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Editorial: ट्रंप की धमकियों से बढ़ी वैश्विक अनिश्चितता, सुरक्षित निवेश बने सोना-चांदी

वर्ष 2026 के पहले चार सप्ताह में ही सोना 20 फीसदी और चांदी आश्चर्यजनक रूप से 59 फीसदी तक बढ़ी है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 28, 2026 | 9:41 PM IST

जनवरी 2026 में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड से संबंधित मांगों के कारण भू-राजनीतिक तनाव में इजाफा देखने को मिला। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक व्यापार में भी अनिश्चितता बढ़ी। इन धमकियों और अनिश्चितताओं का वैश्विक परिसंपत्तियों पर सीधा प्रभाव देखने को मिला। सोने और चांदी दोनों में बहुत अधिक तेजी देखने को मिली। वर्ष 2026 के पहले चार सप्ताह में ही सोना 20 फीसदी और चांदी आश्चर्यजनक रूप से 59 फीसदी तक बढ़ी है। इस बीच जापान और अमेरिका के बॉन्ड बाजारो में तीव्र मंदी का रुख रहा है, जबकि शेयर बाजार सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करते रहे और निवेशक तनाव कम होने की उम्मीद में प्रतीक्षा करते रहे।

अमेरिकी वॉल स्ट्रीट इस आशंका के लिए तैयार हो रहा है कि यूरोपीय और जापानी निवेशक अमेरिका की सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में अपने करीब 9 लाख करोड़ डॉलर के निवेश का एक बड़ा हिस्सा बेचना आरंभ कर सकते हैं। यदि निवेशक वास्तव में अमेरिकी ट्रेजरी से बाहर निकलने का फैसला करते हैं तो इससे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और बढ़ जाएगी तथा अमेरिका के लिए अपने 30 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के भारी-भरकम ऋण को चुकता करना और महंगा हो जाएगा। इससे कंपनियों के लिए डॉलर मूल्य में ऋण जुटाना और व्यक्तियों के लिए अमेरिकी आवास ऋण को चुकाना भी अधिक महंगा हो जाएगा।

परंपरागत रूप से सोना तथा अन्य कीमती धातुएं अनिश्चित समय में पूंजी के सबसे सुरक्षित ठिकाने माने जाते हैं। पिछले एक साल से अधिक समय यकीनन इसके उपयुक्त है। ट्रंप प्रशासन के जनवरी 2025 में सत्ता संभालने के बाद से कीमती धातुओं में जबर्दस्त तेजी देखी गई है। तब से अब तक सोना 65 फीसदी और चांदी आश्चर्यजनक रूप से 150 फीसदी तक बढ़ चुकी है। ध्यान रहे कि चांदी इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए काफी जरूरी है।

इस अनिश्चितता के कारण भारतीय निवेशक मुश्किल हालात में हैं। निफ्टी बेंचमार्क सूचकांक जनवरी में अब तक करीब 3.3 फीसदी की गिरावट दर्ज कर चुका है जबकि 2025 में इसने 9.8 फीसदी की वृद्धि हासिल की थी। रुपया भी लगातार दबाव में है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में अपनी हिस्सेदारी लगातार कम की है। जनवरी 2025 से अब तक उन्होंने 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की इक्विटी परिसंपत्तियों की बिक्री की है। दलाल स्ट्रीट केवल घरेलू इक्विटी म्युचुअल फंड्स में 3.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के शुद्ध निवेश के कारण ही टिक सका है। इस धन का अधिकांश हिस्सा खुदरा निवेशकों से आया है।

ट्रंप प्रशासन की विसंगतिपूर्ण और गलत नीतियों ने अमेरिकी डॉलर में भी गिरावट उत्पन्न की है। जनवरी 2025 से अब तक डॉलर में यूरो के मुकाबले 13.7 फीसदी की गिरावट आई है। इसके साथ ही अमेरिकी ऋण पर बढ़ती यील्ड कुल मिलाकर अमेरिका पर और अधिक दबाव डालती है जो कि स्वयं एक आयातक है। गत वर्ष जनवरी से रुपये में भी भारी कमजोरी आई है। वह डॉलर के मुकाबले 8.5 फीसदी और यूरो के मुकाबले करीब 20 फीसदी गिरा है। मौजूदा वैश्विक आर्थिक वातावरण और खासतौर पर अमेरिका के साथ व्यापारिक हालात को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को अवमूल्यित होने देने का सही निर्णय लिया है। यह शुल्क संबंधी नुकसान की भरपाई तो नहीं करेगा लेकिन भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा करने का सर्वोत्तम अवसर जरूर प्रदान करेगा।

शेयर बाजारों की बात करें तो आंकड़े बताते हैं कि देश के इक्विटी बाजार पूरी तरह घरेलू फंडिंग के दम पर टिके हैं जिनमें घरेलू बचत का अहम योगदान है। बहरहाल, अगर शेयर बाजार लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन करते हैं या शेयर कीमतों में तेज गिरावट आती है तो उनका निवेश कम हो सकता है या वापस भी हो सकता है। भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए मंदी के बाजार की आशंका भी है और निवेशक इससे निपटने की तैयारी में हो सकते हैं। ऐसे में भारतीय शेयर बाजारों में आने वाले सप्ताहों में क्या होगा वह काफी हद तक वैश्विक कारकों पर निर्भर होगा। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या आगामी बजट शेयर बाजार के मिजाज में सुधार लाता है।

First Published : January 28, 2026 | 9:32 PM IST