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हिमाचल उप-चुनाव भाजपा के लिए खतरे का संकेत

Last Updated- December 11, 2022 | 11:35 PM IST

हिमाचल प्रदेश में विगत 2 नवंबर को हुए उप-चुनावों के नतीजे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए शर्मनाक रहे। उप-चुनावों में पार्टी तीन विधान सभा सीट में से एक भी नहीं जीत पाई और मंडी लोक सभा सीट भी इसके हाथ से निकल गई। इन नतीजों पर राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि  उच्च महंगाई और भितरघात पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार रहे।
केंद्रीय मंत्री एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर ने अगले दिन एक अलग तर्क दिया। उन्होंने कहा कि अगर महंगाई हार की वजह होती तो भाजपा को देश के दूसरे राज्यों में उप-चुनावों में जीत नहीं मिली होती। उन्होंने कहा कि पार्टी को नतीजों की विवेचना करनी होगी और आगामी राज्य विधान सभा चुनाव में एक सटीक रणनीति के साथ चुनावी समर में उतरना होगा।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं हिमाचल प्रदेश से ही ताल्लुक रखने वाले जे पी नड्डा ने सार्वजनिक तौर पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई और न ही इसमें वर्चुअल रूप से भाग लेने वाले जयराम ठाकुर ने कोई स्पष्टीकरण दिया। पहले पार्टी की हार का आकलन करते हैं।
 भाजपा के राम स्वरूप शर्मा ने 2019 में 4.5 लाख मतों के भारी अंतर से मंडी लोक सभा सीट जीती थी। बाद में कोविड-19 से संक्रमित होने और इसके दूसरे दुष्प्रभावों की वजह से शर्मा का निधन हो गया। इससे वहां उप-चुनाव की नौबत आई। मंडी लोक सभा सीट में 17 विधान सभा क्षेत्र आते हैं। लाहौल एवं स्पीति सहित अपेक्षाकृत अधिक विकसित कुल्लू और मनाली भी मंडी लोक सभा क्षेत्र का ही हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री का विधान सभा क्षेत्र सिराज भी मंडी में ही है। कांग्रेस 2017 के विधान सभा चुनाव में 17 सीट में केवल तीन पर विजयी रही। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार विजय रहा और शेष सभी सीटें भाजपा की झोली में चली गईं। भाजपा को 2019 के लोक सभा चुनाव में सभी सीटों पर बढ़त हासिल हुई।
अब बात करते हैं 2021 की। अगर आप उसी नतीजे का अध्ययन दूसरे तरीके से करें तो भाजपा 17 में आठ सीट पर विजयी रही जबकि कांग्रेस नौ सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रही। कांग्रेस की उम्मीदवार (पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह) 40,000 से भी कम मतों से मंडी लोक सभा सीट से विजयी हुईं। मगर भाजपा को एक के बाद एक विधान सभा क्षेत्र में नुकसान उठाना पड़ा। लाहौल स्पीति का प्रतिनिधित्व राज्य मंत्रिमंडल में राम लाल मरकंडा करते हैं। वह तकनीकी शिक्षा मंत्री हैं। यहां भाजपा अपनी प्रतिस्पद्र्धी कांग्रेस से पीछे रही। मनाली का प्रतिनिधित्व करने वाले गोविंद ठाकुर भी मंत्री हैं। यहां भी पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ हो गई।
पार्टी तीनों विधान सभा उप-चुनाव हार गई। जुब्बल कोटखाई में तो भाजपा की उम्मीदवार नीलम सरैइक जमानत तक नहीं बचा पाईं। भाजपा के बागी चेतन बरागटा भी हार गए मगर उन्होंने पार्टी को नुकसान जरूर पहुंचाया। उन्होंने इसलिए बगावत कर दी कि पहले मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि वह पार्टी के उम्मीदवार होंगे मगर जब उम्मीदवारों की सूची आई तो इसमें आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में सरैइका का नाम था।
क्या यह उप-चुनावों के नतीजों का जरूरत से अधिक विश्लेषण तो नहीं है? बिल्कुल नहीं। उप-चुनावों से यह पता चलता है कि चुनाव में किस कारण से किसी पार्टी की जीत या हार हुई है। अगर जयराम ठाकुर के अनुसार उप-चुनावों में भाजपा की हार की वजह आंतरिक कलह था तो इसका कारण यह है कि भाजपा के दूसरे बड़े नेता धूमल जयराम को पूरे हिमाचल प्रदेश का नेता नहीं मानते हैं। ठाकुर और धूमल में प्रतिस्पद्र्धा रही है। भाजपा ने 2017 में ठाकुर की वजह से धूमल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। धूमल अक्सर कहते हैं कि ठाकुर मंडी के मुख्यमंत्री हैं (मुख्यमंत्री अपना ज्यादातर समय अपने विधानसभा क्षेत्र सिराज में बिताते हैं)।
हालांकि हार की यह एकमात्र वजह नहीं थी। बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर भाजपा के अधूरे वादे से भाजपा की विश्वसनीयता पर दाग लगा है। उदाहरण के लिए कीरतपुर से मनाली तक राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा बनाए जाने का प्रस्ताव था। यह मुद्दा 2014 से ही गरम है मगर भाजपा स्वयं ही अपर्याप्त मुआवजे का हवाला देकर इस परियोजना का विरोध करती रही है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी लगातार कहते रहे हैं कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इस मुद्दे का समाधान खोजने का प्रयास करेगा। मगर अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है। इस बीच, कुछ भाजपा नेताओं ने एनएचएआई से समझौता कर विस्तार योजना की रूपरेखा में थोड़ा बदलाव कराकर मुआवजे के रूप में मोटी रकम ले ली। दूसरी तरफ मगर अपनी जमीन गंवाने का जोखिम झेल रहे किसानों को अधर में छोड़ दिया गया है।
इन बातों का यह कतई मतलब नहीं है कि पिछले सात वर्षों से केंद्र में भाजपा के सत्तासीन होने के दौरान हिमाचल प्रदेश में कोई विकास नहीं हुआ है। मगर विकास असमान रूप से हुआ है और यह दिखता भी है। इससे वहां के लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। धूमल के पुत्र अनुराग हिमाचल प्रदेश में भाजपा की अगली पीढ़ी के नेताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। राज्य में पार्टी की पैठ बढ़ाने में उनका योगदान फिलहाल काफी कम है। आखिर, कोई अपना समय क्यों बरबाद करें जब सभी लोगों को यह लग रहा है कि भाजपा के लिए अगला विधान सभा चुनाव जीतना कठिन होगा? अगर राज्य में भाजपा अपनी संभावनाएं सुधारने के लिए तेजी से कदम नहीं उठाती है तो अनुराग ठाकुर और धूमल के पास खुश होने की एक वजह जरूर होगी।

First Published - November 12, 2021 | 11:46 PM IST

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