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अनदेखी: उद्यमशीलता के एक अनूठे अध्याय की स्मृति

गुजरे साल के नवंबर महीने में मशहूर उद्यमी पी आर एस ओबेरॉय का निधन हो गया जिनका ताल्लुक शिमला के क्लार्क्स होटल से है।

Last Updated- December 31, 2023 | 9:37 PM IST
P R S Oberoi

गुजरे साल के नवंबर महीने में मशहूर उद्यमी पी आर एस ओबेरॉय का निधन हो गया जिनका ताल्लुक शिमला के क्लार्क्स होटल से है। इस होटल के नाम में ओबेरॉय नहीं जुड़ा है लेकिन इस होटल का संबंध ओबेरॉय के शुरुआती सफर से है।

वर्ष1920 के दशक में इस होटल का नाम सेसिल था (अब शिमला में इसी नाम का एक और होटल मौजूद है) और होटल के प्रबंधक अर्न्स्ट क्लार्क को होटल के क्लर्क मोहन सिंह ओबेरॉय से इतना लगाव हो गया कि उन्होंने होटल प्रबंधन का काम इसी युवा क्लर्क को सौंप दिया। बाद में, ओबेरॉय इस होटल के मालिक बन गए और उन्होंने इसके संरक्षक के सम्मान में इस होटल का नाम उनके ही नाम पर रख दिया।

पीआरएस को अपने पिता की तरह बहुत संघर्ष नहीं करना पड़ा। मशहूर स्तंभकार वीर सांघवी के शब्दों में कहा जाए तो उन्होंने 32 साल की उम्र तक एक रोमांचक शख्सियत वाली जिंदगी जी और दुनिया की बेहतरीन लक्जरी सेवाओं की पेशकश करने की पहल की। उन्होंने होटल चेन का काम संभालने के बाद पूरी तल्लीनता के साथ काम किया और अपने होटलों को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने ऐसी लक्जरी सुविधाएं और सेवाएं देनी शुरू कीं जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों को आकर्षित करती थीं।

पीआरएस के निधन के एक दिन पहले 13 नवंबर को केदारनाथ अग्रवाल का निधन हो गया। अग्रवाल के पिता ने 1905 में राजस्थान के बीकानेर में बीकानेर नमकीन भंडार की शुरुआत की थी। अग्रवाल और उनके भाई सत्यनारायण इस नाम के साथ दिल्ली आए और 1950 के दशक में पुरानी दिल्ली की सड़कों और तंग गलियों में घूम-घूमकर प्लास्टिक की बाल्टी में भुजिया और रसगुल्ला बेचा करते थे।

तब वे फुटपाथ पर सामान बेचने वाले (स्ट्रीट वेंडर) ही माने जाते थे। संघर्ष करते हुए चांदनी चौक में दुकान खोलने में उन्हें थोड़ा समय लग गया। अब यह आलम है कि बीकानेरवाला समूह का कारोबार 1,300 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच गया है और भारत तथा विदेश में इसके 150 आउटलेट हैं।

जिस शिमला से ओबेरॉय की कहानी शुरू हुई, वहीं 1923 में केशव महिंद्रा का भी जन्म हुआ था। उनके पिता कैलाश चंद्र ने 1945 में अपने भाई जगदीश चंद्र और दोस्त गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर महिंद्रा ऐंड मोहम्मद नाम की कंपनी की शुरुआत की थी। वर्ष 1947 में मोहम्मद पाकिस्तान चले गए जिसके बाद कंपनी का नाम महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (एमऐंडएम) हो गया।

आजादी के बाद जब देश अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा तब एमऐंडएम ने उस वक्त स्टील कारोबार में कदम रखने की कोशिश करते हुए विली जीपों के कलपुर्जे असेंबल करने और बाद में ट्रैक्टर के क्षेत्र में हाथ आजमाने की कोशिश की। केशव महिंद्रा का निधन 12 अप्रैल, 2023 को हो गया। वह 1963 में कंपनी के अध्यक्ष बने और 2013 तक इस पद पर बने रहे। उनके पद छोड़ने के बाद उनके भतीजे आनंद ने उनकी जगह ली। बीच के वर्षों के दौरान एमऐंडएम ने अपने समूह का विस्तार करते हुए सूचना प्रौद्योगिकी, होटल, लॉजिस्टिक्स, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट और अक्षय ऊर्जा सहित 20 से अधिक क्षेत्रों के उद्योग में कदम रखा।

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अब मैं जिस अगले व्यक्ति का नाम लूंगा, संभव है कि आपमें से कुछ लोगों को उनके नाम पर एतराज होगा। उनका नाम सुब्रत रॉय है। उन्होंने अलग शैली वाली उद्यमिता पर जोर दिया लेकिन इसके विस्तार, प्रभाव और इस अनूठी उद्यमशीलता की अपील से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है।

लखनऊ में, यह नाम हर जगह लिखा दिखाई देता था। गोमती नगर में सहारा शहर बड़े क्षेत्र में फैला था जिसका प्रवेश द्वार बेहद भव्य तथा दीवारें बेहद ऊंची थीं और बड़े बड़े टावर के साथ यहां काफी कड़ी सुरक्षा का माहौल दिखता था। करीब 10 साल पहले जब मैं इस सहारा शहर के अंदर गया था तब यह करीब 300 एकड़ में फैला हुआ था और यहां चौड़ी खाली सड़कें दिखती थीं तथा भव्य मेहराब बने हुए थे। इसमें एक बड़ा सभागार भी था जिसमें 5,000 लोग बैठ सकते थे। इस सहारा शहर के अंदर ही एक सिनेमा हॉल, एक मेडिकल यूनिट, एक हरा-भरा क्रिकेट मैदान, करीब 2.5 किलोमीटर दायरे फैली एक बड़ी झील थी। यहां एक भारत माता मंदिर और ज्योति स्थल भी था जो स्मारक रॉय के पिता सुधीर चंद्रा के नाम पर था।

रॉय की कहानी की शुरुआत वर्ष 1978 से शुरू होती है जब उनके पास केवल 2,000 रुपये की पूंजी और एक लम्ब्रेटा स्कूटर हुआ करता था। उन्होंने अपने काम की शुरुआत एक क्लर्क और एक लड़के को काम पर रखने के साथ की थी। संभव है कि बाकी उद्यमियों की शुरुआत भी इसी तरह की रही हो, लेकिन रॉय ने एक ऐसी कंपनी बनाई जो शुरुआत से ही नियामकीय मसलों में उलझी हुई थी।

रॉय का मानना था कि कारोबारों को अपने कर्मचारियों और समाज के साथ-साथ अपने शेयरधारकों के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए। सहारा समूह ने कभी लाभांश की घोषणा नहीं की। संभवतः कंपनी ने अपने मुनाफे का 40 प्रतिशत अपने कार्मिकों (जिन्हें कर्तव्ययोगी कहा जाता है) के कल्याण पर खर्च किया, वहीं करीब 35 प्रतिशत हिस्सेदारी कंपनी के शुद्ध स्वामित्व वाले फंड में गई जबकि बाकी हिस्सा सामाजिक कार्यों पर खर्च किया गया। रॉय का निधन 14 नवंबर को हुआ जिस दिन पीआरएस का निधन हुआ था।

देश के इन चर्चित उद्यमियों के निधन के साथ ही उनकी उद्यमिता शैली का भी अंत हो गया जिसने भारतीय उद्यमिता के नए आयाम तैयार किए थे और अनोखे तरीके से भारतीय कारोबार जगत को नई दिशा दी थी।

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आज के दौर के उद्यमी अलग तरह से अपना सफर तय कर रहे हैं चाहे वह भारत के उद्यमी हों या विदेश के उद्यमी हों। अभी दुनिया में सबसे चर्चित उद्यमी, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन हैं। वॉलस्ट्रीट जर्नल ने हाल ही में पहले पन्ने पर एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें यह बताया गया कि कैसे 38 वर्ष के ऑल्टमैन को उनके प्रभावशाली सहयोगियों ने अक्सर संरक्षण दिया है और ओपनएआई में बर्खास्तगी और बहाली से जुड़ी सुर्खियां भी एक खास रुझान का हिस्सा है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड में हाल ही में एक खबर प्रकाशित हुई कि भारत के सबसे प्रसिद्ध उद्यमियों में से एक ने अपने निवेशकों से कहा कि अगर वे 30 करोड़ डॉलर का निवेश करते हैं तब वे उनके कंपनी पर अधिक नियंत्रण रख सकते हैं।

यह संभव है कि पुरानी दिल्ली की सड़क पर भुजिया बेचकर अपनी शुरुआत करने वाले, वैश्विक स्तर पर रोमांचक शैली की जिंदगी जीने वाले शख्स, विली जीप को असेंबल करने वाले और लम्ब्रेटा स्कूटर की सवारी करने वाले ने जिस तरीके से अपने उद्यम की शुरुआत की थी उसमें सब कुछ सही नहीं था खासतौर पर रॉय के मामले में।

प्रश्न यह है कि वर्ष 2023 में उनके जाने से उनकी उद्यमिता शैली का अध्याय पूरी तरह खत्म हो जाएगा? निश्चित तौर पर इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है कि लम्ब्रेटा की सवारी करने वाले शख्स सहित इन उद्यमियों की विरासत को समझना काफी दिलचस्प रहा है।

First Published - December 31, 2023 | 9:37 PM IST

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