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Editorial: सेबी की बोर्ड बैठक में कई नियामक बदलावों की घोषणा; म्यूचुअल फंड, पैसिव स्कीमों के लिए अपेक्षाकृत हल्के मानक

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सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कई खुलासा मानकों को सहज बनाने के अलावा परिणामों का मीडिया में विस्तृत विज्ञापन भी वैकल्पिक बना दिया गया है।

Last Updated- October 01, 2024 | 10:32 PM IST
SEBI

बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की बोर्ड बैठक में नियमन में कई बदलावों की घोषणा की गई। सेबी चेयरपर्सन के खिलाफ हितों के टकराव के आरोपों और खराब कार्यसंस्कृति के आरोपों के बीच नियामक काफी दबाव में था। ये दोनों ही विषय बोर्ड मीटिंग के एजेंडे में नहीं थे।

बोर्ड ने कई बदलाव पेश किए। उदाहरण के लिए म्युचुअल फंड के लिए एक नई प्रस्तावित परिसंपत्ति श्रेणी और पैसिव स्कीम के लिए अपेक्षाकृत हल्के मानक पेश किए गए। पैसिव स्कीम में वे म्युचुअल फंड आते हैं जो मानक सूचकांकों का अनुकरण करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सेबी का ध्यान कारोबारी सुगमता बढ़ाने पर है।

नियामक के वक्तव्य में इसका इस्तेमाल कई बार किया गया। जो उपाय अपनाए गए हैं उनमें से कई पर अतीत में मशविरा पत्रों के माध्यम से चर्चा की जा चुकी है। सेबी के बोर्ड ने कम खुलासों, राइट इश्यू के लिए तेज प्रक्रिया, टी प्लस 0 सेटलमेंट (शेयरों के कारोबार का उसी दिन निपटान) का विस्तार और टी प्लस 0 सेटलमेंट साइकिल के तहत ब्लॉक हुए सौदों के लिए वैकल्पिक प्रणाली आदि पर सहमति जताई। उसने भेदिया कारोबार नियमन की रोकथाम का दायरा बढ़ाया।

खुदरा निवेशकों को यह इजाजत होगी कि वे एकीकृत भुगतान इंटरफेस ब्लॉक व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकेंगे जो प्राथमिक इश्यू के लिए रोकी गई राशि समर्थित ऐप्लीकेशन (एएसबीए) के समान होगी।

उदाहरण के लिए नई परिसंपत्ति श्रेणी ‘निवेश रणनीति’ को पहले चर्चा किए जा चुके ढांचे के अधीन रखा जा रहा है। इसका इरादा पारंपरिक म्युचुअल फंड और पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं के बीच के अंतर को पाटना है।

10 लाख रुपये की न्यूनतम सीमा तय करके वह यह सुनिश्चित करने का काम करेगी कि केवल अपेक्षाकृत अमीर निवेशक और जोखिम ले सकने वाले ही भागीदारी कर सकें। इससे गैर पंजीकृत योजनाओं को बाजार से बाहर करने में मदद मिलेगी।

म्युचुअल फंड लाइट के ढांचे पर भी चर्चा हुई। यह विशुद्ध संपत्ति, पुराने प्रदर्शन और प्रायोजकों के मुनाफे की आवश्यकता को कम करके नए कारोबारियों के लिए पैसिव प्रबंधन वाले फंड में प्रवेश आसान बनाता है। न्यासियों पर अनुपालन का अधिक बोझ नहीं होगा और पैसिव योजनाओं की शुरुआत के लिए मंजूरी प्रक्रिया को सुसंगत बनाया जाएगा। इससे प्रतिस्पर्धा और निवेशकों के समक्ष निवेश विकल्प बढ़ेंगे।

एक राइट इश्यू की प्रोसेसिंग की अवधि को कम करके अधिकतम 23 कार्य दिवस किया जा रहा है जो पहले औसतन 317 दिन होती थी। इससे अतिरिक्त फंड जुटाने में मदद मिलेगी। सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कई खुलासा मानकों को सहज बनाने के अलावा परिणामों का मीडिया में विस्तृत विज्ञापन भी वैकल्पिक बना दिया गया है।

सेबी ने सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एकल फाइलिंग व्यवस्था पेश की है ताकि प्रासंगिक रिपोर्ट, दस्तावेज आदि को एक एक्सचेंज पर फाइल किया जा सके जिसे स्वचालित ढंग से अन्य एक्सचेंज पर भेजा जा सके।

अगर बोर्ड मीटिंग कारोबारी अवधि के बाद समाप्त होती है तो मीटिंग के नतीजों को जारी करने की अवधि को 30 मिनट से बढ़ाकर तीन घंटे कर दिया गया है। किसी सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ दावों से जुड़े मुकदमे या विवाद के प्रकटीकरण के लिए 24 घंटे के बजाय 72 घंटे का समय दिया जाएगा, बशर्ते कि ऐसी सूचना को डिजिटल डेटाबेस में बनाकर रखा जाए। यह समझदारी भरे बदलाव हैं।

संबद्ध व्यक्ति की परिभाषा को विस्तार दिया गया है जिससे भेदिया कारोबार नियमन का दायरा बढ़ेगा। अब इसके दायरे में कई और लोग आएंगे। उदाहरण के लिए किसी संबद्ध व्यक्ति के साथ आवास साझा करने वाला व्यक्ति या किसी संबद्ध व्यक्ति की भागीदारी वाली फर्म में भागीदार या कर्मचारी व्यक्ति को भी इसके दायरे में रखा जाएगा जो परोक्ष रूप से किसी भी तरह प्रतिभूति बाजार से संबद्ध हैं। यह दायरा बहुत व्यापक है और देखना होगा कि यह हकीकत में कितना कारगर साबित होता है।

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First Published - October 1, 2024 | 10:32 PM IST

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