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राजनीति की पाठशाला का नौनिहाल

Last Updated- December 05, 2022 | 5:16 PM IST

पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने कर्नाटक का दौरा किया। 1990 में जब राजीव गांधी चुनाव हारकर विपक्ष में आ गए, तो उनकी पार्टी के भलेमानुषों ने उन्हें नसीहत दी कि कांग्रेस से आम लोगों का नाता टूटने की वजह से पार्टी को मुंह की खानी पड़ी है।


इस नाते को कायम रखने के लिए उन्हें देश भर का दौरा करना चाहिए, वह भी सेकंड क्लास के कंपार्टमेंट में, यह जानने के लिए कि गरीब होने का दर्द क्या होता है। राजीव गांधी ने इसे स्वीकार किया और रेल दौरों में लग गए। यह तो किसी के लिए भी संभव नहीं है कि भारत जैसे विशाल देश का ट्रेन से दौरा किया जाए। लिहाजा अपने दौरों के अंत तक वह हवाईजहाज से लंबे सफर करने लगे और रेल से छोटा सफर। लेकिन कांग्रेस को इससे खास फायदा नहीं हुआ।


उनकी मौत के बाद कांग्रेस को कहीं ज्यादा सीटें हासिल र्हुईं और इसका सीधा लाभ पी. वी. नरसिंह राव को हुआ। हां, इन दौरों के बाद राजीव के नजरिए में कुछ बदलाव जरूर आया था। यही बदलाव अब राहुल गांधी में दिख रहा है। गांधी परिवार के लिए कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता कोई बड़ी बात नहीं है। एक तरह से यह परिवार के लिए एक अभिशाप है।


प्रियंका गांधी वडरा जब अपने बच्चों को सुजान सिंह पार्क के एक नर्सरी स्कूल में दाखिल कराने गईं, तो उन्होंने प्राध्यापिका से कहा – ‘ये बच्चे अब आपकी अमानत हैं। यदि ये मचलते हैं या उपद्रव करते हैं, तो आप उन्हें वही सजा दीजिए जो दूसरे बच्चों को दी जाती है। ये इतने तनावपूर्ण वातावरण में पल रहे हैं कि मैं चाहती हूं कि कम से कम स्कूल में सामान्य रहें।’


चापलूसी, जी हुजूरी और राग दरबारी का आलाप सुनने से अच्छे-अच्छों के सिर फिर जाएं। इसीलिए तटस्थ रहना अच्छी नीति है – कोई आपको भुना तो नहीं सकता न! कब तटस्थ रहना है, कब दो टूक साफगोई करनी है और कब लोगों के बीच दस्तक देनी है, यह राहुल गांधी अब सीख रहे हैं, जब उनकी संसद सदस्यता खत्म होने में चंद महीने बचे हैं।


पहले एक साल तो संसद में कुछ बोले ही नहीं। फिर मुंह खोला तो लिखित भाषण पढ़ने के लिए। अब जाकर आगे बढ़ रहे हैं, देश की बागडोर संभालने के लिए – और भैया यह भारत, दैट इज इंडिया है, तो कांग्रेस की बागडोर तो नेहरू परिवार का सदस्य ही संभालेगा।लेकिन व्यंग्य परे, राहुल गांधी का राजनीतिक आकलन कैसे किया जाए। शुरू-शुरू में प्रियंका और राहुल दोनों ही मदर टेरेसा टाइप की राजनीति से बहुत प्रभावित थे।


दिल्ली की सड़कों पर बच्चों को भीख मांगता देख फोन घुमाना और कहना कि शीला दीक्षित के दफ्तर की फलां ट्रैफिक लाइट पर फलां युवक भीख मांग रहा है, उसे कहीं नौकरी दिलवा दीजिए। इसे अमल में भी लाया जाता था – आखिर 10, जनपथ का आदेश था। लेकिन चीजें बदलीं। आरक्षण के मुद्दे पर बहुत कोशिशें हुईं, राहुल गांधी से इस तरफ या उस तरफ कुछ कहलवाने की। लेकिन दाल नहीं गली।


उन्होंने तीखा बोला तो उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार के खिलाफ – सुरक्षा, विकास और जनजीवन के विषय में। बात चुभ गई और गांधी को शायद अच्छा भी लगा होगा, लेकिन पार्टी के भाग्य पर इस प्रकार की प्रहारात्मक राजनीति का कोई असर नहीं पड़ा। विधानसभा चुनाव में पार्टी की और भद्द पिटी। पिछले चुनाव में 25 सीटें आईं थीं और इस बार महज 22 सीटों से संतोष करना पड़ा।


तो क्या इसका मतलब था राहुल गांधी का करिश्मा फेल हो गया? यह तो कोई कह नहीं सकता था। कांग्रेस संगठन में फेरबदला हुआ और ‘कमिटी फॉर फ्यूचर चैलेंजेज’ यानी भावी चुनौतियों को पहचानने के लिए एक समिति का गठन हुआ। जाहिर है कि यह समिति ही राहुल गांधी का मार्गदर्शन करेगी, वैचारिक और सैध्दांतिक मुद्दों पर।
उत्तर प्रदेश में चुनावी दौरा करते समय राहुल गांधी के अंतर्मन में कुछ जागा होगा। अपने पिता की तरह वे भी दौरों पर निकल गए।


सब जगह लिखा है, चाहो तो विकीपीडिया में भी पढ़ लो कि भारत का मानस उसके गांवों में बसता है। पहले उड़ीसा और पिछले हफ्ते कर्नाटक का दौरा करके राहुल अपने आप को युवाओं के अविवादित सम्राट के रूप में ढालना चाहते हैं। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक संस्कृति के चलते एक दिन राहुल गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में अभिषेक होगा। यह अगले वर्ष हो सकता है या पांच साल बाद।


लेकिन तैयारी कर लेना तो उचित है। संसद में, गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी लिखित भाषणों को पढ़ते थे। अब वे स्वत:स्फूर्त बोलना सीख गए हैं। अपनी पार्टी के पक्ष में दोस्तों से भी लड़ पड़ते हैं – वामपंथी पार्टी की बृंदा कारत से झगड़ा हो गया कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में शुरू करने की अनुमति देनी चाहिए या नहीं। गांधी को शायद यह नहीं मालूम था कि इसके सबसे बड़े विरोधी मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह हैं, जो उन्हीं की पार्टी के हैं।


राष्ट्रीय रोजगार योजना का श्रेय पार्टी को मिलना चाहिए, इसके लिए उन्होंने जरा भी कसर नहीं छोड़ी।कर्नाटक में उनका दौरा उल्लेखनीय है। पहली बार उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का जिक्र किया – यह कहकर कि भारत और अमेरिका के बीच असैन्य एटमी करार हमारे देश के हित में है। जोर था कर्नाटक की जनजातियों से मिलकर उनके साथ बात करने पर। उड़ीसा में सुरक्षाकर्मियों को गच्चा देकर राहुल दलितों के घर पर खाना खाने और फिर वहीं रात्रि विश्राम के लिए निकल गए।


हां, कर्नाटक में जब पार्टी के युवा नेताओं से बात कर रहे थे और अखबारनवीसों ने अंदर आने का हठ किया तो बड़े ही नपे-तुले शब्दों में कहा – ‘मैंने ही सुरक्षाकर्मियों को मना किया था कि आप लोगों को अंदर न आने दें। दौरा खत्म हो जाने पर आप सब से बात करूंगा। अभी लोगों और मेरे बीच कोई आने की कोशिश न करे।’ राहुल गांधी तेजी से राजनीति सीख रहे हैं।


चेहरा-मोहरा सुंदर है, लेकिन युवा वर्ग के लिए वह धीरे-धीरे एक प्रतीक होते जा रहे हैं, आदर्शवाद और उम्मीद के। सबसे बड़ी बात यह है कि और किसी पार्टी में इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। राजनीति के लंबे सफर के घोड़े राहुल गांधी हैं और उन्हें नजरों से ओझल करना मूर्खता होगी।

First Published - March 28, 2008 | 11:23 PM IST

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