आपका पैसा

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दोबारा शादी के बाद भी नहीं रुकेगी सरकारी कर्मचारी के विधवा की पेंशन

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फैसले में साफ कहा है कि विधवा की दूसरी शादी से पेंशन का अधिकार खत्म नहीं जाता है

Published by
अमित कुमार   
Last Updated- January 30, 2026 | 7:28 PM IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर कोई सरकारी या पैरामिलिट्री कर्मचारी की मौत हो जाती है और उसकी बिना बच्चे वाली विधवा दोबारा शादी कर लेती है, तो भी उसकी फैमिली पेंशन नहीं छिन सकती। कोर्ट ने सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 के रूल 54 की व्याख्या करते हुए कहा कि पेंशन का हक कर्मचारी की मौत के वक्त तय होता है और बाद की निजी जिंदगी की घटनाएं उस पर असर नहीं डालतीं। इस फैसले से लंबे समय से चली आ रही पेंशन की बहस पर विराम लग गया है, खासकर उन परिवारों के लिए जो सोचते हैं कि विधवा की शादी से उनका दावा मजबूत हो जाता है।

CRPF अफसर की मौत से शुरू हुआ विवाद

यह मामला CRPF के एक अफसर की मौत से जुड़ा है, जो जम्मू-कश्मीर में बाढ़ राहत कार्य के दौरान डूबकर मर गए थे। उनकी विधवा को फैमिली पेंशन मिलना शुरू हो गया। लेकिन कुछ समय बाद विधवा ने दोबारा शादी कर ली। तब मरने वाले अफसर के माता-पिता ने अधिकारियों से गुहार लगाई कि पेंशन अब उन्हें दी जाए, क्योंकि विधवा की शादी से उसका हक खत्म हो गया। उनकी अपील ठुकरा दी गई तो उन्होंने पेंशन के आदेश और रूल 54 की वैधानिकता को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

माता-पिता का तर्क था कि विधवा की शादी से वह परिवार से अलग हो गई, इसलिए आश्रित माता-पिता को पेंशन मिलनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि रूल 54 आश्रित माता-पिता के साथ नाइंसाफी करता है। कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि फैमिली पेंशन कोई विरासत नहीं है, बल्कि एक वैधानिक कल्याण योजना है। कोर्ट ने साफ किया कि विधवा का हक मौत के दिन तय हो जाता है और दोबारा शादी जैसी चीजें उसमें बदलाव नहीं ला सकतीं।

मौत के वक्त तय होता है पेंशन का हक

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, फैमिली पेंशन का फैसला कर्मचारी की मौत के समय उसकी विधवा की कानूनी स्थिति पर निर्भर करता है। अगर मौत के वक्त विधवा के कोई बच्चे नहीं हैं, तो वह पेंशन की हकदार बनी रहती है, भले बाद में शादी कर ले। लेकिन एक शर्त है कि अगर उसकी अपनी कमाई तय सीमा से ज्यादा हो जाए, तो पेंशन रुक सकती है। यह सीमा न्यूनतम फैमिली पेंशन और महंगाई भत्ते से जुड़ी होती है।

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पेंशन का अधिकार मौत के साथ ‘क्रिस्टलाइज’ हो जाता है, यानी पक्का हो जाता है। बाद की घटनाएं जैसे दोबारा शादी या नए बच्चे का जन्म, मूल कर्मचारी से कोई सीधा कानूनी कनेक्शन नहीं रखतीं। इसलिए ये पेंशन के अधिकार को छीन नहीं सकतीं। एडवोकेट्स बताते हैं कि यह फैसला निजी जीवन की आजादी और वैधानिक हकों को अलग-अलग रखता है। फैमिली पेंशन नौकरी के कारण मिलती है, शादी बनी रहने पर निर्भर नहीं होती।

Also Read: पेंशन फंड को आधुनिक बनाने की पहल: NPS निवेश ढांचे में बदलाव की तैयारी, PFRDA ने बनाई समिति

माता-पिता क्यों आते हैं नीचे की कतार में

फैमिली पेंशन की व्यवस्था में माता-पिता को नीचे की प्राथमिकता दी गई है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि आश्रित माता-पिता तभी पेंशन के हकदार होते हैं, जब मरने वाले कर्मचारी के पीछे न विधवा हो और न ही बच्चे। सरकार ने जानबूझकर विधवाओं और आश्रित बच्चों को पहले रखा है, ताकि मौत के बाद विधवा की जिंदगी और सम्मान की रक्षा हो सके। उसे दोबारा शादी करने पर सजा न मिले।

कोर्ट ने रूल 54 को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया और कहा कि विधायी या नीतिगत फैसलों में अदालत का दखल सीमित होना चाहिए। कई परिवार गलतफहमी में रहते हैं कि विधवा की शादी से माता-पिता का दावा अपने आप बन जाता है, लेकिन यह फैसला साफ करता है कि ऐसा नहीं है। पेंशन एक नियम-आधारित सामाजिक सुरक्षा है, जो विधवाओं को नई जिंदगी शुरू करने से नहीं रोकती।

कब रुक सकती है पेंशन

लेकिन अगर दोबारा शादी के बाद विधवा की कमाई तय सीमा से ज्यादा हो जाती है, तो उसकी पेंशन रोकी जा सकती है। यह नियम इसलिए है ताकि पेंशन उन्हीं को मिले जिन्हें इसकी जरूरत हो।

यह फैसला विधवाओं और परिवारों के लिए स्पष्टता लाता है। अब वे जानते हैं कि पेंशन मौत के समय के हालात पर टिकी है, न कि बाद की जिंदगी के फैसलों पर। सरकारी कर्मचारियों के परिवारों में यह मुद्दा अक्सर झगड़ों का कारण बनता था, लेकिन अब कानूनी स्थिति साफ हो गई है।

First Published : January 30, 2026 | 7:28 PM IST