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बजट, सरकारी उधारी और आरबीआई: वित्त वर्ष 2027 के बढ़ते दबावों को संभालने की चुनौती

आगामी बजट एक नए युग की शुरुआत करेगा। राजकोषीय मजबूती का आधार घाटे और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात से हटकर ऋण और जीडीपी अनुपात पर केंद्रित होगा

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तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- January 29, 2026 | 10:06 PM IST

आगामी बजट एक नए युग की शुरुआत करेगा। राजकोषीय मजबूती का आधार घाटे और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात से हटकर ऋण और जीडीपी अनुपात पर केंद्रित होगा। ऋण-जीडीपी अनुपात मध्यम अवधि में वित्त वर्ष2026 के 56.1 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2031 तक 50 फीसदी (1 फीसदी कम या ज्यादा) तक पहुंच सकता है। हालांकि कर राजस्व में कमी है, लेकिन अधिकांश विश्लेषकों को उम्मीद है कि सरकार चालू वित्त वर्ष के लिए 4.4 फीसदी के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा कर लेगी। सरकारी उपक्रमों और केंद्रीय बैंक द्वारा उदार लाभांश भुगतान से यह संभव है।

वित्त वर्ष 2027 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य निश्चित रूप से कम होगा। यह जीडीपी के 4.2 से 4.3 फीसदी हो सकता है। लक्ष्य यदि 4.3 फीसदी रहता है, तो केंद्र सरकार का ऋण-जीडीपी अनुपात वर्तमान 56.1 फीसदी से घटकर 55 फीसदी हो जाएगा। सरकार यदि सामाजिक और आय सहायता योजनाओं पर व्यय में कटौती करने का निर्णय लेती है, तो लक्ष्य 4.2 फीसदी हो सकता है। इससे ऋण-जीडीपी अनुपात 54 फीसदी से नीचे आ जाएगा।

बैंकिंग क्षेत्र सरकार के वार्षिक उधार कार्यक्रम के आकार पर बारीकी से नजर रखेगा। यदि इस वर्ष के उधार कार्यक्रम को देखें तो लगता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को मदद का हाथ बढ़ाना होगा। वित्त वर्ष 2027 में केंद्र सरकार का कुल उधार कम से कम 16.5 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

रीडेम्पशन घटाने के बाद शुद्ध उधार काफी कम होगा। लेकिन राज्य सरकारों का उधार यानी राज्य विकास ऋण (एसडीएल) स्थिति को बिगाड़ देता है। मौजूदा साल में यह लगभग 13 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

चालू वर्ष में केंद्र सरकार का कुल उधार 14.72 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, और रीडेम्पशन घटाने के बाद शुद्ध उधार 11.54 लाख करोड़ रुपये होगा। अब तक 12.79 लाख करोड़ रुपये जुटाए जा चुके हैं। चालू वर्ष में कुल एसडीएल 11.83 लाख करोड़ रुपये है। इसमें से 8.23 लाख करोड़ रुपये जुटाए जा चुके हैं।

यह आपूर्ति पक्ष की कहानी है। क्या इतने बड़े उधार कार्यक्रम की मांग होगी? यही आरबीआई के सामने चुनौती है। चालू वर्ष में आरबीआई ने बाजार से बॉन्ड खरीदकर इस चुनौती का सामना किया है, जिसे आमतौर पर ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के नाम से जाना जाता है। वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड स्तर पर बॉन्ड खरीदे गए। इस माध्यम से रिकॉर्ड 6.45 लाख करोड़ रुपये (5 फरवरी तक) जुटाए जा रहे हैं, जो वित्त वर्ष 2025 में आरबीआई द्वारा खरीदी गई राशि से दोगुने से भी अधिक है। इससे पहले उच्चतम ओएमओ वित्त वर्ष 2021 में 3.13 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक था।

वित्त वर्ष 2009 में केंद्र सरकार की कुल उधारी पहली बार 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई। अगले वर्ष यह बढ़कर 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई। अगली बड़ी वृद्धि कोविड-19 से प्रभावित वित्त वर्ष 2021 में हुई। इसके पिछले वित्त वर्ष में यह 7 लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक थी, जो उस वर्ष बढ़कर 13.7 लाख करोड़ रुपये हो गई। वित्त वर्ष 2024 में यह 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई और अब वित्त वर्ष 2027 में 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की संभावना है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उधार की राशि बढ़ी है, लेकिन जीडीपी के फीसदी के रूप में यह काफी हद तक स्थिर रही है, वह भी सीमा के भीतर। कोविड और वैश्विक वित्तीय संकट के वर्ष अपवाद थे।

वित्त वर्ष 2008 से केंद्र सरकार की कुल उधारी कम से कम 10 गुना बढ़ गई है। आरबीआई ने इसे बखूबी संभाला है और वित्त वर्ष 2027 में भी वह ऐसा ही कर सकता है, क्योंकि कुल उधारी अधिक होने के बावजूद शुद्ध उधारी में कोई खास बदलाव नहीं होगा। लेकिन एसडीएल बोझ बनता जा रहा है। वैश्विक वित्तीय संकट से पहले राज्यों का ऋण हर साल केंद्रीय उधार का केवल 15-20 फीसदी होता था। वित्त वर्ष 2027 में यह 75-80 फीसदी हो सकता है और अगले कुछ वर्षों में एसडीएल केंद्र के वार्षिक उधार से भी अधिक हो सकता है।

एसडीएल की अत्यधिक आपूर्ति के कारण केंद्र सरकार और राज्य सरकार के 10 वर्षीय बॉन्डों की यील्ड में अंतर बढ़कर 85 आधार अंक हो गया है। सामान्यतः यह अंतर लगभग 40-50 आधार अंक होता है। लगभग एक दशक पहले तक, राज्य सरकारों को अपने राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) का एक हिस्सा मिलता था। 14वें वित्त आयोग ने राज्य सरकारों को एनएसएसएफ से बाहर करने की सिफारिश की क्योंकि इस माध्यम से जुटाया गया धन बाजार से लिए गए ऋण की तुलना में अधिक महंगा होता है।

सरकार ने फरवरी 2015 में इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया और मंत्रिमंडल ने अप्रैल 2016 से अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, केरल और मध्य प्रदेश को छोड़कर सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को एनएसएसएफ से बाहर करने की मंजूरी दे दी। राज्य सरकारें वित्त वर्ष 2039 तक एनएसएसएफ योजना में बकाया राशि का भुगतान करेंगी।

अपने राजकोषीय घाटे से निपटने के लिए राज्यों ने अपेक्षाकृत अधिक लागत वाली एनएसएसएफ से हटकर बाजार आधारित योजनाओं की ओर रुख किया है। राज्यों द्वारा कृषि, महिलाओं और बेरोजगारों के लिए प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण या सब्सिडी के रूप में कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करने के कारण उनके ऋण में वृद्धि हुई है।

इस बीच, बाजार में कुछ संरचनात्मक बदलाव हुए हैं जिनका असर सरकारी बॉन्डों की मांग पर पड़ा है। सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर), जिसके तहत बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड खरीदना अनिवार्य है, घट रहा है। अब यह उनकी कुल मांग और समयबद्ध देनदारियों का 18 फीसदी है, जो जमा राशि का एक अनुमानित संकेतक है। वर्ष 1990 के दशक की शुरुआत में, जब यह अपने चरम पर था, तब 38 फीसदी था।

म्युचुअल फंडों के लिए इंडेक्सेशन लाभ और बॉन्ड निवेश के लिए उपयोग किए जाने वाले बीमा उत्पादों के कर लाभ समाप्त कर दिए गए हैं। भविष्य निधि और बीमा कंपनियों को इक्विटी में अधिक पैसा लगाने की अनुमति दी गई है। बॉन्ड के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो गए हैं।

बैंकों के बॉन्ड पोर्टफोलियो के वर्गीकरण मानदंडों में भी बदलाव किया गया है। बैंकों को बॉन्ड निवेश को ‘हेल्ड-टु-मैच्योरिटी’ श्रेणी से किसी अन्य श्रेणी में साल में एक बार स्थानांतरित करने की अनुमति है, लेकिन इसके लिए बोर्ड की मंजूरी के अलावा आरबीआई की मंजूरी भी आवश्यक है।

इन सभी कारणों से स्थानीय बॉन्ड खरीदारों की जोखिम लेने की प्रवृत्ति कम हो गई है। इसमें रुपये की कमजोरी भी जुड़ गई है। मौजूदा चक्र में आरबीआई द्वारा की गई 125 आधार अंक की ब्याज दर कटौती का असर 10 साल की बॉन्ड यील्ड पर नहीं दिख रहा है, लेकिन बाजार की यही प्रकृति है। यह नीतिगत दर में किसी भी बदलाव को पहले से ही ध्यान में रखता है, चाहे वह कटौती हो या बढ़ोतरी।

संक्षेप में कहें तो, वित्त वर्ष 2027 में केंद्र सरकार की बढ़ी हुई कुल उधारी कोई चुनौती नहीं होगी, लेकिन राज्य विकास ऋण का बढ़ता आकार चिंता का विषय है। 10-वर्षीय बॉन्ड पर यील्ड में वृद्धि ही हो सकती है, और यील्ड कर्व और भी सख्त हो सकता है, यानी कम अवधि वाले बॉन्ड में गिरावट और लंबी अवधि वाले बॉन्ड में वृद्धि हो सकती है।

First Published : January 29, 2026 | 9:52 PM IST