उर्वरक सब्सिडी को हटाने या प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की ओर बढ़ने के प्रयास से उर्वरकों का उपयोग कम हो सकता है और इससे कृषि उत्पादन में कमी आ सकती है। कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने बुधवार को जारी खरीफ सत्र 2026-27 के लिए अपनी नवीनतम मूल्य नीति रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि इसके बजाए ‘एग्रीस्टैक’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कृषि उत्पादन को प्रभावित किए बिना मिट्टी के पोषक तत्त्वों के असंतुलित उपयोग और सब्सिडी के बोझ को नियंत्रित किया जा सकता है।
यूरिया और डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के साथ-साथ अन्य उर्वरकों की अत्यधिक खपत के कारण भारत की उर्वरक सब्सिडी वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 2,17,000 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है जबकि बजट अनुमान लगभग 1,67,000 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2027 में भी सरकार को उम्मीद है कि उर्वरक सब्सिडी बजट अनुमान 1,86,000 करोड़ रुपये से कम से कम 20 प्रतिशत अधिक होगी। इसका कारण पश्चिम एशिया संकट के चलते यूरिया और डीएपी जैसे तैयार उर्वरकों और उनके निर्माण में प्रयुक्त कच्चे माल की वैश्विक कीमतों में भारी वृद्धि है।
सीएसीपी ने यह भी कहा कि बदलते फसल रुझान, कृषि-जलवायु कारकों, मृदा विशेषताओं, सिंचाई कवरेज आदि को देखते हुए अखिल भारतीय स्तर पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के सर्वमान्य आदर्श अनुपात (4:2:1) पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसके बजाए ऐसे मानदंड विखंडित स्तर पर विकसित किए जाने चाहिए। आयोग ने कहा, ‘इसके अतिरिक्त सूक्ष्म और द्वितीयक पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ावा देने और मृदा कार्बनिक कार्बन में सुधार के लिए रणनीतियों पर विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।’
इस बीच आयोग ने धान की खुली खरीद नीति की समीक्षा का सुझाव देते हुए कहा कि खुली खरीद के कारण लगातार अतिरिक्त धान भंडार से कुछ राज्यों में भंडारण की क्षमता पर भारी दबाव पड़ा है।