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मुद्रा वायदा बाजार और भविष्य की संभावनाएं

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 10:04 PM IST

करीब तीन सप्ताह पहले मुद्रा वायदा बाजार ने काम करना शुरू कर दिया। उम्मीद की जा सकती है कि यह इसका भविष्य ब्याज वायदा संविदा से बेहतर होगा, जिसे जून 2003 में पूरे जोशोखरोश के साथ शुरू किया गया था।

वह संविदा बिल्कुल भी कारगर नहीं हो सकी क्योंकि मेरा मानना है कि बैंकों ने केवल हेजिंग को अनुमति दी थी। वे केवल बिक्रेता बनकर काम कर सकते थे, और बाजार नया नया था।

नियामक प्रतिबंधों का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह था कि बैंक, बॉन्डों से होने वाली कमाई का  इंट्रेस्ट रेट स्वैप के खुले बाजार (ओवर द काउंटर-ओटीसी) में कारोबार कर सकते थे, लेकिन वे मुद्रा विनिमय कारोबार में नहीं उतर सकते थे।

ब्याजबॉन्ड फ्यूचर्स की वापसी भी जल्द होने की उम्मीद है। मुद्रा वायदा से संबंधित नियम ज्यादा व्यावहारिक हैं और इससे संविदा की सफलता के प्रति आशा भी जगती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो हम इस बात को नहीं भूल सकते कि दुबई एक्सचेंज ने अमेरिकी डालर और भारतीय रुपये में मुद्रा वायदा कारोबार 2007 के मध्य में शुरु किया था, लेकिन इसके वॉल्यूम में तेजी नहीं आ  सकी।

पहले उम्मीद यह की जा रही थी कि  हीरे और सोने के कारोबार के कारण रुपये में काफी वाणिज्यिक दिलचस्पी होगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। 

यह भी उम्मीद की गई थी कि बाजार, सिंगापुर और हांगकांग में ओटीसी नॉन डिलिवरेबल फारवर्डस् (एनडीएफ) के माध्यम से विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने में सफल होगा। लेकिन वास्तव में ऐसा कभी नहीं हुआ।

भारत के मुद्रा वायदा बाजार को एनडीएफ बाजार से बहरहाल अब कोई खतरा नहीं है, इसमें केवल यहां के निवासी ही भाग ले सकते हैं। इस बाजार के एक वास्तविक प्रयोक्ता कार्पोरेट होंगे, जिनका विनिमय दरों से आर्थिक सरोकार है।

इसमें उत्पादकों और उपभोक्ता का एक बड़ा वर्ग शामिल है जो जिंस कारोबार जैसे धातुओं, बेसिक और पेट्रोकेमिकल्स का कारोबार करते हैं। इनकी घरेलू कीमतें विनिमय दरों के माध्यम से तय की जाती हैं।

वर्तमान नियमों के अंतर्गत इस तरह के  कारोबार की हेजिंग ओटीसी फारवर्ड एक्सचेंज मार्केट में रिजर्व बैंक द्वारा गठित समितियों की संस्तुतियों के बगैर नहीं की जा सकती हैं। (यह एक दूसरी नियामक असंगति है।

कंपनियों को आयात शुल्क के आर्थिक कारोबार में ओटीसी बाजार में हेजिंग की अनुमति है, लेकिन घरेलू सामान की कीमतों को तय करने के मामले में यह छूट नहीं है। ) सामान्य प्रक्रिया में  इस तरह का कारोबार वहां पर किया जा सकता है, जहां इसके लिए कोई प्रतिबंध नहीं है।

बहरहाल, इस तरह के कारोबार के लिए खुली ब्याज दर पर ग्राहक स्तर की सीमा 50 लाख डॉलर है, जिसका बहुत ज्यादा प्रयोग नहीं किया जा सकता है। रिपोट इस तरफ इशारा करती हैं कि इस सीमा पर फिर से विचार किया जाना चाहिए और उम्मीद की जा रही है कि अंतिम उपभोक्ताओं की उचित जरूरतों के मुताबिक इससे संबधित अधिकारी इस तथ्य पर उचित विचार करेंगे।

बाजार में कितनी तरलता होगी? क्या ऐसा होगा कि कुछ चरणों में विनिमय वायदा बाजार में लेनदेन की मात्रा बहुत कम होगी? इसकी एक नजीर भी है: इक्विटी डेरिवेटिव्स मार्केट में लेने देन की मात्रा नकदी बाजार की तुलना में बहुत ज्यादा है।

वहीं दूसरी तरफ एक्सचेंज ट्रेडेड करेंसी डेरिवेटिव्स की मौजूदगी के बावजूद, वैश्विक रूप से काउंटर के माध्यम से कारोबार का बाजार बहुत
बड़ा है।

बीआईएस की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ओटीसी मार्केट में मुद्रा का कारोबार 3 लाख करोड़ डॉलर (3 ट्रिलियन) प्रतिदिन से ज्यादा है। जबकि एक्सचेंज के माध्यम से कारोबार 7200 करोड़ डॉलर (72 बिलियन डॉलर) ही होता है।

घरेलू बाजार में ओटीसी विदेशी विनिमय बाजार से औसत लेनदेन 4900 करोड़ (49 बिलियन) डॉलर का होता है, जिसमें फारवर्ड और स्वाइप्स के 2400 करोड़ डॉलर भी शामिल हैं।

इसकी तुलना करने पर पता चलता है कि शुरुआती हफ्तों वायदा विनिमय के माध्यम से प्रतिदिन का कारोबार 500 लाख डॉलर (50 मिलियन डॉलर) होगा। लेकिन यह शुरुआती आंकड़ा है।

भारत में फारवर्डफ्यूचर मार्केट को लेकर एक और तकनीकी मुद्दा है। वैश्विक रूप से, अगर एक महीने का अग्रिम कारोबार आज (24 सितंबर) को किया जाए तो इसकी मेच्योरिटी 26 अक्टूबर को होगी।

वास्तव में फारवर्ड कांट्रैक्ट मेच्योरिटीज का संबंध समुद्र पार बाजार के कर्ज और जमा की मेच्योरिटी से होता है, जो मुद्रा और विनिमय बाजार से हटकर है। वैश्विक बाजार से हटकर भारत में  एक महीने का फारवर्ड कांट्रैक्ट की खरीदारी आज की जाए तो वह चालू महीने के अंतिम कार्यकारी दिन को मेच्योर होगा।

फ्यूचर कांट्रैक्ट्स में भी इसी नियम का पालन होता है। यह बहुत पुरानी प्रक्रिया है, जिसमें तब्दीली की जरूरत है। इसके नियम वैश्विक बाजारों के समान ही होने चाहिए।

स्पष्ट है कि वायदा बाजार में अंतिम उपभोक्ता के लिहाज से बहुत ज्यादा पारदर्शिता होती है। क्या इस तरह का कारोबार छोटे और मझोले उद्योगों के लिहाज से होगा? यह संभव नहीं लगता, क्योंकि कारोबार वायदा बाजार में बाजार दरों के मुताबिक होगा और यह रुपये में होगा तथा अंतिम डिलेवरी बैंकिंग सिस्टम से विदेशी मुद्रा के रूप में होगी। दरअसल फेमा के नियमों के मुताबिक अधिकृत डीलरों के अलावा किसी भी तरह से विदेशी लेनदेन निकासी प्रतिबंधित है।

एक और कमजोरी: वायदा बाजार में लाभ और हानि को देखते हुए कर की  व्यवस्था कैसी होगी। क्या इसे व्यवसाय में लाभ के तौर पर देखा जाएगा जैसा कि इक्विटी डेरिवेटिव्स के मामले में किया जाता है?

First Published : September 23, 2008 | 10:45 PM IST