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सरकारी कर्ज घटाने को राज्यों के फिजूलखर्च पर लगाम जरूरी, केंद्र के सामने बड़ी चुनौती

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कर संग्रह में कमी की चिंताओं के बावजूद केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 फीसदी तक प्राप्त करने में सफल रही

Last Updated- February 15, 2026 | 9:27 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

केंद्र सरकार पिछले पांच वर्षों में राजकोषीय मजबूती के पथ पर बढ़ती रही है। राजकोषीय घाटा और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात वित्त वर्ष 2021 (महामारी काल) में 9.2 फीसदी के उच्च स्तर से गिरकर वित्त वर्ष 2026 में 4.4 फीसदी पर आ गया और वित्त वर्ष 2027 के लिए लक्ष्य 4.3 फीसदी निर्धारित किया गया है। पिछले वर्षों की तुलना में वित्त वर्ष 2027 में सुदृढ़ीकरण यानी मजबूती की गति धीमी दिख रही है।

केंद्र सरकार वित्त वर्ष 31 तक ऋण-जीडीपी अनुपात को वर्तमान 56 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी (1 फीसदी कम या ज्यादा) करने के अपने मध्यम अवधि के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि तेज बनी रहती है और सरकारी ऋण निर्धारित योजना के अनुरूप घटता है, तो केंद्र सरकार राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया को क्रमिक रूप से और अधिक बढ़ा सकती है।

कर संग्रह में कमी की चिंताओं के बावजूद केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 फीसदी तक प्राप्त करने में सफल रही। लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये के सकल कर राजस्व में कमी की भरपाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अधिक लाभांश अंतरण और कम व्यय (मुख्य रूप से राजस्व व्यय) से हुई, जिससे सरकार साल के लिए अपने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम रही।

वित्त वर्ष 2027 के लिए भी राजकोषीय गणित का लक्ष्य हासिल करने योग्य प्रतीत होता है। सरकार ने सकल कर राजस्व में 8 फीसदी की वृद्धि का लक्ष्य रखा है, जो अनुमानित नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 10 फीसदी को देखते हुए उचित लगता है।

वित्त वर्ष 2027 में आरबीआई और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) से लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपये का लाभांश अंतरण भी इसमें सहायक होगा। आरबीआई द्वारा उच्च लाभांश अंतरण संभवतः डॉलर की बिक्री (विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप) और उच्च ब्याज आय से आरबीआई के अच्छे लाभ के कारण हो सकता है।

दिलचस्प यह है कि सरकार ने परिसंपत्ति मुद्रीकरण सहित विनिवेश का उच्च लक्ष्य लगभग 80,000 करोड़ रुपये रखा है, जबकि वित्त वर्ष 2026 के लिए यह लगभग 35,000 करोड़ रुपये अनुमानित था। पिछले तीन वर्षों से सरकार लगभग 50,000 करोड़ रुपये का कम विनिवेश लक्ष्य निर्धारित करती रही है और इसे भी हासिल करने में सफल नहीं हो पाई है। इसलिए, वित्त वर्ष 2027 के लिए उच्च विनिवेश लक्ष्य की प्राप्ति गौर करने लायक होगी।

व्यय के मोर्चे पर यह उल्लेखनीय है कि पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर ध्यान केंद्रित किया गया है। केंद्र ने वित्त वर्ष 2027 में कैपेक्स के लिए लगभग 12.2 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है, जो वार्षिक आधार पर 12 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। कुल कैपेक्स (जिसमें केंद्र द्वारा कैपेक्स के लिए अनुदान और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कैपेक्स शामिल है) लगभग 22 लाख करोड़ रुपये तय है, जो वार्षिक आधार पर 20 फीसदी की मजबूत वृद्धि दर्शाता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष कुल कैपेक्स (केंद्र का कैपेक्स + कैपेक्स के लिए अनुदान + केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कैपेक्स) वित्त वर्ष 2027 में बढ़कर 5.6 फीसदी होने का अनुमान है, जो पिछले चार वर्षों में 5.1-5.2 फीसदी के बीच था।

कुल व्यय में केंद्र के पूंजीगत व्यय का हिस्सा वित्त वर्ष 2027 में बढ़कर 23 फीसदी होने का अनुमान है, जबकि महामारी से पूर्व की अवधि (वित्त वर्ष 2015-19) में यह औसतन 13 फीसदी था।

सड़कों और रेलवे पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ, वित्त वर्ष 2027 में रक्षा व्यय में 17 फीसदी की तीव्र वृद्धि तय हुई है। यह वित्त वर्ष 2026 में रक्षा खर्च में हुई 16 फीसदी की उच्च वृद्धि से भी ज्यादा है।

केंद्र सरकार ने राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और गुणवत्तापूर्ण व्यय की दिशा में अपना कदम जारी रखा है, लेकिन सुदृढ़ीकरण की गति धीमी हो गई है। इससे सरकार को वैश्विक अस्थिरता के बीच घरेलू मांग और वृद्धि को सहारा देने में लचीलापन मिलता है।

लेकिन हमें भारत की सरकारी वित्त व्यवस्था के कुछ पहलुओं के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है:

  1. भारत का सरकारी ऋण (केंद्र और राज्य को मिलाकर) सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुकाबले वित्त वर्ष 2021 में 89 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 81 फीसदी पर आ गया है। यह ऐसे समय में सराहनीय है जब वैश्विक स्तर पर सरकारी ऋण बढ़ रहा है। हालांकि, पूंजी की उच्च लागत और सीमित राजस्व आधार के कारण केंद्र और राज्य सरकारों पर ब्याज भुगतान का बोझ (ब्याज-राजस्व अनुपात के रूप में मापा गया) 24 फीसदी के उच्च स्तर पर बना हुआ है।
  2. आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें (जनवरी 2026 से प्रभावी) वित्त वर्ष 2028 में सरकारी खजाने पर दबाव डालेंगी, जिससे राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

सरकार के लिए परिसंपत्ति मुद्रीकरण और विनिवेश से अधिक राजस्व जुटाना अहम होगा। साथ ही, पूंजीगत व्यय के लिए उस राजस्व को अलग रखना भी उचित होगा। योजनाओं के तहत मुफ्त वितरण और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में कमी के कारण कुछ राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति में दबाव के संकेत उभर रहे हैं। समग्र सरकारी ऋण स्तर को सुधारने के लिए राज्य सरकारों द्वारा विवेकपूर्ण व्यय को प्रोत्साहित करना अहम होगा।

केंद्र सरकार द्वारा राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की गति धीमी करने से, आने वाले कुछ वर्षों में उच्च डेट रिडेम्पशन के कारण ऋण बाजार पर दबाव बढ़ेगा। वित्त वर्ष 2027 में, डेट रिडेम्पशन लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर है (पिछले पांच वर्षों के औसत लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये की तुलना में)। अगले तीन वर्षों में, डेट रिडेम्पशन 6 लाख करोड़ रुपये से ऊपर रहने की संभावना है। यही नहीं, वित्त वर्ष 31 में इसमें और वृद्धि होगी। इसके साथ ही राज्य सरकारों द्वारा अधिक उधार लेने से सरकारी यील्ड पर भी दबाव बढ़ेगा।

निष्कर्ष यह है कि आने वाले वर्षों में राजकोषीय मजबूती का मार्ग चुनौतीपूर्ण रहेगा। केंद्र सरकार राजकोषीय अनुशासन का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन राज्य सरकारों को भी इसका अनुसरण करना चाहिए। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुकाबले सामान्य सरकारी ऋण में गिरावट जारी रहने की संभावना है, हालांकि उच्च स्तर भारत पर ब्याज भुगतान के बोझ को बढ़ाता रहेगा। सरकार को कठिन परिस्थितियों में भी राजकोषीय समझदारी के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए।

(लेखिका केयरएज की मुख्य अर्थशास्त्री हैं)

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First Published - February 15, 2026 | 9:27 PM IST

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