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राष्ट्र की बात शेखर गुप्ता : सुधारात्मक से दंडात्मक हो रही न्यायपालिका

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Last Updated- April 02, 2023 | 11:37 PM IST
Supreme Court

पिछले दिनों न्यायालयों के दो विरोधाभासी निर्णय आए जिन्होंने एक असहज करने वाला प्रश्न उठाया: क्या निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हमारी न्यायपालिका सुधारवादी संस्था से दंड देने वाली संस्था में बदल रही है।

यहां बहस के लिए एक ​स्थिति प्रस्तुत है: बीते 15 वर्षों के दौरान हमारी न्यायपालिका यानी निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने काफी प्रगति की है, बशर्ते कि आप इसे प्रगति कहना चाहें। इस अव​धि में यह सुधार लाने वाली संस्था से दंड देने वाली संस्था बन गई है।

हम यह बात केवल इस आधार पर नहीं कह रहे हैं कि 2022 में देश की निचली अदालतों ने 165 मामलों में मौत की सजा सुनाई। 2000 के बाद यह इकलौता वर्ष है जब इतने बड़े पैमाने पर सजा ए मौत सुनाई गई। इसके साथ ही मौत की सजा पाए लोगों की तादाद बढ़कर 539 हो गई जो 17 वर्षों की सबसे बड़ी संख्या है। हम जानते हैं कि इनमें से ज्यादातर की सजा कम होगी और कुछ तो छूट भी जाएंगे। सन 2000 के बाद से देश में आठ लोगों को फांसी दी गई है। इनमें से चार ‘निर्भया’ सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड के दोषी थे। सवाल यह है कि हमारी निचली अदालतें धड़ल्ले से यह सजा क्यों सुना रही हैं?

अब बात करते हैं शीर्ष अदालत की। फांसी की सजा के बढ़ते मामलों को ऊपरी अदालत के एक ताजा फैसले के आलोक में देखें। इस फैसले के जरिये उसने गैर कानूनी गतिवि​धियां (रोकथाम) अ​धिनियम यानी यूएपीए पर 2011 में लिए गए अपने ही निर्णय को लगभग बेमानी कर दिया है।

न्यायमूर्ति एमआर शाह, सीटी रविकुमार और संजय करोल के तीन सदस्यीय पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के तीन पुराने निर्णयों को निरस्त कर दिया जिनकी मदद से इस सिद्धांत को मजबूती दी गई थी कि केवल प्रतिबं​धित संगठन की सदस्यता होना यूएपीए के तहत अपराध नहीं है। इस कानून के तहत आरोपित होने के लिए क​थित सदस्य का प्रतिबं​धित संगठन की गतिवि​धियों में भाग लेना आवश्यक है।

ताजा निर्णय में इसे खारिज करते हुए पुलिस अथवा जांच एजेंसियों को यह अ​धिकार दे दिया है कि वे किसी भी व्य​क्ति को केवल प्रतिबं​धित संगठन का सदस्य होने के संदेह के आधार पर उठा लें। एक बार जब कोई व्य​क्ति ऐसी आशंका के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता है तो उसे यूएपीए का सामना करना पड़ेगा जबकि इस कानून के तहत साबित करने का बोझ आरोपित पर होता है और इसे पलटना काफी मु​श्किल होता है।

इसके मामलों में जमानत मिलना लगभग असंभव होता है। यानी केवल जुड़ाव के संदेह में व्य​क्ति को दोषी मान लिया जाता है। यानी दोषी सिद्ध न होने तक निर्दोष मानने का सिद्धांत यहां लागू नहीं होता।

दुखद तथ्य यह है कि यह अपनी तरह का कोई इकलौता मामला नहीं है। बीते कई वर्षों के दौरान हमने देखा है कि ऊपरी अदालत का रुझान कमोबेश ऐसा ही रहा है। ऐसे कई कानूनों को और अ​धिक सख्त बनाया गया है जबकि आशा यह थी कि इन्हें प्रतिवादियों के पक्ष में लचीला किया जाएगा।

इन्हें कम से कम उदार बनाने की आशा थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उदार सिद्धांतों के पक्ष में खड़ा होता है। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने उदारता के सिद्धांत को उचित ही ध्रुव तारा करार दिया। यूएपीए के मामले में ताजा निर्णय के साथ एफसीआरए (विदेशों से मिलने वाले चंदे के नियमन से संबद्ध) ओर धनशोधन रोकने के लिए बने कानून पीएमएलए को सत्ता के पक्ष में कड़ा बनाने के जो फैसले ऊपरी अदालत के न्यायधीशों ने दिए हैं, वे इस सैद्धांतिक दृ​ष्टिकोण से किस तरह मेल खाते हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूएपीए के मामले में स्वतंत्रता को लेकर झटका दिया। देवांगना कालिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकाल तन्हा को दिल्ली के नागरिकता संशो​धन अ​धिनियम विरोधी प्रदर्शनों के मामलों में जमानत देते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और अनूप जे भंभानी ने कहा था कि यूएपीए केवल तभी लगाया जा सकता है जब आतंकी गतिवि​धि स्पष्ट परिभा​षित हो। पीठ ने ‘आतंकी गतिवि​धि’ शब्द के प्रयोग को आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने के ​खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा कि इसकी परिभाषा बहुत व्यापक है।

दिल्ली पुलिस ने तत्काल सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया जिसने जमानत में तो हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन निर्णय के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। यानी निर्णय को ऐसे अन्य मामलों में नजीर की तरह पेश नहीं किया जा सकता था।

जुलाई 2022 में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की अध्यक्षता वाले दो न्यायाशीशों के पीठ ने एक नया न्यायिक सिद्धांत पेश किया। उन्होंने एक याची पर जुर्माना लगाया जो दंतेवाड़ा में आदिवासियों के नरसंहार की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराने की मांग कर रहा था क्योंकि उसके मुताबिक वहां गलत तरीके से लोगों की जान ली गई। न्यायालय ने पुलिस की दलील स्वीकार कर ली कि हत्याएं नक्सलों द्वारा की गई थीं। उसने न केवल याची हिमांशु कुमार पर जुर्माना लगाया ब​ल्कि केंद्र की वह मांग भी स्वीकार कर ली जिसमें उसने मांग की थी कि एजेंसियों को याचियों की ही जांच करने दी जाए। उसने कहा, ‘जांच केवल झूठे प्रमाण तैयार करने के आरोपों तक सीमित नहीं रहे ब​ल्कि इसमें आपरा​धिक षडयंत्र अथवा भारतीय दंड संहिता के तहत लगने वाले आरोप भी शामिल हो सकते हैं।’

हम और पीछे जाएं तो 2016 में तत्कालीन न्यायाधीश (तब वह मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे) रंजन गोगोई ने एक अन्य उल्लेखनीय आदेश दिया था कि जिसने कम से कम एक अहम क्षेत्र में सरकारी बैंकों और निजी बैंकों के बीच का अंतर मिटा दिया। न्यायमूर्ति पी सी पंत के साथ न्यायमूर्ति गोगोई ने भ्रष्टाचार निरोधक अ​धिनियम के तहत लोक सेवकों की परिभाषा का विस्तार किया। उसने कहा कि रिजर्व बैंक के लाइसेंस के अधीन संचालित निजी बैंक के सभी कर्मचारी सरकारी सेवक हैं। इसके साथ ही उन्होंने राज्य और सीबीआई के दायरे को भी निजी कारोबारों तक बढ़ा दिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय के यूएपीए के तहत जमानत के आदेशों की तरह हमें अदालतों से जब तब ताजा हवा के झोंके जैसे फैसले भी देखने को मिलते रहते हैं। मसलन पिछले दिनों राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पंकज भंडारी और समीर जैन ने इस सप्ताह ऐसा ही फैसला सुनाया जिसने इस सप्ताह के स्तंभ को विषय प्रदान किया।

उन्होंने मई 2008 में जयपुर में हुए सिलसिलेवार धमाकों के चार दो​षियों को मुक्त कर दिया जो 15 साल से फांसी की सजा की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन धमाकों में 71 लोग मारे गए थे और अनेक घायल हुए थे। इन सभी को दिल्ली में बटला हाउस मुठभेड़ के बाद उठाया गया था और शंका थी कि वे इंडियन मुजाहिदीन के ही सदस्य थे जिसने जयपुर धमाकों की जिम्मेदारी ली थी। न्यायाधीशों ने रिहाई के आदेश में लिखा, ‘यह संस्थागत ​नाकामी का सटीक उदाहरण है जिसके चलते जांच प्रक्रिया पूरी तरह ढीली और खराब रही।’

इन चारों को जिस अन्याय का सामना करना पड़ा उसने न्यायाधीशों को झकझोर कर रख दिया था। उन्होंने प्रकाश सिंह (पूर्व पुलिस अ​धिकारी जिन्होंने पुलिस सुधारों के लिए काम किया) मामले में 2006 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का भी हवाला दिया जिसमें पुलिस ​शिकायत प्रा​धिकार बनाने की बात कही गई थी ताकि ऐसे अन्याय से निपटा जा सके। राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्णय की तारीफ करते हुए भी उस कानून को याद रखना जरूरी है जिसके चलते ये पुलिसकर्मी इतनी ज्यादती के बाद भी बच निकले ब​ल्कि चारों को निचली अदालत से सजा दिलाने में भी सफल रहे।

ऐसा इसलिए हुआ ​कि यूएपीए में खुद को निर्दोष साबित करने का भार आरोपित पर होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी कानून को अब और मजबूती प्रदान की है। राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश से जहां इस कठोर कानून की खामियां उजागर हुईं वहीं सर्वोच्च न्यायालय ने उसी सप्ताह इसे और मजबूती प्रदान की।

न्यायपालिका में एक रुझान देखना और उसे उसे स्थापित करने का प्रमाण तलाश करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। इसकी एक वजह यह है कि अन्य शीर्ष पदों की तुलना में शीर्ष न्यायाधीशों के कार्यकाल की अव​धि कम रहती है। दूसरा चूंकि वे अपनी नियु​क्तियां स्वयं करते हैं इसलिए सरकारों और वैचारिक बदलाव के साथ उन्हें नहीं जोड़ा जा सकता है।

तीसरा, अफसरशाहों की तरह हमारे न्यायाधीशों का करियर स्पष्ट दिशा में नहीं चलता, न ही उन्हें मतदाताओं के आकलन का सामना करना पड़ता है। हम उनका आकलन केवल उनके निर्णयों के आधार पर कर सकते हैं। ऐसे में हालिया प्रमाण बताते हैं कि न्यायपालिका सुधारवादी रुख से दंड देने वाले रुख की ओर बढ़ रही है।
(इस लेख में भद्रा सिन्हा का योगदान)

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First Published - April 2, 2023 | 11:37 PM IST

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