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पीएसबी में प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन संरचना व चुनौतियां

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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में वरिष्ठ अधिकारियों के लिए प्रस्तावित नई प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन योजना को लेकर कर्मचारी संगठनों और सरकार के बीच टकराव तेज हो गया है।

Last Updated- May 15, 2026 | 8:51 AM IST
Banks
Representational Image

भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी) एक अनूठी चुनौती का सामना कर रहे हैं। बैंकिंग क्षेत्र में छह दशक पुराने वेतन समझौते को एक नई प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) द्वारा तैयार पीएलआई योजना वरिष्ठ बैंक अधिकारियों को ध्यान में रख कर तैयार की गई है और फिलहाल यह दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

वर्ष 2020 में 11वें द्विपक्षीय समझौते के बाद पीएसबी के परिचालन और शुद्ध लाभ पर आधारित पीएलआई की अवधारणा पेश की गई। वर्ष 2020 का पीएलआई ढांचा प्रत्येक बैंक की सालाना लाभ वृद्धि से जुड़ा था। अगर सालाना परिचालन लाभ वृद्धि 5 फीसदी से कम है तो कोई पीएलआई नहीं दिया जाता, 5 से 10 फीसदी के बीच रहने पर पांच दिन का वेतन (मूल वेतन और महंगाई भत्ता), 10 से 15 फीसदी के बीच रहने पर 10 दिन का वेतन और 15 फीसदी से अधिक रहने पर पर 15 दिन का वेतन दिया जाता था। यह योजना स्केल-7 तक के सभी कर्मचारियों पर लागू थी। पूर्णकालिक निदेशकों (कार्यकारी निदेशकों, प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारियों) के लिए प्रोत्साहन संरचना हमेशा ऐसे द्विपक्षीय समझौतों से बाहर रखी गई। यह सरकारी वेतन संरचना से जुड़ी है, सीईओ का भुगतान आम तौर पर एक अतिरिक्त सचिव के वेतन के आधार पर तय किया जाता है। उनके लिए वित्त मंत्रालय ने फरवरी 2012 में 12 मात्रात्मक मापदंडों पर आधारित पीएलआई योजना शुरू की थी।

सरकार ने 2019 में पूर्णकालिक निदेशकों के लिए पीएलआई योजना में संशोधन किया। पात्रता मानदंड बैंक के परिसंपत्तियों पर रिटर्न (यह धनात्मक होना चाहिए) और शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (1.5 फीसदी से अधिक नहीं) पर आधारित था। बहुत कम बैंक इसके लिए पात्र थे। वर्ष 2024 में इसमें फिर से संशोधन किया गया और पूर्णकालिक निदेशकों के अलावा स्केल-4 (मुख्य प्रबंधक) के वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल किया गया। हालांकि, वेतन समझौते के तहत स्केल-3 तक के कर्मचारियों के लिए अधिकतम 15 दिनों के मूल वेतन और महंगाई भत्ता की पुरानी प्रोत्साहन संरचना जारी है मगर नई योजना ने शीर्ष प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन संरचना 24 गुना बढ़ाकर 360 दिनों के मूल वेतन और महंगाई भत्ते तक कर दी है। कर्मचारी संघ ऐसी किसी भी प्रणाली का विरोध कर रहे हैं जो लगभग 94 फीसदी बैंक कर्मचारियों के लिए पीएलआई को 15 दिनों के वेतन तक सीमित रखती है जबकि वरिष्ठ अधिकारियों (6 फीसदी) को 360 दिनों तक का मूल वेतन और महंगाई भत्ता (पीएलआई) अर्जित करने की अनुमति देती है। उनका तर्क है कि आखिर बैंकिंग संचालन मुख्य रूप से जमीनी स्तर पर किया जाता है जहां स्केल-3 तक के कर्मचारी (वरिष्ठ प्रबंधक) ग्राहकों से सीधे संपर्क करते हैं।

नवंबर 2024 में एक पत्र के माध्यम से सूचित की गई नई पीएलआई योजना केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) में लागू योजना के अनुरूप है जिसकी सिफारिश तीसरी वेतन संशोधन समिति ने की थी। सीपीएसई में प्रोत्साहन राशि पिछले वर्ष के कर-पूर्व शुद्ध लाभ के 5 फीसदी तक सीमित है। भुगतान तीन घटकों पर निर्भर करता है (कंपनी के प्रदर्शन, टीम का प्रदर्शन और व्यक्तिगत प्रदर्शन रेटिंग) और यह मध्य प्रबंधन के लिए मूल वेतन के 40 से 90 फीसदी और प्रबंध निदेशक और अध्यक्ष के लिए 100फीसदी तक होता है। यह सीपीएसई के सभी ग्रेड या स्तरों पर लागू होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसबी) में यह स्केल 4 से लेकर प्रबंध निदेशक एवं सीईओ तक के अधिकारियों के लिए है।

कर्मचारी और अधिकारी संघों को तब तक कोई आपत्ति नहीं थी जब तक स्केल 7 तक के कर्मचारियों के लिए द्विपक्षीय समझौते पर आधारित पीएलआई बरकरार था। अब उनका तर्क है कि नई संरचना कर्मचारियों को विभाजित करती है, ‘सहकर्मियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है’ और वरिष्ठ अधिकारियों को वित्तीय समावेशन और दीर्घकालिक परिसंपत्ति गुणवत्ता जैसे व्यापक लक्ष्यों की कीमत पर अल्पकालिक लाभों को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह विवाद 2025 की शुरुआत से ही मुख्य श्रम आयुक्त (सीएलसी-सेंट्रल) के समक्ष विचाराधीन है। नवंबर 2025 जनवरी और मार्च 2026 में हुई कई सुलह बैठकों के बाद सीएलसी ने आईबीए और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मौजूदा स्थिति बनाए रखने और आपसी मेल-जोल से विवाद का समाधान करने का सुझाव दिया है।

चूंकि, डीएफएस सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) द्वारा स्केल- 4 और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए नई पीएलआई (उच्च वेतन वृद्धि) योजना लागू करने पर जोर दे रहा है इसलिए तीन बैंक श्रम संगठनों ने इस योजना को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि यह योजना बाध्यकारी समझौते और समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत का उल्लंघन करती है।
इस साल 1 अप्रैल को हुई सुनवाई में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि वह कोई अंतरिम आदेश पारित करने के लिए इच्छुक नहीं है मगर उसने भारत सरकार और आईबीए को अधिसूचना जारी की और 25 मई को विस्तृत सुनवाई निर्धारित की। इस योजना का क्रियान्वयन आगे के आदेशों पर निर्भर करेगा।

सीपीएसई की प्रदर्शन-संबंधी वेतन (पीआरपी) संरचना विशिष्ट उत्पादन मापदंडों और परिसंपत्ति आधार पर निर्भर करती है जिनका आर्थिक जीवन और मूल्यह्रास के संदर्भ में पता लगाना आसान होता है। इसके विपरीत बैंकिंग लाभ ऋण जोखिमों से काफी प्रभावित हो सकते हैं जो ऋण दिए जाने के वर्षों बाद उत्पन्न हो सकते हैं। यह संरचनात्मक अंतर बताता है कि आरबीआई ने बैंकों को हानि प्रावधान ढांचे से अपेक्षित ऋण हानि संरचना में स्थानांतरित होने का निर्देश क्यों दिया है।

श्रम संगठनों को डर है कि अल्पकालिक, कार्यकारी-केंद्रित पीआरपी बैंकों को तत्काल ब्याज आय और शुल्क राजस्व को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करेगी। इससे अंततः आक्रामक और जोखिम भरी विकास रणनीतियों के लिए ‘प्रतिभाशाली’ अधिकारियों को पुरस्कृत किया जा सकता है जो बाद में बैंकों की वित्तीय स्थिति पर दबाव डाल सकते हैं।

दूसरी ओर, नई योजना के पक्ष में तर्क यह है कि निजी बैंकों में वेतन संरचना कहीं अधिक है और प्रदर्शन से जुड़ी हुई है। उच्च पारिश्रमिक से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बाजार से प्रतिभा आकर्षित करने में मदद मिलेगी। निजी बैंकों में परिवर्तनीय वेतन में आस्थगित भुगतान शामिल होते हैं जिनका कुछ हिस्सा कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजनाओं जैसे गैर-नकद रूपों में दिया जाता है। इसमें वापसी संबंधी प्रावधान भी हैं जो बैंकों को अत्यधिक जोखिम लेने या कदाचार की स्थिति में बोनस समायोजित करने, रद्द करने या बाद में वसूल करने का अधिकार देते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की योजना में ऐसे घटक नहीं हैं। सरकार गतिरोध समाप्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए तीन विकल्पों में से किसी एक पर विचार कर सकती है। इनमें पहला है वरिष्ठ अधिकारियों के लिए सीपीएसई-शैली का बेल-कर्व पीआरपी मॉडल, जिसमें घटना के बाद जोखिम नियंत्रण और वापसी शामिल हैं। दूसरा विकल्प है सभी कर्मचारियों के लिए एक सामूहिक, समान पीएलआई और तीसरा विकल्प है एक हाइब्रिड मॉडल जो टीम-लिंक्ड पीएलआई के आधार को वरिष्ठ अधिकारियों के लिए जोखिम-समायोजित घटक के साथ जोड़ता है।

(लेखक जन स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)

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First Published - May 15, 2026 | 8:51 AM IST

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