facebookmetapixel
Advertisement
ईरान पर बड़े एक्शन की तैयारी? ट्रंप बोले, आसानी से ले सकते हैं खार्ग द्वीपStocks vs Gold: 12–15% vs 10–12% रिटर्न, FY27 में कौन देगा ज्यादा फायदा, जानिए एक्सपर्ट की रायStock Market Today: Dow से लेकर Nikkei तक लाल, आज भारतीय बाजारों पर भी दिख सकता है ग्लोबल दबावसरकार का बड़ा कदम, ऊर्जा संकट के बीच राज्यों को मिला केरोसिन; LPG और फ्यूल सप्लाई को लेकर नई तैयारी तेजStocks To Watch Today: GR Infra, Coal India, NTPC समेत कई स्टॉक्स खबरों से सुर्खियों में; आज इन शेयरों में रहेगा बड़ा एक्शन!HFCL का मास्टर प्लान: डेटा सेंटर और रक्षा क्षेत्र में करेगी ₹900 करोड़ का बड़ा निवेश, बदल जाएगी कंपनीVedanta का मेगा डिमर्जर: अगले महीने 5 अलग कंपनियों में बंट जाएगा अनिल अग्रवाल का साम्राज्यIPO से पहले फ्लिपकार्ट का ‘इंजन’ बदलने की तैयारी: ‘वनटेक’ के साथ AI-फर्स्ट बनेगा प्लेटफॉर्ममेट्रो शहरों को मात दे रहे छोटे शहर: ऑफिस लीजिंग में आई दोगुनी उछाल, इंदौर-जयपुर बने नए हबभारत से विदेशी कंपनियों का घटा मोह! सक्रिय फर्मों की हिस्सेदारी 70% से गिरकर 62% पर आई

Editorial: भारत-अमेरिका समझौता जरूरी

Advertisement

भारतीय पक्ष अमेरिका के वार्ताकारों से लगातर संपर्क में है और दोनों देशों को सारे पुराने मसले फौरन सुलझाकर एक-दूसरे के लिए फायदेमंद व्यापारिक समझौता कर लेना चाहिए

Last Updated- November 02, 2025 | 9:37 PM IST
India US Trade Deal

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग दो घंटे से भी कम समय तक चली अल्पकालिक बैठक के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव से निपटने और शांति कायम करने पर सहमत हो गए। इसमें अमेरिका के लिए और खास तौर पर ट्रंप के लिए शायद ही फायदे की कोई बात थी। बल्कि इससे शी की वह बात सही साबित हो गई कि वह व्यापार के मामले में रत्ती भर समझौता नहीं करेंगे।

अपनी दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर लगाए प्रतिबंध और लाइसेंसिंग की जरूरतें खत्म करने के बदले चीन भारी-भरकम शुल्क टालने में कामयाब रहा है। इस तरह सबंधों में कुछ नया नहीं हुआ है बल्कि ठहराव भर आया है। यह बराबरी का लेनदेन भी नहीं है क्योंकि निर्यात प्रतिबंध तो तब लगाए गए थे, जब अमेरिका ने शुल्क बढ़ाए थे।

चीन ने अमेरिकी किसानों से 2.5 करोड़ टन सोयाबीन खरीदने पर भी सहमति जताई। परंतु यह मात्रा पिछले साल यानी ट्रंप के राष्ट्रपति बनने और कारोबारी जंग छेड़ने के पहले की गई खरीद से कम है। चीन इसके बदले अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर 100 फीसदी का दंडात्मक शुल्क नहीं देगा। नई शुल्क दर 47 फीसदी होगी जो अब भी बहुत अधिक है लेकिन भारत पर लगे शुल्क से कम है। दूसरे शब्दों में कहें तो चीन ने ट्रंप के हाथों कुछ गंवाए बगैर अपने ऊपर लगा शुल्क आधा करवा लिया।

दुर्लभ धातुओं और चुंबकीय तत्त्वों के निर्यात पर प्रतिबंधों को रोका जाना दुनिया के कई देशों के लिए राहत की बात है। इनमें यूरोपीय संघ और भारत भी शामिल हैं जो दोनों महाशक्तियों की लड़ाई में फंस गए हैं। शी चिनफिंग ने नपे-तुले तरीके से जता दिया कि इन धातुओं के बगैर उच्च तकनीक पर आधारित कोई भी निर्माण नहीं हो सकता और दुनिया को अगर इनकी जरूरत है तो देशों के पास चीन के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

इसके लिए जल्द ही अतिरिक्त स्रोत विकसित करने होंगे लेकिन तथ्य यह है कि इस आपूर्ति श्रृंखला में चीन के दबदबे को 2010 से ही महसूस किया जा रहा है, जब इसने जापान के विरुद्ध ऐसे ही प्रतिबंधों का इस्तेमाल​ किया था। इसे हल करने के लिए राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय स्तर पर कोई कदम नहीं उठाए गए।

शी ने अपना तुरुप का पत्ता दिखा दिया है और अब उसकी टक्कर तैयार करने का वक्त आ गया है। दोनों देशों के बीच शांति का मतलब भारत के लिए यह होगा कि उसके निर्यातकों पर अमेरिका का ऊंचा यानी 50 फीसदी का शुल्क झेलना होगा। भारत के मुकाबले चीन के साथ समझौता करने की बेताबी अमेरिका में ज्यादा दिखी लेकिन अगर शर्तें अधिक आकर्षक बनाई गईं तो हालात बदल सकते हैं।

अगर प्रधानमंत्री अपनी व्यक्तिगत कूटनीति का प्रयोग करें तो ऐसा हो सकता है। निश्चित तौर पर एक या दो ऐसे संकेतक हैं जो बताते हैं कि द्विपक्षीय रिश्ते इतने नहीं बिगड़े हैं कि सुधर न सकें। उदाहरण के लिए अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह पर लगे प्रतिबंधों से भारत को दी गई छूट पहले रोक दी थी मगर अब पता चला है कि उस छूट को छह महीने के लिए और बढ़ा दिया गया है। इसके अलावा पिछले सप्ताह भारत और अमेरिका ने रक्षा सहयोग पर एक दशक लंबा समझौता भी किया।

इससे साफ है कि दोनों देशों की साझेदारी में भरोसा रखने वाले लोग अब भी मिलकर काम कर सकते हैं। यही जज्बा अब व्यापार में भी लाना पड़ेगा। भारत पर ऐसे शुल्क लगने की कोई वजह ही नहीं है। बताया जा रहा है कि भारतीय पक्ष अमेरिका के वार्ताकारों से लगातर संपर्क में है और दोनों देशों को सारे पुराने मसले फौरन सुलझाकर एक-दूसरे के लिए फायदेमंद व्यापारिक समझौता कर लेना चाहिए।

Advertisement
First Published - November 2, 2025 | 9:37 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement