भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता संपन्न हो जाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके बीच द्विपक्षीय वार्ता रुक-रुककर 2007 से ही चल रही थी। यह तो सही है कि पिछले साल भूराजनीतिक दबावों के कारण एफटीए वार्ताओं में तेजी आई मगर यह भी स्वीकार करना होगा कि भारत ने अपने एफटीए साझेदारों का दायरा बढ़ाया है और इसमें विकसित तथा विकासशील दोनों श्रेणियों के देश हैं। हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौतों में प्रावधानों का विस्तार और उनकी गहराई भी साफ नजर आती है।
यूनाइटेड किंगडम के साथ एफटीए में खास तौर पर यह दिखा, जहां करीब 90 फीसदी उत्पादों पर शुल्क कम हुआ, पर्यावरण तथा श्रम मानक शामिल किए गए और शुल्क दरों का कोटा तय करते हुए कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश भी दिया गया। पता चला है कि यूरोपीय संघ के साथ हाल में हुए व्यापार समझौते में भी ऐसी ही बातें हैं। अब यह जरूरी हो गया है कि भारत इसी व्यापार नीति के साथ आगे बढ़े।
सबसे पहले यूरोपीय संघ के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर की बची औपचारिकताएं अगले कुछ महीनों में पूरी कर ली जानी चाहिए। इससे समझौते को यूरोपीय संसद की मंजूरी मिलना पक्का हो जाएगा। मंजूरी की प्रक्रिया में आम तौर पर एक साल लग जाता है और इस प्रकार यह प्रक्रिया अगले वित्त वर्ष तक पूरी हो सकेगी। इसे तेजी से पूरा करना जरूरी है क्योंकि अनिश्चितता भरे अमेरिकी बाजारों से इतर बाजार में विविधता लाना अनिवार्य हो चुका है।
दूसरी बात, हाल के वर्षों में हुए मुक्त व्यापार समझौतों के जरिये उनके बाजारों में मिली प्राथमिकता का पूरा फायदा उठाने के लिए आगे की कार्ययोजना स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। यह मानना आवश्यक है कि वियतनाम जैसी हमारी तरह विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को इन बाजारों में पहले पहुंचने की वजह से बढ़त हासिल है।
उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया के कुल परिधान आयात में भारत और वियतनाम की हिस्सेदारी देखें तो 2022 से वियतनाम की हिस्सेदारी भारत की तुलना में काफी बढ़ गई है, जबकि उसी साल भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसलिए विनिर्माण को बढ़ावा देने और निर्यात की होड़ में मजबूती हासिल करने के लिए क्षेत्र विशिष्ट प्रयास और व्यापक व्यापार नीति उपाय जरूरी हैं। नियामकीय सहजता, मदद करने वाली सीमाशुल्क प्रक्रियाएं और जरूरी कच्चे माल एवं सामग्री पर आयात शुल्क में कमी व्यापार नीति के फौरी एजेंडा में शामिल होनी चाहिए। उन क्षेत्रों के लिए यह खास तौर पर महत्त्वपूर्ण है, जिनमें निर्यात और रोजगार की संभावनाएं हैं।
इन नीतियों के साथ-साथ 2016 की आदर्श द्विपक्षीय निवेश संधि की लंबे समय से अटकी समीक्षा भी निर्यातोन्मुखी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने में सहायक होगी, जिसका लक्ष्य यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ हालिया मुक्त व्यापार समझौतों में रखा गया है।
तीसरी बात, भारत को अगली पीढ़ी के बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में भी भागीदारी करनी होगी। यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के साथ द्विपक्षीय समझौता कर लेने और 27 सदस्यों वाले यूरोपीय संघ के साथ समझौते पर राजी हो जाने के बाद अब भारत व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते (सीपीटीपीपी) में प्रवेश के लिए बातचीत कर सकता है।
नवंबर 2025 के मेलबर्न शिखर सम्मेलन में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) और यूरोपीय संघ के साथ संवाद साझेदारी को औपचारिक जामा पहनाने के बाद सीपीटीपीपी नियम-आधारित व्यापार की नई धुरी बनकर उभरा है। उसके साथ अब दुनिया के दो सबसे अधिक व्यापार केंद्रित समूहों का गठबंधन मौजूद है। इसके अलावा दो अन्य समूहों – उत्तर अमेरिका और मर्कोसुर – से कनाडा, मेक्सिको, चिली, पेरू जैसे इसके सदस्य और जल्द ही सदस्य बनने जा रहा उरुग्वे भी सीपीटीपीपी को विश्व व्यापार और संस्थाओं के सामने आ रही चुनौतियों के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई और सहयोग जुटाने में सबसे सक्षम बना देते हैं।
एक बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौते से मूल्यवर्द्धन संचयन का फायदा भी मिलता है, जो मूल स्रोत के लचीले नियमों के कारण आसान हो जाता है। इससे सदस्य अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी करने का मौका मिल जाता है। उदाहरण के लिए सीपीटीपीपी में स्रोत के नियम से क्षेत्रीय मूल्यवर्द्धन का संचय हो जाता है।
सभी सदस्य देशों में तैयार कच्चे माल और घटकों को निर्यात कर रहे सदस्य देशों से ‘मूल स्रोत’ का दर्जा मिल सकता है और इस तरह तरजीह भी दी जा सकती है। आसियान और यूरोपीय संघ जैसे दो साझेदारों के बीच मूल्यवर्द्धन संचय हुआ तो सीपीटीपीपी नियम-आधारित आर्थिक एकीकरण का गतिशील, वैश्विक केंद्र बन सकता है। इसलिए भारत को सीपीटीपीपी में भाग लेने का अपना इरादा बताने में देर बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
इस बात पर ध्यान देना भी आवश्यक है कि सीपीटीपीपी एक जीवंत समझौता है। हर पांच साल में इसकी शर्तों और प्रावधानों की समीक्षा होगी ताकि इसकी प्रासंगिकता और उच्च मानक बरकरार रह सकें। इसकी शर्तें एक दशक पहले तैयार हुई थीं, जब यह अमेरिकी नेतृत्व वाला प्रशांत पार समझौता था। 2018 में जब अमेरिका ने इसे छोड़ दिया तो इसे सीपीटीपीपी का रूप देने के लिए थोड़े बदलाव ही किए गए। पहली समीक्षा 2023 में शुरू और 2025 में खत्म हुई। उसमें समझौते के अधिकांश प्रावधानों में संशोधन और सुधार की सिफारिश की गई है।
इस बीच विश्व व्यापार के माहौल में नाटकीय परिवर्तन होने के कारण इससे कोई हैरत नहीं हुई। सीपीटीपीपी के सदस्य देशों ने 2026 में संशोधन प्रक्रिया पूरी करने का संकल्प लिया है। भारत को लगातार हो रहे इन बदलावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए ताकि लगातार बड़े हो रहे इस क्षेत्रीय व्यापार समझौते में भागीदारी के लिए वह तैयार रहे।
यह भी जरूरी है कि सीपीटीपीपी में चीन के नहीं होने का फर्क इसमें भाग लेने के भारत के फैसले पर नहीं पड़े। चीन ने सीपीटीपीपी की सदस्यता के लिए एकदम शुरुआत में आवेदन कर दिया था और 2021 में उसी महीने ताइवान ने भी आवेदन कर दिया। चीन ‘ऑकलैंड सिद्धांतों’ के कारण अभी तक सीपीटीपीपी का सदस्य नहीं बन पाया है क्योंकि उनके मुताबिक यह साबित होना चाहिए कि आवेदक देश व्यापार प्रतिबद्धताओं का पालन करता है, समझौते के उच्च मानक पूरे कर सकता है और सीपीटीपीपी के सदस्य उसके आवेदन पर विचार करने के लिए राजी होने चाहिए।
अभी तक सदस्यता के आवेदनों पर क्रम से विचार नहीं किया गया है। बाद में आवेदन करने वाले उरुग्वे और संयुक्त अरब अमीरात के आवेदनों पर अब विचार किया जा रहा है ताकि 2026 में उन्हें सदस्यता दी जा सके। लेकिन जिस तरह दुनिया चीन के साथ व्यापार विवाद सुलझा रही है और व्यापार समझौते कर रही है, उसे देखते हुए हालात शायद बहुत समय तक ऐसे ही नहीं बने रहें।
कुल मिलाकर 2026 में भारत का एफटीए एजेंडा द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में भागीदारी करना और घरेलू व्यापार नीति में ठोस सुधार करना होना चाहिए।
(लेखिका जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। लेख में निजी विचार हैं)