कोरोना महामारी के कारण देशभर में लॉकडाउन लगने के बाद सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में वादियों को होने वाली परेशानी जगजाहिर है क्योंकि मौजूदा न्यायाधीशों में से केवल आधे ही वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये सुनवाई कर रहे हैं। इस दौरान सुनाए जाने वाले निर्णयों में भी अभूतपूर्व कमी आई है। बहरहाल, अनगिनत पंचाटों की स्थिति तो और भी खराब है। इन पंचाटों की स्थापना इसीलिए की गई थी ताकि सामान्य अदालतों पर से काम का बोझ कम किया जा सके लेकिन इन अद्र्धन्यायिक संस्थाओं में से शायद ही किसी में पूरे सदस्य हों। बल्कि उनमें से कई का तो लंबे समय से कोई अध्यक्ष ही नहीं है। अचानक लॉकडाउन लागू होने के बाद उनकी मुश्किलों में और इजाफा हुआ है।
हाल ही में संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर ई-कॉमर्स को उपभोक्ता फोरम के दायरे में कर दिया। इन दिनों सबसे आसान है नया कानून बनाना। बहरहाल, जब तक ऐसे नियम नहीं बनते कि जो इन कानूनों को प्रभावी कर सकें तब तक वे कागजों पर ही रह जाएंगे। इस मामले में भी कानून बनाने वालों ने सर्वोच्च न्यायालय के तीन साल पुराने निर्णय का अनुपालन नहीं किया जिसमें कुछ नियमों को संशोधित करने का सुझाव दिया गया था। अदालत ने इस मामले में अनुपालन रिपोर्ट मांगी थी लेकिन यह मामला ही अदालती रोस्टर से नदारद हो गया।
इस बीच फोरम के प्रभाव को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा भी तेजी से गिरा है। दिल्ली में बीते वर्ष के दौरान शिकायतों में 17 प्रतिशत की गिरावट आई और लॉकडाउन के बाद यह 77 प्रतिशत हो गई। ई-फाइलिंग की सुविधा से भी हालात में सुधार नहीं आया। हालांकि कानून कहता है कि शिकायत का निस्तारण छह महीने में हो जाना चाहिए लेकिन तीन वर्ष की प्रतीक्षा न्यूनतम हो चली है। कई फोरम और अपील संस्थाओं में कोई अध्यक्ष अथवा न्यायिक सदस्य नहीं है। इसका नतीजा यह है कि मामले सुनवाई के अंतिम स्तर पर वर्षों तक लटके रहते हैं क्योंकि उनके बिना निर्णय नहीं सुनाया जा सकता है। मौजूदा चलन के मुताबिक एक पंचाट के अध्यक्ष को दूसरे पंचाट के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा जाता है। नतीजा यह कि 630 पंचाटों में से कोई भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही।
अन्य पंचाटों की स्थिति भी कतई बेहतर नहीं है। बौद्धिक संपदा अपील बोर्ड (आईपीएबी) के पास टे्रड मार्क, कॉपीराइट, पेटेंट तथा पौधों की किस्मों का संरक्षण आदि जैसे कई तरह के काम हैं। परंतु सन 2003 में गठन के बाद से ही इसकी स्थिति अच्छी नहीं। माइलान लैबोरेटरीज के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक रिपोर्ट तलब की थी जिसमें कुछ महीने पहले सरकार ने कहा कि ट्रेड मार्क, कॉपीराइट या पेटेंट आदि के मामलों पर सुनवाई नहीं हो रही है क्योंकि इसके लिए जरूरी तकनीक रूप से सक्षम सदस्य नहीं है। पेटेंट की अवधि केवल 20 वर्ष है और कई मामलों में कोरम की कमी के कारण पेटेंट की अवधि ही समाप्त हो गई और मामलों का उद्देश्य ही समाप्त हो गया। इससे संबंधित पक्ष के अधिकार की भी हानि हुई।
आईपीएबी के अध्यक्ष के कार्यकाल में बार-बार इजाफा किया गया क्योंकि सरकार कोई नया नाम पेश नहीं कर सकी। पिछले सप्ताह भी सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार ऐसा किया। एक तकनीकी सदस्य है ताकि बोर्ड कृत्रिम तरीके से संचालित रहे। मूल रूप से उनकी नियुक्तिपौधों की किस्मों के संरक्षण संबंधी अधिनियम से जुड़ी अपीलों के लिए तकनीकी सदस्य के रूप में की गई थी। अब वह टे्रड मार्क, पेटेंट कॉपीराइट और चीजों के ज्योग्राफिकल इंडिकेशन के मामलों में भी तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहे हैं।
सरकार आमतौर पर विधान के माध्यम से धूमधाम से पंचाट की शुरुआत करती है और इसके बाद बुनियादी ढांचे, फंड और कर्मचारियों की कमी के साथ उसके हाल पर छोड़ देती है। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट जैसे कई पंचाट और प्रशासनिक पंचाट को तो सर्वोच्च न्यायालय में लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ा क्योंकि सेवानिवृत्त अफसरशाहों को शामिल करने के लिए कानून बनाए जा रहे थे। न्यायाधीशों ने जोर दिया कि इनका मुखिया न्यायिक क्षेत्र से होना चाहिए। सरकार उनके सामने झुक गई और पंचाटों की नाकाम यात्रा शुरू हुई। पिछली गिनती के वक्त 36 पंचाट थे। हालांकि उनमें से कई का विलय होने के बाद तादाद कम हुई होगी। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट और अचल संपत्ति नियमन एवं विकास अधिनियम अपेक्षाकृत नए पंचाट हैं। शायद यही वजह है कि उनकी परिणति अब तक दीवानी अदालतों और अन्य पंचाट जैसी नहीं हुई है। इस समय अधिकांश पंचाट मृतप्राय हैं और उनमें नई जान फूंकने के लिए भारी भरकम व्यय और कड़ी मेहनत की जरूरत होगी।