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डिपोर्टेशन पर अरबों का खर्च: ट्रंप प्रशासन ने प्रति प्रवासी 1 करोड़ से ज्यादा क्यों खर्च किए?

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अमेरिका की तीसरे देशों में डिपोर्टेशन नीति पर भारी खर्च, पारदर्शिता की कमी और मानवाधिकार जोखिमों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

Last Updated- February 16, 2026 | 1:41 PM IST
Donald Trump
Representative Image

अमेरिका में प्रवासियों को तीसरे देशों में भेजने की नीति को लेकर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीनेट की विदेश संबंध समिति के डेमोक्रेट सदस्यों द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने लगभग 300 प्रवासियों को उन देशों में भेजने के लिए 4 करोड़ डॉलर से अधिक राशि खर्च की, जिनसे उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 332 करोड़ रुपये बैठती है।

अगर औसत खर्च का हिसाब लगाया जाए तो यह प्रति व्यक्ति लगभग 1.11 करोड़ रुपये बनता है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में यह लागत और भी ज्यादा रही। उदाहरण के तौर पर, रवांडा भेजे गए सात लोगों पर कुल मिलाकर करीब 11 लाख डॉलर प्रति व्यक्ति तक खर्च हुआ।

तीसरे देशों को भुगतान, निगरानी व्यवस्था नहीं

रिपोर्ट में बताया गया है कि इक्वेटोरियल गिनी, रवांडा, अल सल्वाडोर, पलाऊ और एस्वातिनी जैसे पांच देशों को मिलाकर 3.2 करोड़ डॉलर दिए गए। यह राशि सीधे संबंधित देशों की सरकारों को एकमुश्त ट्रांसफर की गई। आरोप है कि इस धन के उपयोग पर नजर रखने के लिए कोई स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था नहीं बनाई गई।

अमेरिकी विदेश विभाग ने भी कथित तौर पर बाहरी ऑडिटर नियुक्त नहीं किए, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि पैसा किस उद्देश्य से और किस तरह खर्च किया गया।

भ्रष्टाचार सूचकांक में नीचे देशों को भारी फंडिंग

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि इक्वेटोरियल गिनी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में 182 देशों में 172वें स्थान पर है, उसे 75 लाख डॉलर दिए गए। यह रकम पिछले आठ वर्षों में उस देश को दी गई कुल अमेरिकी सहायता से भी ज्यादा बताई गई है। कई मामलों में भुगतान अग्रिम रूप से कर दिया गया, जबकि प्रवासी वहां पहुंचे भी नहीं थे।

इसी तरह, दक्षिण सूडान जो भ्रष्टाचार के मामले में 181वें स्थान पर है, वहां आठ लोगों को भेजने पर सहमति बनी। बदले में दक्षिण सूडान ने अमेरिका से कुछ प्रतिबंधों में ढील देने, अपने राजनीतिक विरोधी नेता के खिलाफ कार्रवाई में सहयोग और तेल व खनिज क्षेत्रों में निवेश पर विचार करने जैसे अनुरोध किए।

व्हाइट हाउस का बचाव और विरोध

व्हाइट हाउस ने इस नीति का बचाव करते हुए कहा है कि जब मूल देश अपने नागरिकों को वापस लेने से इनकार कर देते हैं, तब तीसरे देशों में भेजना जरूरी हो जाता है। प्रशासन का तर्क है कि यह कदम अवैध गतिविधियों में शामिल गैर नागरिकों से निपटने के लिए आवश्यक है।

हालांकि, प्रवासी अधिकार संगठनों ने इस नीति को अदालत में चुनौती दी है। उनका कहना है कि कई ऐसे लोग भी प्रभावित हो रहे हैं जो कानून का पालन करते हैं। उन्हें ऐसे देशों में भेजा जा रहा है जहां उनका कोई सामाजिक या पारिवारिक आधार नहीं है और जहां वे कानूनी राहत भी मुश्किल से पा सकते हैं।

डर पैदा करने की रणनीति?

रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि यह कार्यक्रम आंशिक रूप से भय पैदा करने की रणनीति के तौर पर बनाया गया था। उद्देश्य यह था कि महंगी और दूरस्थ डिपोर्टेशन प्रक्रिया के जरिए प्रवासियों पर दबाव बनाया जाए ताकि वे अपने शरण संबंधी दावे वापस ले लें।

बताया गया कि पलाऊ और एस्वातिनी जैसे दूरस्थ देशों का चयन इस संदेश के लिए किया गया कि प्रवासियों को उनके घर से हजारों किलोमीटर दूर भी भेजा जा सकता है।

अल सल्वाडोर के साथ विशेष समझौता

रिपोर्ट में अल सल्वाडोर के साथ हुए समझौते का भी जिक्र है। नकद भुगतान के अलावा अमेरिका ने वहां की सरकार को अन्य वित्तीय और वस्तु रूप में सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई। रिपोर्ट के अनुसार, अल सल्वाडोर के राष्ट्रपति के अनुरोध पर अमेरिका ने एमएस 13 गिरोह के कुछ प्रमुख सदस्यों को वापस भेजा, जो पहले अमेरिकी जांच एजेंसियों के मुखबिर के तौर पर काम कर रहे थे। इससे एक लंबी चल रही संघीय जांच प्रभावित हुई।

नीति पर उठ रहे सवाल

इस पूरे मामले ने अमेरिकी आव्रजन नीति की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर प्रशासन इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रवासन नियंत्रण के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि भारी खर्च, कमजोर निगरानी और मानवाधिकार संबंधी जोखिम इस नीति को विवादास्पद बनाते हैं।

आने वाले समय में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति और न्यायपालिका में और गहराई से उठ सकता है, क्योंकि इसमें सरकारी खर्च, विदेश नीति और मानवाधिकार तीनों पहलू जुड़े हुए हैं।

तीसरे देशों में भेजे गए प्रवासियों पर सवाल, भारी खर्च और पारदर्शिता की कमी पर उठी चिंता

अमेरिका की ओर से प्रवासियों को सीधे उनके मूल देश भेजने के बजाय तीसरे देशों में स्थानांतरित करने की नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों का उल्लेख किया गया है, जिनमें हजारों मील दूर प्रवासियों को भेजने पर लाखों डॉलर खर्च किए गए, लेकिन अंततः उन्हें वापस उनके अपने देश ही लौटाना पड़ा।

हजारों मील की उड़ान, फिर वापसी

रिपोर्ट के मुताबिक एक मैक्सिको नागरिक को करीब 8,000 मील दूर दक्षिण सूडान भेजा गया। इस पूरी प्रक्रिया पर प्रति व्यक्ति लगभग 91,000 डॉलर का खर्च आया। इस राशि में जिबूती स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ठहरने की व्यवस्था भी शामिल थी। कुछ सप्ताह बाद उस व्यक्ति को दोबारा मैक्सिको भेज दिया गया। मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने कहा कि उनकी सरकार को इस निर्वासन की जानकारी पहले से नहीं दी गई थी।

इसी तरह एक जमैका नागरिक को उसके खिलाफ जारी आदेश के बावजूद सीधे जमैका भेजने के बजाय इस्वातिनी भेज दिया गया। इस पर 1,81,000 डॉलर से अधिक खर्च हुए। बाद में अमेरिका को दोबारा खर्च कर उसे जमैका वापस भेजना पड़ा। जमैका के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने नागरिक की वापसी से इनकार नहीं किया था।

80 प्रतिशत से अधिक मामलों में उलटी प्रक्रिया

रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2026 तक तीसरे देशों में भेजे गए 80 प्रतिशत से अधिक प्रवासी या तो अपने मूल देश लौट चुके हैं या उनकी वापसी की प्रक्रिया चल रही है। कई मामलों में अमेरिका ने पहले उन्हें किसी अन्य देश भेजने पर खर्च किया और फिर दोबारा उनके घर भेजने के लिए भुगतान करना पड़ा। इससे नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सीनेटरों ने उठाए छह बड़े मुद्दे

रिपोर्ट में अमेरिकी सीनेटरों ने इस नीति को लेकर छह मुख्य चिंताएं जाहिर की हैं:

  1. अत्यधिक खर्च और सीमित परिणाम
    अपेक्षाकृत कम संख्या में प्रवासियों को स्थानांतरित करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किए गए। कुछ मामलों में प्रति व्यक्ति लागत 10 लाख डॉलर से भी अधिक बताई गई है।

  2. करदाताओं के धन का अनावश्यक उपयोग
    आलोचकों का कहना है कि जिन प्रवासियों को सीधे उनके देश भेजा जा सकता था, उन्हें तीसरे देश भेजकर दोहरा खर्च किया गया।

  3. भ्रष्ट और विवादित सरकारों को भुगतान
    कुछ ऐसे देशों को धनराशि दी गई, जिन पर भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और मानव तस्करी के आरोप रहे हैं। इन भुगतानों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं।

  4. समझौतों की निगरानी में कमी
    विदेश विभाग पर आरोप है कि उसने कूटनीतिक आश्वासनों के पालन की पर्याप्त निगरानी नहीं की।

  5. गोपनीय समझौते और पारदर्शिता का अभाव
    रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ समझौते नकद भुगतान, राजनीतिक रियायतों या दबाव के तहत किए गए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि बदले में अमेरिका को क्या लाभ मिला।

  6. आप्रवासन कानूनों की अनदेखी
    कुछ मामलों में व्यक्तियों को ऐसे देशों में भेजा गया, जहां उन्हें उत्पीड़न या यातना का खतरा हो सकता है, जो अमेरिकी कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों के खिलाफ माना जाता है।

नीति पर बढ़ता दबाव

इन खुलासों के बाद अमेरिकी प्रशासन पर इस नीति की समीक्षा का दबाव बढ़ गया है। आलोचकों का कहना है कि यह तरीका न केवल महंगा है, बल्कि मानवीय और कानूनी दृष्टि से भी विवादास्पद है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह सीमा नियंत्रण की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

हालांकि, बढ़ते खर्च और दोहराई जा रही वापसी की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह नीति वास्तव में प्रभावी है या फिर करदाताओं पर अनावश्यक बोझ बन रही है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है।

अमेरिका का दबाव और निर्वासन कूटनीति: पनामा और कोस्टा रिका पर बढ़ा असर, 55 भारतीय भी प्रभावित

अमेरिका की सख्त आव्रजन नीति के बीच मध्य अमेरिकी देशों पर तीसरे देशों के नागरिकों को स्वीकार करने का दबाव बढ़ने की बात सामने आई है। पनामा और कोस्टा रिका के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों ने एक संसदीय समिति को बताया कि वॉशिंगटन की ओर से उन पर निर्वासित लोगों को अपने यहां रखने के लिए दबाव बनाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे। ट्रंप प्रशासन ने कोलंबिया पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी, जब उसने हथकड़ी लगाए हुए निर्वासितों को स्वीकार करने से शुरुआती तौर पर इनकार कर दिया था। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र के अन्य देशों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनाया। पनामा के अधिकारियों ने यह चिंता भी जताई कि अमेरिका की नजर पनामा नहर पर बढ़ते प्रभाव को लेकर थी, जिससे उनके लिए स्थिति और संवेदनशील हो गई।

समझौते के बाद आर्थिक सहयोग

कोस्टा रिका और अमेरिका के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने कोस्टा रिका को निर्वासन संबंधी सहयोग के लिए 9.5 मिलियन डॉलर की सहायता दी। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कोस्टा रिका द्वारा तीसरे देशों के नागरिकों को स्वीकार करने और निर्वासन प्रक्रिया में सहयोग करने की तत्परता इस आर्थिक मदद का एक महत्वपूर्ण कारण थी।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि निर्वासन से जुड़े समझौते केवल मित्र देशों तक सीमित नहीं थे। इनमें अमेरिका के विरोधी माने जाने वाले देशों, जैसे ईरान, के साथ भी व्यवस्थाएं शामिल थीं। रिपोर्ट में ईरान को मानवाधिकार रिकॉर्ड के मामले में सबसे खराब देशों में से एक बताया गया है।

भारतीय नागरिकों पर प्रभाव

इस पूरी प्रक्रिया का असर भारतीय नागरिकों पर भी पड़ा। विदेश मंत्रालय के अनुसार 55 भारतीय नागरिकों को पनामा के रास्ते निर्वासित किया गया। उनकी यात्रा के व्यावसायिक हिस्से को अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन की सहायता से पूरा कराया गया।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में अब तक 3,800 से अधिक भारतीय नागरिकों को अमेरिका से वापस भेजा जा चुका है। यह संख्या इस बात का संकेत देती है कि अमेरिकी आव्रजन नीति में सख्ती का सीधा प्रभाव भारतीयों सहित कई देशों के नागरिकों पर पड़ा है।

व्यापक कूटनीतिक संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि निर्वासन को लेकर हुए ये समझौते केवल प्रशासनिक फैसले नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे व्यापक कूटनीतिक रणनीति भी काम कर रही है। आर्थिक सहायता, व्यापारिक दबाव और सामरिक हितों को साथ जोड़कर अमेरिका ने क्षेत्रीय सहयोग सुनिश्चित करने की कोशिश की है।

हालांकि, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिये से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल भी उठ रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रभावित देशों की सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस मुद्दे पर किस तरह की प्रतिक्रिया देती हैं।

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First Published - February 16, 2026 | 1:41 PM IST

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