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बैंकों के नियमन में नियामकीय संतुलन

बैंकिंग क्षेत्र के नियमन में संतुलन की आवश्यकता है, निजी बैंकों में शीर्ष नियुक्तियों और निवेशकों के संरक्षण के हवाले से इस संतुलन की आवश्यकता है

Last Updated- July 19, 2024 | 9:39 PM IST
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दुनिया के अधिकांश देशों खासकर भारत जैसे उभरते देशों में वित्तीय क्षेत्र पर बैंकों का दबदबा है। बैंक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे अपनी पहुंच के जरिये वित्तीय समावेशन को गति देते हैं, ऋण को वांछित क्षेत्रों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं और सरकारों को विभिन्न लक्ष्य पाने में सहायता करते हैं। बैंकों के लिए एक अलग नियामकीय ढांचे की जरूरत एकदम स्वाभाविक है। वे असाधारण रूप से ऊंचे लीवरेज रेश्यो पर काम करते हैं, उन्हें जनता से जमा लेने की इजाजत है और उन्हें मददगार के रूप में केंद्रीय बैंक का समर्थन हासिल है।

जनता का बैंकिंग प्रणाली पर विश्वास है। बैंकों के समस्याग्रस्त होने के गंभीर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। स्वाभाविक सी बात है कि बैंकों की निगरानी और उनका नियमन एक गंभीर काम है। दुनिया भर में बैंकिंग क्षेत्र के नियामकों को रूढ़िवादी और जोखिम से बचने वाला माना जाता है। उस लिहाज से देखा जाए तो आखिर में बैंक वाणिज्यिक इकाइयां हैं और वे मुनाफे के लिए काम करते हैं।

वे न केवल आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं बल्कि दूसरे ऋणदाताओं के साथ भी उनकी प्रतिस्पर्धा होती है। उन्हें काम करने के लिए पर्याप्त लचीलेपन की आवश्यकता होती है, तकनीकी उन्नति के साथ कदम मिलाकर चलना होता है और नवाचार को बढ़ावा देना होता है। बैंकिंग नियामक के लिए सही नियामकीय संतुलन कायम रखना आसान नहीं होता है। उन्हें यह ध्यान रखना होता है कि कब सख्ती बरतनी है और कब नहीं। उसके बाद नियम आधारित और सिद्धांत आधारित नियमन के बीच चयन करना होता है।

भारतीय संदर्भ में बात करें तो कुछ लोग ही इस बात से असहमत होंगे कि बैंकिंग नियामक रिजर्व बैंक बैंकों की लगभग सभी गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण रखता है। औपचारिक नियामकीय निगरानी के अलावा रिजर्व बैंक बैंकों के काम पर अनौपचारिक तरीके से भी निगरानी रखता है। कई बार बैंकों को इन निर्देशों का पालन करना काफी कठिन साबित हो सकता है।

बैंकिंग नियमन की निगरानी की व्यवस्था में व्यापक विषय साबित होते हैं लेकिन इस आलेख में हम बैंकों के बोर्ड स्तर की नियुक्तियों और बैंक प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा जैसे मुद्दों तक सीमित रहेंगे।

निजी क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड चेयरमैन, एमडी और निदेशकों की नियुक्तियों को रिजर्व बैंक मंजूरी देता है। वह उनकी कार्यावधि और वेतन भत्तों को भी मंजूरी देता है। भले ही बैंकों का आकार कुछ भी हो। कई बार रिजर्व बैंक ने लोगों के नाम खारिज किए हैं या उनके कार्यकाल को बदला है। कई बार रिजर्व बैंक इन पदों पर होने वाली नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति के लिए बैंकों के प्रबंधन द्वारा किए गए नामों की सिफारिश को नकार देता है और उनके कार्यकाल को संशोधित करता है। इसके अलावा कई अवसरों पर नियामक बैंकों के बोर्ड में अतिरिक्त निदेशकों को भी नियुक्त करता है।

फिलहाल बाजार पूंजीकरण के मुताबिक देश में निजी क्षेत्र के 10 बड़े बैंकों में सात के चेयरपर्सन या तो रिजर्व बैंक के पूर्व अधिकारी हैं या पूर्व अफसरशाह। सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों के साथ ये श्रेणियां इन बैंकों के बोर्ड में गैर कार्यकारी निदेशकों में अच्छी खासी हिस्सेदारी रखती हैं। एक बैंक में तो यह 50 फीसदी तक है। ऐसे में निजी बैंकों का बोर्ड भी काफी हद तक सरकारी बैंकों जैसा नजर आने लगता है।

इसका एक असर यह होता है कि नियामकों और विनियमितों यानी बैंकों के बीच दूरी कम होती है। सभी बैंकों में शीर्ष पदों पर लोगों की क्षमताओं और ईमानदारी की जवाबदेही नियामक पर होने से नैतिक समस्या खड़ी होती है और यह संभावना बनती है कि कहीं नियामक ज्यादा सहनशीलता न दिखाने लगे। परिणामस्वरूप कई बार नियामक के लिए खुद को असहज करने वाली परिस्थितियों से मुक्त करना मुश्किल हो सकता है। इस प्रक्रिया में नियामक अपनी विश्वसनीयता को भी जोखिम में डाल सकता है।

रिजर्व बैंक नियुक्तियों के मामले में अपनी नीति पर नए सिरे से विचार कर सकता है और शायद वह अपनी भूमिका को महत्त्वपूर्ण बैंकों के चेयरपर्सन और निदेशकों की नियुक्ति तक सीमित कर सकता है। अब बात करते हैं निवेशकों के संरक्षण की। नियामकीय आदेश के अनुसार बैंकों का सूचीबद्ध होना आवश्यक है। इसका मकसद उनके कामकाज में पारदर्शिता लाना और कारोबारी संचालन में सुधार करना है। बहरहाल, अक्सर सूचीबद्ध बैंक समय पर या पूरा सार्वजनिक खुलासा नहीं करते। अक्सर वे ऐसा जानबूझकर करते हैं। इसके पीछे जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा या वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंताएं होती हैं।

ऐसे में बैंक की प्रतिभूतियों के निवेशक शायद उन बैंकों की गतिविधियों के बारे में भलीभांति नहीं जान पाएं। ऐसे में नियामक द्वारा अचानक बैंक के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई निवेशकों को मुश्किल हालात में डाल सकती है। इससे भी अधिक चिंतित करने वाली बात यह है कि अक्सर रिजर्व बैंक देनदारी में चूक करने वाले बैंकों के खिलाफ कोई मुखर आदेश नहीं देता। इसके परिणामस्वरूप नियामक के कदमों के बाद अक्सर निवेशक अंदाजा लगाते रह जाते हैं कि असली मुद्दा क्या था।

निवेशकों की चिंताओं की बात जारी रखते हुए 8,400 करोड़ रुपये मूल्य के एटी-1 बॉन्ड को लेकर चल रहे विवाद को याद रखना होगा। ये बॉन्ड येस बैंक ने जारी किए थे और रिजर्व बैंक द्वारा नियुक्त प्रशासन ने इन्हें बट्‌टे खाते में डालते हुए स्टेट बैंक तथा अन्य बैंकों के निवेश की मदद से बैंक को नए सिरे से खड़ा किया। एटी-1 बॉन्ड का ढांचा जटिल है और इन बॉन्ड को इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए ताकि अगर किसी बैंक में मुश्किल हालात बनें और इन्हें बट्‌टे खाते में डालना हो तो ऐसा बैंक की सामान्य इक्विटी टियर-1 पूंजी को खत्म करके ही किया जा सके।

यह दलील मददगार नहीं है कि एटी-1 बॉन्ड अंतरराष्ट्रीय मान्यता वाला है और उसे अन्य देशों के बैंक भी इस्तेमाल करते हैं तथा इसकी मदद से पूंजी जुटाते हैं। गत वर्ष क्रेडिट सुइस बैंक के पतन की दास्तान ने भी अनेक नियामकों को ऐसे बॉन्ड पर नए सिरे से नजर डालने पर विवश किया। इस पूरी बात का अर्थ यह है कि जमाकर्ताओं के अलावा बैंक प्रतिभूतियों के निवेशक भी महत्त्वपूर्ण अंशधारक हैं और उनके हितों की भी रक्षा की जानी चाहिए।

(सेबी के चेयरमैन रह चुके अजय त्यागी ओआरएफ के वि​शिष्ट फेलो हैं और रचना बैद एनआईएसएम की प्रोफेसर हैं)

First Published - July 19, 2024 | 9:39 PM IST

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