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अमेरिका की नई रक्षा रणनीति पर बढ़ी चिंता, सहयोगियों से दूरी के मायने

एनडीएस तो एनएसएस से भी आगे बढ़कर यह संकेत करती है कि अमेरिका के पुराने सहयोगियों को अपनी रक्षा की जिम्मेदारी खुद संभालनी चाहिए

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 30, 2026 | 10:09 PM IST

अमेरिका की संघीय सरकार ने गत सप्ताह राष्ट्रीय रक्षा रणनीति (एनडीएस) जारी की। यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें बल प्रयोग की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया जाता है और जिसे आमतौर पर हर चार साल या उसके आसपास जारी किया जाता है। यह दस्तावेज काफी हद तक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति या एनएसएस के आसपास ही होता है जिसे दिसंबर के आरंभ में जारी किया गया था और जो काफी हद तक यह दिखाता है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका को उस भूमिका से दूर करना चाहते हैं जो उसने बीते 80 वर्षों से पुरानी विश्व व्यवस्था में अपना रखी है।

एनडीएस तो एनएसएस से भी आगे बढ़कर यह संकेत करती है कि अमेरिका के पुराने सहयोगियों को अपनी रक्षा की जिम्मेदारी खुद संभालनी चाहिए। वह इस बात पर भी जोर देती है कि अमेरिका की दुनिया के दूसरे हिस्सों में छिड़े संघर्षों में कोई खास रुचि नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय अमेरिका को अपने नागरिकों की वास्तविक चिंताओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

इनमें प्रवासन और नशीली दवाओं का कारोबार शामिल हैं जिनके बारे में मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान मानता है कि उन पर अकेले पश्चिमी गोलार्द्ध पर दबदबा बनाकर नियंत्रण किया जा सकता है। यह अपने निष्कर्ष में कहता है कि चीन की चुनौती से निपटने के लिए सबसे बेहतर तरीका यही है कि चीन से सीधे टकराव के बजाय शक्ति का प्रदर्शन करके ऐसा किया जाए। यह सोचना मुश्किल है कि चीनी नेता सच में इस बात से इतने प्रभावित होंगे कि अमेरिकी सेना वेनेजुएला या किसी दूसरे लैटिन अमेरिकी देश के अस्तित्व के खतरे से कितनी कुशलता से निपटती है।

यह एशिया में चीन के सिवा किसी के लिए भी अच्छी खबर नहीं है। वास्तव में, ताइवान को अधिक चिंतित होना चाहिए, क्योंकि एनडीएस उसे लेकर अमेरिकी नीति के संदर्भ में भयावह रूप से मौन है। यह धारणा कि यह रणनीतिक अस्पष्टता है, जल्दी ही खारिज की जा सकती है। इस समय, कोई भी यह विश्वास नहीं करेगा कि अमेरिका किसी संधि प्रतिबद्धता का सम्मान करने का इरादा रखता है। यदि दस्तावेज ने वास्तव में ताइवान पर पारंपरिक अमेरिकी रुख को दोहराया होता, तो रणनीतिक अस्पष्टता की संभावना हो सकती थी।

अमेरिका के अन्य पूर्वी एशियाई सहयोगियों के लिए, यह घटनाक्रम बहुत अधिक चिंताजनक है, लेकिन पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं। उदाहरण के लिए, जापान सरकार ने पहले ही ताइवान के इर्द-गिर्द अपनी बयानबाजी को तेज कर दिया है, ताकि अमेरिकी प्रतिक्रिया के आसपास की अनिश्चितता का फायदा उठाया जा सके। यूरोप में अमेरिकी सहयोगियों में से कई देश इस समय यह आशा कर रहे होंगे कि ग्रीनलैंड प्रकरण और राष्ट्रपति के यूक्रेन के प्रति रवैये के बाद, अमेरिका उनके महाद्वीप पर कम ध्यान दे। उनके अपने हथियार उत्पादन को पूर्ण क्षमता तक पहुंचने में एक दशक लगेगा, लेकिन पहले से ही एक जर्मन कंपनी, राइनमेटल, इतना गोला बारूद बना रही है जो अमेरिकी उत्पादन के बराबर है।

भारत अपने आप में अलग स्थिति में है। चीन के उभार को लेकर अमेरिका की चिंताओं का लाभ लंबे समय से भारत को मिलता रहा है। भारत के उभार का समर्थन करना किसी भी अमेरिकी प्रशासन के लिए कम कोशिशों और अधिक लाभ वाली रणनीति प्रतीत हुई, और यही कारण है कि दोनों दलों ने इस नीति को अपनाया। लेकिन न केवल भारत का सैन्य आधुनिकीकरण दो दशक पहले की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा और भारत तथा चीन के बीच आर्थिक अंतराल काफी बढ़ गया, बल्कि अमेरिका के पश्चिमी गोलार्द्ध में पीछे हटने के साथ ही भारत के साथ जुड़ाव का मूल उद्देश्य भी अब नहीं रहा। भारत को यह स्वीकार करना होगा कि अब उसे केवल अधीर, चिंतित, अविश्वासी या शत्रुतापूर्ण अमेरिका से ही नहीं, बल्कि उससे भी बुरी स्थिति से निपटना होगा यानी पूरी तरह उदासीन अमेरिका।

First Published : January 30, 2026 | 9:49 PM IST