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नई भूमिका के लिए तैयार नीतीश कुमार

Last Updated- April 14, 2023 | 8:19 PM IST
Nitish Kumar ready for new role
PTI

इंतजार लंबा था। लेकिन आखिरकार यह हो ही गया। इस हफ्ते की शुरुआत में नीतीश कुमार (और तेजस्वी यादव) और मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के बीच एक बैठक हुई जिसमें नीतीश को प्रमुख वार्ताकार की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी दी गई।

नीतीश ही वह शख्स हैं जिन्होंने वर्ष 2024 में होने वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने के लिए जितना संभव हो उतने विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने के लिए कांग्रेस का विश्वास जीता है। अगर ऐसा होता है तो यह विशाल महागठबंधन होगा। हालांकि इस पर अभी ठीक से सहमति बननी बाकी है लेकिन भाजपा ने पहले से ही इस प्रयास पर कटाक्ष करना शुरू कर दिया है।

नीतीश को दूसरे दलों के लोगों को नियंत्रित करने और उन्हें विपक्ष के खेमे में जोड़ने वाले व्यक्ति के तौर पर देखने के बारे में सोचने पर दिमाग चकरा जाता है। वह एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया है। वह छह बार मुख्यमंत्री भी रहे हैं और उन्होंने कभी न कभी अन्य दलों के साथ भी काम किया ही है।

निश्चित रूप से यह सब समझौते वाली बातचीत और कूटनीति की एक असाधारण प्रतिभा के बिना संभव नहीं हो सकता था। नीतीश कुमार का पूरा राजनीतिक जीवन किसी न किसी रूप में समझौते वाली वार्ता पर आधारित रहा है।

वह पहली बार जब 2000 में सत्ता में आए थे, तब मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल महज सात दिनों तक का था। मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे और तीसरे कार्यकाल (वर्ष 2005 से 2014 तक) के दौरान उन्होंने शासन में अपने कौशल का प्रदर्शन किया। नीतीश की प्राथमिक उपलब्धि एक टूटे हुए तंत्र में ऊर्जा लाना था।

राजनीतिक रूप से उनके शासन-प्रशासन की कहानी का दबदबा दिखा। लालू प्रसाद के सहयोगियों द्वारा छोड़े गए रेमिंगटन टाइपराइटर की जगह नीतीश द्वारा लगाए गए डेस्कटॉप कंप्यूटर ने ले ली जिसे नए बिहार के एक रूपक के तौर पर देखा गया और बिहार में उत्साह के साथ आईसीटी को अपनाया गया।

उनके पास वास्तव में कभी कोई पार्टी नहीं थी लेकिन जमीनी आधार की कमी भी उनके लिए कारगर रही। उन्हें पार्टी हितों के लिए काम नहीं करना पड़ा या उन्हें किसी को किसी तरह का स्थानीय संरक्षण भी नहीं देना पड़ा और वह अपनी योजनाओं को लागू करने के लिए उच्च स्तर पर अफसरशाहों की मदद ले सकते थे।

उनके पक्ष में अफसरशाहों ने भी अच्छी प्रतिक्रिया दी। लालू द्वारा (कुछ चुने हुए लोगों को छोड़कर) शक्तिहीन और प्रभावहीन बनाए जाने के बाद उन्होंने नीतीश के कार्यकाल में थोड़ी ताजी हवा महसूस की। नीतीश ने बेहतर आईएएस अधिकारियों को बुनियादी शासन पर काम आगे बढ़ाने का मौका दिया जिन्हें पहले ऐसा लगता था कि उन्हें कमजोर कर दिया गया है।

वह सफल रहे। मिसाल के तौर पर शिक्षा का क्षेत्र ही ले लें। लालू ने व्यवस्थित रूप से शिक्षकों को काम पर रखने के लिए केंद्रीय फंडों के इस्तेमाल से इनकार कर दिया था क्योंकि जिन लोगों को वह काम पर रखते उनमें से अधिकांश उच्च जातियों से हो सकते थे जो उनकी राजनीति के अनुरूप नहीं था।

नीतीश को यह समस्या नहीं थी। उनके अफसरशाहों को सुखद आश्चर्य हुआ, जब नीतीश ने उन्हें केंद्र सरकार से अधिक बजट मांगने के लिए आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि उनका मानना था कि ‘मांगने में क्या हर्ज है’। उनके शिक्षा सचिव राजेश भूषण ने बिहार में शिक्षा के लिए बुनियादी ढांचा बनाने में मदद करने के लिए बड़े खर्च की मांग की। इसमें नीतीश ने उन्हें पूर्ण अधिकार दिया।

प्राथमिक विद्यालयों के बाद नीतीश ने माध्यमिक विद्यालयों के पुनर्निर्माण के लिए उसी उत्साह को जारी रखा और मुफ्त साइकिल योजना शुरू की। इसके अलावा उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी ऊर्जा भरने की कोशिश की। अब तक नीतीश के किसी निहित स्वार्थ की बात नहीं सामने आई थी।

जब उन्होंने गैंगस्टरों और जबरन वसूली करने वालों को दूर करने के लिए शस्त्र अधिनियम का उपयोग कर कानून व्यवस्था को मजबूत करने का फैसला किया तब उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें अपनी कोशिशों का समर्थन करने के लिए एक राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र की आवश्यकता है।

वह महादलित निर्वाचन क्षेत्र तैयार करने की कोशिश कर रहे थे जिसमें हिंदू समाज के सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े लोगों और पसमांदा मुसलमानों को सूची में जोड़ा गया था। इसके बात तात्कालिक जरूरत यह थी कि इन समूहों को राजनीतिक समीकरण में लाया जाए।

कानून व्यवस्था में उनकी तरफ से किए गए सुधार अच्छी तरह शुरू हुए। लोग एफआईआर दर्ज कर सकते थे या जिलाधिकारी से शिकायत कर सकते थे। लेकिन इन मांगों का जवाब देने के लिए तंत्र पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं था। इससे पहले आप शिकायत नहीं कर सकते थे। अब हालात बदलने पर आप शिकायत तो कर सकते थे लेकिन शिकायत करने के बाद कुछ भी नहीं होता था क्योंकि तंत्र में तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता नहीं थी।

अपने दूसरे कार्यकाल के बाद, राज्य-निर्माण की एक व्यापक दृष्टि के अभाव की वजह से उनकी रफ्तार भी धीमी पड़ने लगी। उन्होंने शिक्षा के प्रबंधन को पंचायतों में जोड़ा और पंचायतों की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंप दी। लेकिन अफसरशाही पर बहुत अधिक निर्भर रहने के कारण एक राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र तैयार करने के उनके अभियान को झटका लगा। दिलचस्प बात यह है कि उनकी शासन शैली से जुड़े कई विचारों को केंद्र ने अपना लिया था।

उदाहरण के तौर पर उनके तीसरे कार्यकाल में बिहार मंत्रिमंडल द्वारा अपनाए गए सात निश्चय कार्यक्रम में बुनियादी ढांचे का निर्माण, सभी घरों में नल का पानी, शौचालय और जल निकासी आदि शामिल थे। जल जीवन मिशन 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया जबकि बिहार में इसकी शुरुआत पहले ही कर दी थी।

उनके पास बहुत सारे विचार थे। लेकिन उन्हें भ्रष्टाचार के बिना कैसे लागू किया जाए और इस तरह लागू किया जाए कि वे संस्थागत रूप से टिके रहेंगे? उन्हें अपने साथ अधिक लोगों को साथ लेकर चलने की जरूरत थी। ऐसा करने का एक तरीका एक मजबूत राज्य काडर तैयार करना होता है।

हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ। उनके पास ऐसी कोई पार्टी नहीं थी, जिसमें कार्यकर्ता इतने समर्पित हों कि वे घर-घर जाकर इस बात की जांच कर सकें कि क्या लाभार्थियों को वह सब कुछ मिला है या नहीं, जिनका उनसे वादा किया गया था। ऐसे में निश्चित रूप से बहुत सारी पूंजी केवल बरबाद करने के लिए तैयार की गई थी।

इसलिए अब संभवतः तेजस्वी को राज्य की बागडोर सौंपने के बाद नीतीश कुछ नया करने के लिए स्वतंत्र हो सकते हैं। आखिरकार उन्हें ऐसा करने के लिए कांग्रेस का समर्थन भी मिला हुआ है। उन्होंने वामपंथी दलों से संपर्क साधने की शुरुआत पहले ही कर दी है। निश्चित रूप से वह अपने मुख्य कौशल को फिर से भुना रहे हैं और वह है समझौते वाली वार्ता का कौशल।

First Published - April 14, 2023 | 8:19 PM IST

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