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Editorial: कंपनियों के पास पैसा भरपूर, फिर भी निवेश सुस्त

भारत की गैर सूचीबद्ध कंपनियां वित्तीय रूप से दशकों की सबसे मजबूत वित्तीय स्थिति में हैं

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 14, 2026 | 11:01 PM IST

भारत की गैर सूचीबद्ध कंपनियां वित्तीय रूप से दशकों की सबसे मजबूत वित्तीय स्थिति में हैं। इतनी मजबूत वे पहले कभी नहीं रही हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि उन पर ऋण का भार 35 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है, साथ ही उनका ब्याज कवरेज अनुपात ऊंचा है और मुनाफा भी बेहतर है। ये कंपनियां, उत्पादन, रोजगार और निजी निवेश का बड़ा हिस्सा हैं और इनमें कई बड़ी और संपन्न इकाइयां शामिल हैं। जैसे परिवार-स्वामित्व वाले औद्योगिक समूह, अधोसंरचना कंपनियां और वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भारतीय शाखाएं।

कई कंपनियों की बैलेंस शीट काफी मजबूत है। वे वर्तमान से कहीं अधिक उधार ले सकती हैं और निवेश कर सकती हैं। फिर भी, ये कंपनियां अक्सर क्षमता विस्तार के लिए नहीं बल्कि पुराना कर्ज चुकाने के लिए उधार ले रही हैं। यदि मजबूत मुनाफे, कम ऋण बोझ और आसान ऋण उपलब्धता वाली कंपनियां भी जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं, तो समस्या स्पष्ट रूप से वित्त से परे कहीं और है।

इक्रा द्वारा पिछले वर्ष जारी किए गए विश्लेषण, जिसमें 8,000 गैर-सूचीबद्ध कंपनियों और 4,500 सूचीबद्ध कंपनियों को शामिल किया गया था, से पता चलता है कि कुल निजी पूंजीगत व्यय में मंदी के लिए मुख्य रूप से गैर-सूचीबद्ध कंपनियां जिम्मेदार हैं। हालांकि यह सतर्कता केवल गैर-सूचीबद्ध कंपनियों तक सीमित नहीं है। देश के कारोबारी जगत में मुनाफा मजबूत है लेकिन निवेश की चाह कमजोर है। गैर-वित्तीय कंपनियां अपनी कुल परिसंपत्तियों का लगभग 11 प्रतिशत नकदी के रूप में रखे हुए हैं।

वे मूल व्यावसायिक गतिविधियों के बजाय निष्क्रिय स्रोतों से अधिक कमाई कर रही हैं। पूंजीगत लाभ और अन्य गैर-परिचालन आय सहित निष्क्रिय आय का हिस्सा पिछले दशक में लगभग दोगुना हो गया है। बड़ी गैर-वित्तीय कंपनियों में, संयंत्र, मशीनरी और निर्माणाधीन परियोजनाओं जैसी भौतिक परिसंपत्तियों का हिस्सा लगातार घटा है, जबकि वित्तीय परिसंपत्ति लगातार बढ़ी हैं। दूसरे शब्दों में, मुनाफे वाली कंपनियां अपने अधिशेष को कारखानों, अधोसंरचना या नई क्षमता में लगाने के बजाय वित्तीय बाजारों में रखना पसंद कर रही हैं।

यह व्यवहार भारत की अतीत की निवेश मंदी से बिल्कुल अलग है। वर्ष 2010 के दशक में वृद्धि को दोहरी बैलेंस शीट की समस्या ने रोके रखा था। यानी अत्यधिक ऋणग्रस्त कंपनियां और दबावग्रस्त बैंक। आज कॉर्पोरेट बैलेंस शीट साफ है, बैंक अच्छी तरह पूंजीकृत हैं, फंसा हुआ कर्ज और फंसी परिसंपत्तियां कम हैं और ऋण आसानी से उपलब्ध है। फिर भी निजी निवेश डांवाडोल नजर आ रहा है। इसके कई कारण हैं: मांग असमान बनी हुई है, शहरी खपत में धीमापन आया है, ग्रामीण सुधार धीमा रहा है, निर्यात में कमी है, सस्ते आयात खासकर चीन से होने वाले आयात ने कुछ क्षेत्रों के मार्जिन पर असर डाला है।

ध्यान रहे कि कंपनियां तभी निवेश करेंगी जब उन्हें स्थायी प्रतिफल की उम्मीद होगी। वे केवल अल्पकालिक मुनाफे के लिए ऐसा नहीं करेंगी। इसके अलावा, व्यावसायिक उत्तराधिकारियों की बढ़ती संख्या क्षमता विस्तार के बजाय संपत्ति प्रबंधन में अधिक सहज दिखती है। सामान्य समस्याएं भी बरकरार हैं। भूमि अधिग्रहण में देरी, पर्यावरणीय मंजूरी और मुकदमेबाजी पूंजी को वर्षों तक अटका सकती हैं। इस परिदृश्य में, उभरते पूंजी बाजारों ने वित्तीय निवेश को वास्तविक क्षेत्र में निवेश की तुलना में अधिक सुरक्षित और लाभकारी बना दिया है।

निजी निवेश के धीमी गति से इजाफा होने के कारण आर्थिक गति को बरकरार रखने का बोझ असमान रूप से सरकार पर आ गया है। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ही अधिकांश भार उठा रहा है, खासकर अधोसंरचना के क्षेत्र में। यद्यपि ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2047 तक उच्च-आय श्रेणी तक पहुंचने के लिए भारत को कुल निवेश को सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा। यह निजी पूंजीगत व्यय में निर्णायक सुधार के बिना असंभव प्रतीत होता है। अब चुनौती प्रोत्साहनों या ऋण उपलब्धता की नहीं, बल्कि मांग, नीतिगत स्थिरता और क्रियान्वयन में विश्वास बहाल करने की है।

First Published : January 14, 2026 | 9:58 PM IST