नई दिल्ली में इस सप्ताह होने जा रही एआई इम्पैक्ट समिट एक ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) को दुनिया भर में तेजी से अपनाया जा रहा है। सरकार की महत्त्वाकांक्षा एकदम स्पष्ट है: भारत को वैश्विक एआई परिदृश्य की एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित करना। अभी इस क्षेत्र में मोटे तौर पर अमेरिका और चीन का दबदबा है।
इस समिट में 100 से अधिक देश हिस्सा ले रहे हैं और इसका उद्देश्य है वैश्विक विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना, पूंजी जुटाना और उन नियमों को आकार देना जो पश्चिमी प्राथमिकताओं को नहीं दर्शाते हों या चीन के नेतृत्व वाले सरकारी मॉडल का अनुकरण नहीं करते हों। इस संदर्भ में भारत के पास ऐसी मजबूती है जो इसे आगे बढ़ा सके। यह एआई टूल्स के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों से एक है जिन्हें तमाम कंपनियां और परिवार तेजी से अपना रहे हैं। इस भारी मांग की वजह से आकर्षित होकर पहले ही वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां भारत में अभूतपूर्व निवेश के वादे और ऐलान कर रही हैं।
एमेजॉन ने वर्ष 2030 तक 35 अरब डॉलर से अधिक निवेश का वादा किया है, माइक्रोसॉफ्ट ने चार साल में 17.5 अरब डॉलर और गूगल ने 15 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की है। यह अमेरिका से बाहर गूगल का सबसे बड़ा एआई और डेटा सेंटर हब होगा। भारत की डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना, कम लागत वाले डेटा और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के बाद नियामक स्थिरता ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।
भारत की व्यापक रणनीति, सॉवरिन कंप्यूट और घरेलू लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स में निवेश के साथ, महंगे फ्रंटियर मॉडल विकास और क्षेत्रवार इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करने के बीच संतुलन बनाने का लक्ष्य रखती है। इस संदर्भ में ताजा आर्थिक समीक्षा ने भी फ्रंटियर मॉडल विकास और ऐप्लीकेशन आधारित इस्तेमाल के बीच असमानता को रेखांकित किया है। यह उल्लेख करते हुए कि फ्रंटियर गैप को कम करने के प्रयास में ज्यादा खर्च आ सकता है। इसलिए, या तो फ्रंटियर यानी अग्रणी स्तर के मॉडलों का अनुसरण किया जाए या सीमित संसाधनों को घरेलू प्राथमिकताओं के अनुरूप क्षेत्र विशिष्ट एआई प्रणालियों की ओर निर्देशित किया जाए।
संरचनात्मक स्तंभों में 38,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) के माध्यम से कंप्यूट तक पहुंच का विस्तार, एआई कोश डेटासेट भंडार का निर्माण, एआई सुरक्षा संस्थान की स्थापना, और एआई इंसिडेंट का डेटाबेस बनाना शामिल हैं। ये महत्त्वपूर्ण संस्थागत कदम हैं। लेकिन लागू की जा सकने वाली जवाबदेही, मजबूत डेटा शासन और स्पष्ट निवारण तंत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहेंगे। यदि प्रोत्साहन कंपनियों को अपारदर्शिता की ओर धकेलते हैं तो स्वैच्छिक अनुपालन पर्याप्त नहीं होगा।
अन्य बाधाएं भी हैं। भारत की डेटा सेंटर क्षमता अभी भी कुल वैश्विक स्तर का एक छोटा हिस्सा है, और देश में ऐसी घरेलू एआई कंपनियां नहीं हैं जिन्होंने सार्थक पैमाना हासिल किया हो। इसके अलावा, हाइपरस्केल अधोसंरचना भारी मांगों के साथ आती है, जिनमें निर्बाध बिजली, उन्नत शीतलन प्रणालियां, फाइबर कनेक्टिविटी और बड़े पैमाने पर जल उपयोग शामिल हैं। अभी किए गए डिजाइन विकल्प यह तय करेंगे कि भारत एआई कंप्यूट का विस्तार पर्यावरणीय तनाव को बढ़ाए बिना कर सकता है या नहीं।
व्यापक स्तर पर देखें तो समिट की सफलता को केवल निवेश घोषणाओं से नहीं आंका जाना चाहिए। ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह समिट तब हो रही है जब वैश्विक शासन परिदृश्य विभाजित है। वर्ष 2023 की ब्लेचली पार्क एआई सुरक्षा समिट में घोषणाएं और प्रतिबद्धताएं तो जताई गईं, लेकिन दीर्घकालिक जोखिमों पर सहमति अभी भी दूर है।
यहां तक कि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों को विनियमित करना भी एआई के असंख्य डेवलपर्स द्वारा किए जाने वाले तमाम दुरुपयोग को पूरी तरह रोक नहीं सकता। अंतरराष्ट्रीय प्रभाव मानकीकरण को कठिन बनाते हैं, फिर भी वैश्विक चर्चा आवश्यक है। यह पहले से ही साफ है कि एल्गोरिदमिक टूल कैसे गलत तरीके से एक्सक्लूजन कर सकते हैं।
फिर भी, चुनौतियों के बावजूद यह उत्साहजनक है कि इन मुद्दों पर वैश्विक चर्चा आयोजित की जाएगी, और आशा है कि एआई के कुछ संभावित दुष्प्रभाव जल्द ही नियंत्रित किए जा सकेंगे। नौकरियों पर संभावित प्रभाव और बढ़ते कार्यबल को समाहित करने के लिए एआई-कौशल प्रशिक्षण के मुद्दे पर भी गंभीर बहस की आवश्यकता होगी।
अन्य कई मुद्दे भी चर्चा के लिए मौजूद हैं। एआई तेजी से विकसित हो रही है और कई तरीकों से दुनिया को पुनः आकार देने की क्षमता रखती है, ऐसे में यह समिट दिशा और मानकों को परिभाषित करने के लिए एक अच्छा प्रारंभिक बिंदु हो सकती है।