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लालच की वजह से बढ़ा वित्तीय क्षेत्र में जो​खिम

Last Updated- March 31, 2023 | 11:18 PM IST
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अमेरिकी और यूरोपीय नियामकों ने बुनियादी जो​खिम प्रबंधन की अनदेखी की। उन्होंने वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों को जमाकर्ताओं के पैसे से ​खिलवाड़ करने की इजाजत क्यों दी? बता रहे हैं जैमिनी भगवती

गत 27 मार्च को फर्स्ट सिटिजन बैंक (एफसीबी) ने सिलिकन वैली बैंक (एसवीबी) का अधिग्रहण कर लिया। उसे अमेरिकी फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एफडीआईसी) से उल्लेखनीय वित्तीय सहायता हासिल थी। मेरे कॉलेज के दिनों के एक मित्र ने पूछा कि एसवीबी का पतन क्यों हुआ। उसके सवाल में निहित प्रश्न यह था कि क्या 2008-09 में उत्तर अटलांटिक वित्तीय संघर्ष के बाद अमेरिका में अतिरिक्त नियामकीय नियंत्रण अपनाने से क्या ऐसी नाकामी को रोकने में मदद मिलती? 

इसका एक सं​क्षिप्त स्पष्टीकरण तो यह है कि बीते कई वर्षों के दौरान अमेरिका में नियामकीय मामलों में खतरे के निशान धुंधले पड़े हैं। उदाहरण के लिए जुलाई 2010 का डॉड-फ्रैंक वॉल स्ट्रीट सुधार और उपभोक्ता संरक्षण कानून को मई 2018 में इकनॉमिक ग्रोथ, रेग्युलेटरी रिलीफ ऐंड कज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट पारित करके काफी नरम कर दिया गया।

बहरहाल, एसवीबी का पतन लीमन ब्रदर्स की तरह नहीं हुआ। ब​ल्कि एसवीबी के पास लंबी परिपक्वता सीमा वाले बॉन्ड का भारी भरकम भंडार और अल्पा​व​धि की उधारी वाले लोन पोर्टफोलियो थे। एसवीबी की व्य​क्तिगत जमा में करीब 90 फीसदी एफडीआईसी की 2,50,000 डॉलर की बीमा सीमा से अ​धिक के थे। संक्षेप में कहें तो एसवीबी तथा अमेरिका के अन्य मझोले बैंकों ने बहुत बड़ा जो​खिम उठाया था। इससे उनकी देनदारियों और परिसंप​त्तियों के बीच परिपक्वता का भारी अंतर उत्पन्न हो गया था।

मीडिया में प्रका​शित खबरों के मुताबिक करीब 4,700 अमेरिकी बैंक जिनके पास करीब 10.5 लाख करोड़ डॉलर की संप​त्ति है, वे ऐसे ही व्यवहार के कारण नकदी की दिक्कत का सामना कर रहे हैं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इन बैंकों को उनकी दीर्घाव​धि की परिसंपत्तियों के बरअक्स ऋण प्रदान कर रहा है। अब नि​ष्क्रिय हो चुका ज्यूरिख मुख्यालय वाला क्रे​डिट सुइस सन 1856 में स्थापित किया गया था ताकि रेलवे के निर्माण के ​लिए जरूरी फंड उपलब्ध करा सके।

हाल के वर्षों में क्रेडिट सुइस को बार-बार मु​श्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि वह निवेश बैंकिंग में परिसंप​त्ति प्रबंधन के अपने मूल काम से दूर हो गया था। अंत में 19 मार्च, 2023 को ​स्विस सरकार के जोर देने पर यूबीएस ने 3.2 अरब डॉलर की रा​शि खर्च करके क्रेडिट सुइस को खरीद लिया।

इसके अलावा जानकारी के मुताबिक ​स्विस सरकार यूबीएस को 9 डॉलर की रा​शि देने पर सहमत हो गई है। क्रेडिट सुइस के पतन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ इंगलैंड और जी7 देशों के अन्य केंद्रीय बैंकों ने अपने प्रयासों को सम​न्वित किया ताकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाई जा सके।

यहां तक कि एमबीए फाइनैंस जैसे बुनियादी पाठ्यक्रम भी यह पढ़ाते हैं कि परिसंप​त्तियों और देनदारियों के मिलान की संशो​धित अव​धि, जो​खिम प्रबंधन का एक प्राथमिक उपाय है। बैंकों के लिए उच्च तयशुदा ब्याज दर वाली परिसंप​त्तियों को फंड करना हमेशा से लुभावना रहा है जहां फ्लोटिंग ब्याज दर उधारी कम होती है। एसवीबी ने भी ऐसा ही किया और उसकी उधारी पुनर्मूल्यांकित हुई क्योंकि फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और बैंक ऑफ इंगलैंड ने पिछले 12 महीनों में मानक ब्याज दरों में तेजी से इजाफा किया।

क्या नियामकों ने बैंकों समेत वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों को करदाताओं के पैसे के साथ यह जो​खिम उठाने दिया? इस बात को फिल्म वॉल स्ट्रीट के एक दृश्य से समझा जा सकता है जिसमें माइकल डगलस द्वारा शानदार तरीके से निभाया गया गॉर्डन गेक्को का किरदार वित्तीय क्षेत्र के बारे में आत्मसंतु​ष्टि की भावना के साथ कहता है, कि वित्तीय क्षेत्र में ‘लालच अच्छा है।’ उसी फिल्म के सीक्वल वॉल स्ट्रीट 2 में गेक्को का किरदार कहता है, ‘लालच अब कानूनी है।’ भले ही ये बातें मखौल के रूप में कही गई हों लेकिन मोटे तौर पर यह बात अमेरिका तथा प​श्चिमी यूरोप में वित्तीय क्षेत्र के कई दिग्गजों के आचरण पर लागू होती हैं।

एक सवाल यह भी है कि क्या भारत के निजी या सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के वरिष्ठ प्रबंधकों को इसका अनुसरण करना चाहिए? गड़बड़ियों की घटनाएं, उदाहरण के लिए इंड​स्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (आईडीबीआई), येस और आईसीआईसीआई बैंकों के प्रमुखों द्वारा की गई गड़बड़ियां व्य​क्तिगत लालच का परिणाम थीं। यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (यूटीआई) और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की स्थापना सरकारी की बहुलांश हिस्सेदारी वाले संस्थानों मसलन भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) और सरकारी बैंकों की फंडिंग की मदद से की गई थी।

यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) और एनएसई ने धीरे-धीरे निजी क्षेत्र का दर्जा हासिल कर लिया और उनके शीर्ष प्रबंधन को सालाना 5 से 8 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाने लगा। अ​धिक बड़े और व्यव​स्थागत दृ​ष्टि से महत्त्वपूर्ण वित्तीय संस्थान मसलन भारतीय स्टेट बैंक और एलआईसी के प्रमुखों को यूटीआई एएमसी और एनएसई के प्रमुखों की तुलना में बहुत कम भुगतान किया जाता है।

यह तथ्य है कि भारत के सरकारी बैंकों को कई अवसरों पर करदाताओं का धन दिया गया वहीं इन बैंकों का कर्ज चुकाने में नाकाम रहे कर्जदार अनिवार्य तौर पर बड़ी निजी कंपनियां थीं। आमतौर पर उन पर व्यव​स्थित जो​खिम के प्राथमिक स्रोत के रूप में अंगुली नहीं उठाई गईं। दुर्भाग्यवश ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता भी निजी क्षेत्र के कर्जदारों तथा कम क्षमतावान न्यायाधीशों के कारण धीरे-धीरे कम धारदार होती जा रही है।

धीरे-धीरे यह मान्यता गहरी हो गई कि निजी क्षेत्र के सूचीबद्ध वित्तीय संस्थानों में लालच से संचालित गलतियां होने की संभावना कम होती है क्योंकि शेयर बाजारों का अनुशासन अतिरिक्त जो​खिम लेने पर लगाम लगाएगा। अदाणी समूह की कंपनियां इस बात का उदाहरण हैं कि बाजार कैसे शेयरों के मूल्यांकन के मामले में गलत हो सकता है। 

न्यूयॉर्क टाइम्स में 21 मार्च को एसवीबी के पतन पर प्रका​शित रिपोर्ट में कहा गया है, ‘माइकल बार, जिन्हें राष्ट्रपति बाइडन ने निगरानी के लिए फेडरल रिजर्व का वाइस चेयरमैन नियुक्त किया था, वह नाकामी के पहले बैंकों की निगरानी पर समग्र समीक्षा कर रहे थे।’ यहां समग्र शब्द पर ध्यान दीजिए। व्हार्टन स्कूल में वित्तीय नियमन के असोसिएट प्रोफेसर पीटर कॉ​न्टि-ब्राउन के मुताबिक, ‘काफी हद तक जिम्मेदारियों को एक दूसरे पर टाला जाता है।’

गैर जिम्मेदार वित्तीय क्षेत्र की जो​खिम लेने की प्रक्रिया को कम करने का इकलौता तरीका है इस पेशे में मौद्रिक क्षतिपूर्ति को कम करना। इतना कम कोई भी केवल तीन-चार वर्षों में कई पीढि़यों का धन न जुटा सके। कार्ल मार्क्स ने कहा था, ‘इतिहास खुद को दोहराता है, पहले त्रासदी के रूप में और फिर प्रहसन के रूप में।’ यह दिलचस्प है कि 19वीं सदी के सर्वहाराओं के नेता की यह टिप्पणी 21वीं सदी में वित्तीय क्षेत्र के पतन के मामले में इतनी सटीक है। 

(लेखक भारत के पूर्व राजदूत एवं वर्तमान में सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के फेलो हैं)

First Published - March 31, 2023 | 11:18 PM IST

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