भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के सदस्य नागेश कुमार का कहना है कि महंगाई दर उम्मीद के मुताबिक बनी हुई है और दर अभी कम हैं। उनके अनुसार भारत पर लगे उच्च ट्रंप शुल्क सहित भू राजनीतिक अनिश्चितताओं और बातचीत पूरी होने में देरी का असर कारोबार पर पड़ रहा है। मनोजित साहा के साथ बातचीत के संपादित अंश…
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने वृद्धि को समर्थन देने के लिए चरणबद्ध तरीके से रीपो रेट में 100 आधारअंक की कटौती की है। इन कटौतियों का असर ऋण और जमा दरों तक करीब पहुंच चुका है। हमें मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियां शीर्ष स्तर पर पहुंचने के कारण 25 आधार अंक और कटौती की संभावना नजर आई। सौभाग्य से महंगाई दर की स्थिति अनुकूल है, जिससे नीतिगत कदम का मौका मिला। अक्टूबर 2025 में समग्र महंगाई दर 0.3 प्रतिशत थी, जबकि 2025-26 के पूरे साल के लिए 2 प्रतिशत महंगाई दर का अनुमान है। महंगाई दर उम्मीद के मुताबिक है।
यह साफ है कि भारत पर लगे उच्च ट्रंप शुल्क सहित भू राजनीतिक अनिश्चितताओं और बातचीत पूरी होने में देरी काअसर कारोबार पर पड़ रहा है। ट्रंप शुल्क से श्रम पर आधारित उद्योगों जैसे कपड़ा, गारमेंट, चमड़े के सामान, रत्न एवं आभूषण, प्रसंस्कृत खाद्य जैसे झींगा का कारोबार प्रभावित हुआ है, जिनका अमेरिका के साथ अच्छा कारोबार होता है।
ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां एमएसएमई क्षेत्र का प्रभुत्व है और विनिर्माण क्षेत्र की नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है। इसकी वजह से अमेरिकी शुल्क का असर एमएसएमई और नौकरियों पर उल्लेखनीय रूप से पड़ रहा है। ऐसे में एमपीसी ने पाया कि मांग को गति देकर समर्थन देने का मामला बनता है। प्रभावी होने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीतिगत कार्रवाइयों में विकास प्रोत्साहन का समन्वय किया जाए।
मेरा मानना है कि मौजूदा महंगाई दर सहज होने के लिए बहुत कम है, विशेष रूप से यदि स्वर्ण जैसी कीमती धातुओं को बाहर रखा जाए, तो महंगाई दर दर लक्ष्य की निचली सीमा से कम है। हम जानते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत कम महंगाई दर बेहतर नहीं है, जिससे मांग में कमी के संकेत मिलते हैं। इसकी वजह से वृद्धि को प्रोत्साहन देने के लिए नीतिगत फैसले लेने की संभावना पैदा होती है। भविष्य में वृद्धि और महंगाई दर की चाल के आंकड़ों के हिसाब से फैसले किए जाएंगे।
हालांकि, इस ‘गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ (उच्च विकास, कम महंगाई दर) का उत्सव अक्टूबर 2025 के रुझानों ने कम कर दिया। दूसरी तिमाही के परिणामों के बाद पता चला कि आर्थिक गतिविधि दूसरी तिमाही में चरम पर थी। अक्टूबर 2025 में औद्योगिक गतिविधि की गति धीमी होनी शुरू हुई और 14 महीने में निचले स्तर पर पहुंच गई। विनिर्माण पीएमआई जैसे उच्च संकेतक 59.2 से गिरकर 56.6 पर पहुंच गए। अक्टूबर 2025 में वस्तु निर्यात में 12 प्रतिशत की गिरावट आई। निर्यात ऑर्डर सबसे कमजोर थे, जिससे नए ऑर्डर 12 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गए। रुपया दबाव में आ गया और एक डॉलर के मुकाबले 90 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। रिजर्व बैंक के औद्योगिक परिदृश्य सर्वे भी कारोबार और उम्मीदों में नरमी का संकेत दे रहे हैं।