इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
वर्ष 2026-27 का बजट उथलपुथल वाले परिदृश्य में पेश किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए जबरदस्त शुल्क से बनी अनिश्चितता के बीच सरकार इस बात को लेकर कड़ी मशक्कत कर रही है कि एक के बाद एक कई व्यापार समझौतों को अंजाम दिया जा सके। यूरोपीय संघ और भारत का मुक्त व्यापार समझौता इस कड़ी में सबसे ताजा है। कई देश इस बात की कोशिश भी कर रहे हैं कि वे अपने व्यापार संबंधों को विविधतापूर्ण बना सकें और इस अनिश्चितता से कुछ हद तक उबर सकें। इन समझौतों से होने वाले लाभ तत्काल नजर नहीं आएंगे। समझौते की पुष्टि, साथ ही नए बाजारों में मांग का सृजन, समय ले सकता है। दूसरे शब्दों में,अंतरराष्ट्रीय व्यापार से भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद अल्पकालिक चुनौतियां पूरी तरह कम नहीं हुई हैं।
घरेलू मोर्चे पर इसके साथ दो व्यापक अनिश्चितताएं संबद्ध हैं। पहली का संबंध सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आंकड़ों से है। वर्ष 2025-26 के पहले अग्रिम अनुमान यह संकेत देते हैं कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 8 फीसदी रहेगी जबकि वास्तविक वृद्धि के 7.4 फीसदी के साथ अपेक्षाकृत ऊंचे स्तर पर रहने का अनुमान है। सरकार का राजस्व प्रदर्शन आमतौर पर नॉमिनल जीडीपी वृद्धि से संबंधित होता है। 2026-27 के लिए अनुमानित नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ के बारे में, यह ध्यान देना जरूरी है कि जहां मुद्रास्फीति के अनुमान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति में तेजी का संकेत देते हैं, (जो भारतीय रिजर्व बैंक के सहनशीलता दायरे में लौट रही है) वहीं जीडीपी डिफ्लेटर पर आधारित औसत मुद्रास्फीति सीपीआई मुद्रास्फीति से नीचे रही है।
दूसरे शब्दों में, नॉमिनल वृद्धि के यथार्थवादी अनुमान 10 फीसदी से कम रह सकते हैं। अनिश्चितता का एक और तत्व नई जीडीपी श्रृंखला का जारी होना भी है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय 2022-23 को आधार वर्ष मानकर नई जीडीपी श्रृंखला जारी करने की प्रक्रिया में है। यद्यपि नई श्रृंखला अंतर्निहित आर्थिक गतिविधि को नहीं बदलती है और इस प्रकार सरकार द्वारा जुटाए जा सकने वाले करों पर कोई भौतिक प्रभाव नहीं डालती, लेकिन यह कुछ मापन और धारणा संबंधी चुनौतियां अवश्य उत्पन्न करती है।
उल्लेखनीय रूप से उच्च नॉमिनल जीडीपी स्तर राजकोषीय घाटे-से-जीडीपी और ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करेगा, साथ ही कर-जीडीपी अनुपात को भी। जहां पहले दो परिणाम वांछनीय हैं, वहीं अंतिम परिणाम वांछित नहीं है। इस परिदृश्य में बजट के लिए उपलब्ध प्राप्तियां सीमित हैं। नीचे दो प्रमुख बाधाओं का उल्लेख किया गया है।
1. राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के तहत ऋण-जीडीपी अनुपात ही राजकोषीय लक्ष्य है। पिछले बजट में निर्धारित उद्देश्य यह है कि केंद्र सरकार का ऋण-जीडीपी अनुपात 2030 तक घटाकर 50 फीसदी किया जाए। इसका अल्पकालीन उद्देश्य ऋण-जीडीपी अनुपात में कमी सुनिश्चित करना है। वर्तमान ऋण-जीडीपी अनुपात 55.1 फीसदी है (2025-26 के बजट में वर्ष के अंत में बकाया ऋण और जीडीपी के प्रथम अग्रिम अनुमान के आधार पर)।
यदि ऋण-जीडीपी अनुपात में 1 फीसदी अंक की कमी की जाए, तो यह लगभग 3.5 फीसदी राजकोषीय घाटा दर्शाएगा, यह मानते हुए कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 9 फीसदी है। उच्च नॉमिनल जीडीपी वृद्धि अधिक राजकोषीय घाटे के लिए गुंजाइश पैदा करती है। उच्च राजकोषीय घाटे की अनुमति देने के लिए सरकार को या तो ऋण-जीडीपी में कम सुधार चुनना होगा या नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर को अधिक रखना होगा।
2. सरकार के प्रमुख राजस्व स्रोत यानी कराधान की ओर रुख करें तो चालू वित्त वर्ष में राजस्व प्रदर्शन मध्यम रहा है। अर्थव्यवस्था में मांग को समर्थन देने के लिए, पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने आयकर दरों के साथ-साथ माल एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों को भी कम किया। आयकर में कमी का लक्ष्य उच्च-मध्य वर्ग था, जबकि जीएसटी दरों में कमी का उद्देश्य सभी उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करना था।
इन बदलावों ने मांग को कुछ प्रोत्साहित किया है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप राजस्व वृद्धि में कमी आई है। उपकर को छोड़कर जीएसटी राजस्व को देखें (क्योंकि सेस से होने वाला राजस्व किसी भी सरकार को नहीं मिलता है) तो मौजूदा वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में राजस्व वृद्धि सालाना आधार पर 14 फीसदी से अधिक थी, लेकिन नवंबर और दिसंबर में यह घटकर 2 फीसदी से नीचे आ गई। राजस्व प्रदर्शन में यह कमी संकेत देती है कि या तो कम करों का कीमतों में पूर्ण रूप से परिलक्षित होना बाकी है या फिर विभिन्न वस्तुओं की मांग की लोच एक से कम है। इसी तरह, प्रत्यक्ष करों में सकल संग्रहण निगम कर के लिए 7.7 फीसदी और व्यक्तिगत आयकर के लिए 1.2 फीसदी बढ़ा है।
हालांकि, शुद्ध संग्रहण क्रमशः 12 फीसदी और 6 फीसदी की अधिक वृद्धि दर्शाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, घरेलू करों में और सुधार जरूरी नहीं नजर आता। चालू वित्त वर्ष के लिए, बजट से राजस्व संग्रहण को स्थिर करने की अपेक्षा की जाएगी। जीडीपी वृद्धि दर में कमी को देखते हुए, राजस्व वृद्धि में भी मंदी के आसार हैं। इन सीमाओं के भीतर, सरकार के सामने पूंजीगत खर्च के जरिए वृद्धि को बढ़ावा देने और अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ाने के लिए एक ढांचे का समर्थन करने के बीच संतुलन बनाने का मुश्किल काम है।
इस संदर्भ में, सरकार द्वारा लागू की गई विभिन्न योजनाओं की चल रही व्यापक समीक्षा रुचि के साथ देखने योग्य क्षेत्र होगी। इन योजनाओं को तर्कसंगत बनाना उनकी उपयुक्तता और डिजाइन का आकलन करने का अवसर प्रदान कर सकता है, साथ ही उभरती प्राथमिकताओं के लिए गुंजाइश भी पैदा कर सकता है।
(लेखक राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान, नई दिल्ली की निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)