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Editorial: मध्यम अवधि की आर्थिक नीति

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भारत जैसे जटिल देश में यह स्पष्ट है कि ऊंची और टिकाऊ वृद्धि अपने आप नहीं आएगी। वर्तमान परिदृश्य में तो ऐसा ही प्रतीत होता है।

Last Updated- April 03, 2024 | 9:16 PM IST
‘बड़े सुधारों’ के बिना हासिल होती वृद्धि, Growth sans 'big bang' reforms

सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी योजना एक विकसित भारत तैयार करने की है। इस लक्ष्य के लिए कई तिथियों के सुझाव सामने आए, हालांकि सबसे अधिक जिक्र 2047 का है जब देश की आजादी की 100वीं वर्षगांठ होगी। ऐसी महत्त्वाकांक्षा तय करना एकदम उचित है। बहरहाल, ऐसे लक्ष्य के लिए जिस पैमाने पर वृद्धि हासिल करनी होगी उसे हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए दशकों तक साल दर साल कम से कम आठ फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करनी होगी। यदि हम ऐसा कर सके तब जाकर 14,000 डॉलर प्रति व्यक्ति के नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद तक पहुंच सकेंगे जो उच्च आय वाले देशों के लिए वर्तमान मानक है।

अब तक करीब छह देशों ने यह स्तर हासिल किया है। परंतु ऐसी वृद्धि हासिल करना संभव है। चीन वर्षों की तेज वृद्धि के बाद अगले कुछ वर्षों में 14,000 डॉलर का स्तर प्राप्त कर सकता है। यह स्थिति तब है जबकि हाल के दिनों में चीन की आर्थिक गति कमजोर पड़ी है। पूर्वी यूरोप और पूर्वी एशिया के कई देशों ने भी इस समय में तेज वृद्धि बरकरार रखी है।

भारत जैसे जटिल देश में यह स्पष्ट है कि ऊंची और टिकाऊ वृद्धि अपने आप नहीं आएगी। वर्तमान परिदृश्य में तो ऐसा ही प्रतीत होता है। सन 1990 और 2000 के दशक की स्वर्णिम अवधि के उलट आज वैश्विक हालात प्रतिकूल हैं। महत्त्वाकांक्षी विकासशील देशों के लिए भी हालात मुश्किल हैं। इसकी कई वजह हैं।

पहली, कारोबारी व्यवस्था बहुत सीमित हो गई है क्योंकि विभिन्न देश ऐसी औद्योगिक नीतियों में व्यस्त हैं जहां घरेलू सब्सिडी और शुल्क दरों से जुड़े प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। दूसरा, अमेरिका और चीन के बीच छिड़े शीतयुद्ध ने मूल्य श्रृंखलाओं को विभाजित कर दिया और निवेश रणनीतियों को जटिल बना दिया। तीसरा, तकनीकी बदलावों ने किफायती श्रम लागत के इर्दगिर्द बनी विकास नीतियों को मुश्किल बना दिया है।

अन्य वृहद रुझानों को भी इसमें शामिल करना होगा जिसमें जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तथा पर्यावरण के अनुकूल बदलावों का असर शामिल है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने की आवश्यकता भारत समेत किसी भी देश की क्षमता को प्रभावित करती है। उन्हें सस्ती ऊर्जा के लिए घरेलू कोयले पर निर्भर रहना पड़ता है।

इससे औद्योगीकरण की लागत बढ़ती है क्योंकि मध्यवर्ती वस्तुएं बनाने के लिए उच्च लागत वाली तकनीकों की आवश्यकता होती है। ऐसे में निकल जैसे नए संसाधन और जिंस विदेशी मुद्रा भंडार पर अधिक असर डालते हैं तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में हालात को मुश्किल बनाने का काम करते हैं।

ऐसे में यह मानना अतिरिक्त रूप से आशावादी होगा कि विभिन्न केंद्रीय मंत्रालय उचित नीतियां बनाकर इन जटिल वैश्विक और आर्थिक हालात से आसानी से निपट सकेंगे। ऐसा रवैया भारत को आर्थिक वृद्धि के क्षेत्र में कुछ बेहतर स्थिति में रख सकता है लेकिन इससे विकसित भारत बनाने के लिए आवश्यक टिकाऊ वृद्धि हासिल होती नहीं दिखती।

ऐसे में मध्यम अवधि में अधिक सुसंगत नीति बनाने का कोई अन्य विकल्प नहीं नजर आता जो वृद्धि और विकास के लिए जरूरी विभिन्न प्रासंगिक क्षेत्रों को एकीकृत कर सके तथा उपरोक्त रुझानों और शक्तियों का भी ध्यान रखे। जरूरी नहीं कि मध्यम अवधि की ऐसी रणनीतियों को भी अतीत की पंचवर्षीय योजनाओं की सांविधिक शक्ति की आवश्यकता हो।

परंतु वे विभिन्न मंत्रालयों में नीति निर्माण को लेकर अहम निर्देश दे सकती हैं जो अन्यथा लंबी या मध्यम अवधि के नियोजन में क्षमता की कमी के शिकार होते हैं। इस कार्य की वास्तविक जगह नीति आयोग होगा।

सरकार का यह आंतरिक थिंक टैंक अपनी बौद्धिक क्षमता को बढ़ा सकता है और उसे वृद्धि के लिए मध्यम अवधि का खाका तैयार करने का काम दिया जा सकता है जिसे समय-समय पर आंतरिक और बाह्य विकास के लिए समायोजित किया जा सकता है।

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First Published - April 3, 2024 | 9:16 PM IST

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