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क्या खत्म हो रहा है स्थायी दोस्ती का दौर? ट्रंप की नीतियों ने हिला दी वैश्विक गठबंधनों की बुनियाद

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बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और अमेरिकी आर्थिक दबावों के बीच वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है

Last Updated- February 06, 2026 | 10:30 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अमेरिका और कनाडा के बीच आखिरी सैन्य संघर्ष 1812 में हुआ था। कनाडा उस समय ब्रिटेन का उपनिवेश था। अमेरिका और कनाडा की सरहद लंबे समय से खुली रही हैं और उन्होंने कई बार एक ही पाले में युद्ध लड़े हैं। अमेरिका का जर्मनी और जापान के साथ आखिरी सैन्य संघर्ष 1945 में हुआ था। तब से ये दोनों देश उसके साथी ही हैं। अमेरिकी डॉलर में आखिरी बार गिरावट 1971 में आई, जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने स्वर्ण मानक को छोड़कर डॉलर को वैश्विक बेंचमार्क या मानक मुद्रा के रूप में स्थापित किया। 

जब गठबंधन इतने लंबे समय तक टिकते हैं, तो उन्हें स्थायी मान लिया जाता है। लेकिन कहावत है कि देशों के स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं। और डॉनल्ड ट्रंप ने इस ‘स्थायित्व’ को कमजोर कर दिया है।

कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने के व्हाइट हाउस के आह्वान के बाद खबरें आईं कि कनाडा अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका को ध्यान में रखते हुए आकस्मिक योजनाएं बना रहा था। ग्रीनलैंड पर ट्रंप के घोषित इरादों ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) गठबंधन को टूटने के कगार पर पहुंचा दिया है।

मान लीजिए कि कनाडा या ग्रीनलैंड के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका खत्म हो जाती है। फिर भी आर्थिक संघर्ष बढ़ना लगभग तय है। यूरोपीय संघ (ईयू), ब्रिटेन, जापान, कनाडा और अमेरिका के अन्य सहयोगी देशों के बीच टैरिफ और जवाबी टैरिफ की लड़ाई शुरू हो सकती है। ईयू और अन्य व्यापारिक साझेदार कई अन्य आर्थिक उपायों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए अमेरिका पर लगभग 38 लाख करोड़ डॉलर के राष्ट्रीय ऋण का भारीभरकम बोझ है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से भी अधिक है। इस ऋण का लगभग 7-8 लाख करोड़ डॉलर हिस्सा विदेशी संस्थाओं के पास है। वर्ष 2025 में इसका व्यापार घाटा लगभग 1 लाख करोड़ डॉलर था और इसे नियमित रूप से नए ऋण की नीलामी करनी पड़ती है। यदि विदेशी संस्थाएं नया ऋण खरीदने से इनकार कर देती हैं, तो बॉन्ड बाजार में यील्ड बढ़ जाएगी, जिसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था (और वैश्विक बाजारों) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि विदेशी निवेशक अपने पास मौजूद अमेरिकी ऋण बेचना शुरू कर देते हैं, तो भी यील्ड में भारी उछाल आएगी, जिसका अमेरिका पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।

फिलहाल और पिछले लगभग 50 साल में अमेरिका ने विदेशी ऋण सहित बड़े ऋण की परवाह नहीं की है, क्योंकि उसकी स्थिति बेजोड़ है। वह आसानी से मुद्रा छाप सकता है (या समान इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन कर सकता है) और उसे लेनदारों को सौंप सकता है, क्योंकि डॉलर विश्व की आरक्षित मुद्रा है। लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी।

अमेरिका की बेतुकी और असंगत नीति को देखते हुए वैश्विक व्यापार को अमेरिका से और परिणामस्वरूप डॉलर से अलग करने के प्रयास किए जा रहे हैं। निश्चित रूप से दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को नए सिरे से ऐसे तैयार करने की कोशिश में हैं कि अमेरिका पर उनकी निर्भरता या तो कम हो जाए या खत्म ही हो जाए। चीन अपनी मुद्रा रेनमिनबी में व्यापार खातों के निपटान की वैकल्पिक प्रणाली पर जोर दे रहा है। ईरान जैसे प्रतिबंध झेल रहे देशों को भी शायद यही रास्ता अपनाना पड़े। अगर भविष्य में कभी अमेरिका और अधिक शुल्क तथा प्रतिबंधों की धमकी देता है तो भारत भी इस तरह की व्यवस्था पर विचार कर सकता है।

यूरोपीय संघ भी और जवाबी कार्रवाई कर सकता है। फ्रांस के अर्थशास्त्री गैब्रियल जकमैन जैसे कुछ अतिवादियों ने सुझाव दिया है कि अमेरिका की कंपनियों को यूरोपीय संघ में प्रवेश तभी मिलना चाहिए, जब अमेरिकी अरबपतियों पर संपत्ति कर लगे। अमेरिकी अर्थशास्त्री डीन बेकर ने एक अलग बयान में इससे भी अधिक चरम उपायों का सुझाव दिया है।

उनका सुझाव है कि यूरोपीय संघ अमेरिकी पेटेंट, कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा को मान्यता ही नहीं दे। ऐसे किसी भी कठोर कदम से वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक उथल-पुथल मच जाएगी। लेकिन जकमैन और बेकर के तर्क पर जाएं तो रिपब्लिकन पार्टी को चंदा देने वाले धनकुबेरों पर इससे अमेरिका में सत्ता परिवर्तन की मांग करने का दबाव पड़ सकता है।

इनमें से कुछ भी होता है तो कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का यह चर्चित बयान सच हो सकता है कि यह ‘परिवर्तन नहीं, बल्कि दरार’ है। इन सभी अनिश्चितताओं का अंतिम परिणाम कुछ भी हो, वैश्विक बाजार तगड़े उतार-चढ़ाव और बेढंगे व्यवहार की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। यही कारण है कि सोना, चांदी और प्लेटिनम में लगातार तेजी बनी हुई है।

विश्व व्यापार में भारत की व्यापक भागीदारी के कारण भारतीय बाजार भी वैश्विक बाजार की धारणा से बहुत जुड़े हुए हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने 2025 में लगभग 1.6 लाख करोड़ डॉलर के शेयर बेच दिए और भारतीय शेयर बाजार का मूल्य इसीलिए बरकरार रहा क्योंकि देसी म्युचुअल फंडों में खुदरा निवेश होता रहा।

डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर प्रदर्शन की वजह एफपीआई की बिकवाली भी रही और खुद डॉलर का प्रदर्शन भी ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद से अन्य मजबूत मुद्राओं के मुकाबले कमजोर रहा है। यदि एफपीआई की बिकवाली बढ़ती है और वैश्विक बाजार और गिरते हैं तो बाजार में मंदी को घरेलू निवेश ही नहीं रोक पाएगा। ट्रेडर इसका स्वागत कर सकते हैं और निवेशकों को इस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

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First Published - February 6, 2026 | 10:30 PM IST

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