपनियमों के लिए वही प्रक्रियात्मक सुरक्षा निर्धारित करता है जो सेबी विनियमों पर लागू होती है।

एमआईआई की नियम-पुस्तिकाओं के महत्त्व को न्यायिक मान्यता प्राप्त है। रुसोडे सिक्योरिटीज लिमिटेड बनाम नैशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (2021) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक्सचेंज की कार्रवाई, जिसमें सदस्यों को निलंबित या निष्कासित करना भी शामिल है, को लागू करने की वैधता को स्वीकार किया, बशर्ते ये कार्रवाई एक्सचेंज के नियमों और उप-नियमों के अनुसार की गई हों।

वास्तव में ये साधन लेनदेन को वैधानिक पवित्रता प्रदान कर सकते हैं भले ही अन्य कानूनों के साथ असंगतियां हों। एसएमसी की धारा 46 यह प्रावधान करती है कि किसी स्टॉक एक्सचेंज पर किया गया कोई भी अनुबंध, यदि संहिता और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों, विनियमों या उपनियमों के अनुसार किया गया है तो वह कानूनी और वैध होगा चाहे किसी अन्य कानून में असंगत प्रावधान क्यों न हो। इस प्रकार एमआईआई की नियम पुस्तिकाएं वैधानिक मान्यता के माध्यम से प्रभावी रूप से विरोधाभासी कानूनी प्रतिबंधों को साधिकार निरस्त कर सकती हैं।

संवैधानिक आयाम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। एमआईआई साधन अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यवसाय करने के अधिकार को सीमित कर सकते हैं, अनुच्छेद 300ए के तहत संरक्षित संपत्ति हितों को प्रभावित कर सकते हैं और इसके गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं। इनके मानक स्वरूप को अब केवल आकस्मिक या संविदात्मक नहीं माना जा सकता।

एसएमसी की धारा 148 यह प्रावधान करती है कि संहिता के अंतर्गत बनाए या जारी किए गए प्रत्येक नियम, विनियम, उपनियम और सहायक निर्देश संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं। हालांकि, इस संदर्भ में विनियमन का अर्थ सेबी द्वारा बनाए गए विनियमों से है, न कि एमआईआई द्वारा जारी किए गए विनियमों से। इसी प्रकार, नियम का अर्थ केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों से है, न कि एमआईआई के नियमों से। सहायक निर्देश केवल सेबी द्वारा जारी किए गए साधनों को संदर्भित करते हैं। परिणामस्वरूप, एमआईआई के केवल उपनियम ही विधायी स्तर पर समान रूप से देखे जा सकते हैं, जबकि उनके नियम, विनियम और परिपत्र इससे बाहर रहते हैं। यह असमानता नियामक आर्बिट्राज की संभावना पैदा करती है।

प्रतिभूति बाजार पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख कारक सरकार, सेबी और एमआईआई हैं। सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है। सेबी एक वैधानिक नियामक है और वैधानिक नियंत्रणों के अधीन है। इसके विपरीत, एमआईआई निजी कॉरपोरेट निकाय हैं, जो महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक और नियामक कार्य करते हैं। इन तीनों में, उनके पास सबसे कम लोकतांत्रिक वैधता है।

एसएमसी,एमआईआई की तीन श्रेणियों की पहचान करता है लेकिन सरकार को अतिरिक्त संस्थानों को एमआईआई के रूप में नामित करने का अधिकार देता है। इसके अलावा एमआईआई सेवाओं तक पहुंच प्रभावी रूप से अनिवार्य है। प्रतिभूतियों का व्यापार केवल स्टॉक एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर हो सकता है और प्रतिभूतियों को केवल डीमैट रूप में डिपॉजिटरीज के माध्यम से रखा जा सकता है। जब निवेशकों और मध्यस्थों को कानून द्वारा इन संस्थानों के माध्यम से लेनदेन करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो एमआईआई नियम-पुस्तिकाओं की विधायी समीक्षा का मामला उतना ही मजबूत हो जाता है।

यकीनन एमआईआई को बाजार घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देने के लिए परिचालन लचीलापन और फुर्ती की आवश्यकता होती है। अत्यधिक विधायी नियंत्रण उनकी दक्षता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए लक्ष्य यह नहीं है कि सौंपे गए मानक-निर्माण को सीमित किया जाए बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्यूनतम स्तर की पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक निगरानी बनी रहे।

एसएमसी एक अधिक सुसंगत मानक संरचना की ओर संकेत करता है। सेबी मुख्यतः विनियमों और सहायक निर्देशों के माध्यम से बाध्यकारी मानक जारी करता है। इसी तरह एमआईआई उपनियम और परिपत्र जारी कर सकते हैं, जो सेबी विनियमों और सहायक निर्देशों के अनुरूप होते हैं। वर्तमान में एमआईआई नियमों और विनियमों में निहित विषयों को तब उपनियमों में समेकित किया जा सकता है। इससे कानून एक ही जगह पर उपलब्ध हो जाएगा, जिससे कारोबार करना आसान हो जाएगा।

परिणामस्वरूप वही प्रक्रियात्मक सुरक्षा, पारदर्शिता मानक और विधायी समीक्षा जो सेबी के साधनों पर लागू होती है उन्हें उनके एमआईआई समकक्षों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।


(लेखक विधि व्यवसाय में हैं और सेबी के लिए काम कर चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - June 24, 2026 | 9:44 PM IST

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