अद्वैत चंदन की फिल्म लाल सिंह चड्ढा अच्छाई और मानवता का संदेश देती एक प्यारी, मजेदार फिल्म है। रॉबर्ट जेमेकीस और एरिक रोथ ने फॉरेस्ट गम्प के रूप में एक ऐसे व्यक्ति कहानी रची थी जो अपनी अच्छाई से दुनिया को बदलता है। अद्वैत चंदन और अतुल कुलकर्णी ने लाल सिंह चड्ढा के रूप में उसका एक अच्छा भारतीय संस्करण तैयार किया है। पिछले दिनों द अकैडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स ऐंड साइंसेज ने भी ट्वीट किया था कि आमिर खान वह भूमिका निभा रहे हैं जिसे टॉम हैंक्स ने मशहूर किया।
रंग दे बसंती और नटरंग जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके अतुल कुलकर्णी ने 2008 में फॉरेस्ट गम्प की कहानी को भारत के हिसाब से ढालकर तैयार किया और निर्माता आमिर खान के पास पहुंचे। पहले खान इसे लेकर हिचकिचा रहे थे। खान ने एक जगह कहा, ‘मैंने अतुल से कहा कि फॉरेस्ट गम्प एक क्लासिक फिल्म है जो अमेरिकी संस्कृति में गहराई से रची बसी है।’ खान के बारे में सभी जानते हैं कि वे किसी परियोजना में समय लेते हैं। उनके विषय विशिष्ट होते हैं और वह उनमें अपना सर्वस्व झोंक देते हैं फिर चाहे वह अभिनय कर रहे हों या निर्माता हों। सन 2001 में आई फिल्म लगान अंग्रेज शासकों और भारतीय ग्रामीणों के बीच एक काल्पनिक क्रिकेट मैच का चित्रण करती थी। उस फिल्म को 2002 में विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ऑस्कर में नामित किया गया था।
2005 में आई यशराज फिल्म्स की मंगल पांडेय: द राइजिंग सन 1857 के गदर के बारे में थी जिसने आजादी की लड़ाई की शुरुआत की। 2007 में आई फिल्म तारे जमीं पर में खान ने सह निर्देशन किया था। यह फिल्म डिसलेक्सिया से पीड़ित एक बच्चे के स्कूल में संघर्ष की दिल को छू लेने वाली कहानी थी। बतौर निर्माता उनकी बेहतरीन फिल्म दंगल 2016 में डिज्नी के साथ आई थी। यह कहानी महावीर सिंह फोगाट की है जो अपनी बेटियों को कुश्ती की दुनिया में स्वीकार्यता दिलाना चाहते हैं। यह न केवल देश की सबसे अव्वल फिल्मों में से एक है बल्कि यह सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म भी है।
इसने दुनिया भर में केवल थिएटर से 2,200 करोड़ रुपये से अधिक कमाए। खान ने जब एक बार लाल सिंह चड्ढा के लिए हां कर दी तो आठ वर्ष तक वह इस रीमेक का अधिकार हासिल करने का प्रयास करते रहे। पता चला कि फिल्म के अधिकार पैरामाउंट नामक कंपनी के पास हैं जो वायकॉम 18 स्टूडियोज में भी हिस्सेदार है। अंत में मई 2018 में पैरामाउंट के चेयरमैन जिम जियानपुलॉस और वायकॉम 18 स्टूडियोज के मुख्य कार्याधिकारी अजित अंधारे के बीच एक मुलाकात के बाद बात बन गई। वायकॉम 18 स्टूडियोज और आमिर खान प्रोडक्शंस ने निर्माण शुरू कर दिया लेकिन तभी महामारी आ गई। कोविड की तीन लहरों के बीच ही फिल्म का निर्माण हुआ।
इसके बाद वह हिस्सा आता है जो मैं इस स्तंभ में कहना चाहती हूं। केवल एक भारतीय फिल्मकार, लेखक, स्टूडियो और अदाकार ही ऐसी फिल्म का रीमेक बनाने का साहस कर सकता है जिसने छह ऑस्कर जीते हों और जिसे एक क्लासिक माना जाता हो। इस लिहाज से 1994 में बनी फॉरेस्ट गम्प की आधिकारिक भारतीय रीमेक को भारतीय सिनेमा के आत्मविश्वास और क्षमताओं का प्रतीक माना जा सकता है। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिन्होंने 109 वर्षों के दौरान हॉलीवुड की ताकत के सामने अपना विशिष्ट सिनेमा बनाया। चीन में एक साल में केवल 34 विदेशी फिल्में दिखाई जा सकती हैं।
अधिकांश यूरोपीय देशों ने हॉलीवुड की फिल्मों की सीमा तय की है लेकिन भारत में ऐसी कोई रोकटोक नहीं है। इसके बावजूद हमारे यहां थिएटर से आने वाले राजस्व का 90 प्रतिशत भारतीय फिल्मों से आता है। केवल 10 फीसदी हिस्सा हॉलीवुड को जाता है। भारतीयों को अपनी कहानियां पसंद आती हैं। ओंकारा, जॉनी गद्दार, सैराट, अंधाधुन, बधाई हो, दृश्यम, जय भीम या असुरन ऐसे ही कुछ नाम हैं। महामारी के पहले यानी 2019 में भारतीय सिनेमा ने 19,100 करोड़ रुपये का कारोबार किया जिसमें सबसे अधिक हिस्सेदारी टिकटों से आई। बाकी 40 फीसदी हिस्सा टीवी और ओटीटी से आया। टीवी पर देखी जाने वाली सामग्री में एक चौथाई फिल्म के रूप में होती है। ओटीटी पर भी इनकी हिस्सेदारी 30-40 फीसदी है।
मल्टीप्लेक्स के आगमन के साथ ही रचनात्मक माहौल और विकसित हुआ। उसके बाद कॉर्पोरेटीकरण से और पूंजी तथा वित्तीय स्थिरता आनी शुरू हुई। मीनल मुरली, आरआरआर, डार्लिंग्स, जैसी भारतीय फिल्में अक्सर नेटफ्लिक्स या अन्य ओटीटी पर ट्रेंड करती हैं। रीमिक्स और सेक्रेड गेम्स सीजन वन जैसे भारतीय शो अंतरराष्ट्रीय एम्मी अवार्ड के लिए नामित हो चुके हैं। 2020 में डेल्ही क्राइम को यह पुरस्कार हासिल भी हुआ था। कोरिया और शायद ब्रिटेन को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई ऐसा देश है जहां स्थानीय सिनेमा का विकास हो रहा है। बॉक्स ऑफिस के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष 10 बाजारों में से एक है क्योंकि हमारे यहां स्थानीय सिनेमा उद्योग है।
जैसा कि हमने पहले भी कहा है भारतीय सिनेमा उसकी सांस्कृतिक ताकत का प्रतीक है। कई देश ऐसी ताकत हासिल करना चाहेंगे। अगर खबरों पर यकीन किया जाए तो चीन में 3 ईडियट्स और दंगल की सफलता के बाद चिंता में बैठकें तक आयोजित हुईं।
हैरी पॉटर या डिज्नी की शैली में इस शक्ति या अर्थव्यवस्था में इसके योगदान को न तो बहुत स्वीकार किया जाता है न ही इसका जश्न मनाया जाता है। अगर शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत अथवा मोहनलाल की फिल्मों पर केंद्रित टूर आयोजित किया जाए तो कैसा रहेगा? या फिर फिल्मकारों या स्टूडियो पर? अगर यूनाइटेड किंगडम सन 1995 की क्लासिक फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के पात्रों राज और सिमरन का बुत बनाने पर विचार कर सकता है तो हम क्यों नहीं? ऐसे कदमों से आय, कर और रोजगार बढ़ेंगे। ध्यान रहे इस समय टीवी, ओटीटी और फिल्मों में 25 लाख लोग काम कर रहे हैं।
दुनिया में सबसे अधिक सिनेमा स्क्रीन चीन में हैं लेकिन वहां दबदबा चीन के नहीं हॉलीवुड के सिनेमा का है। पश्चिम एशिया, दक्षिण अमेरिका या यूरोप में ऐसा स्थानीय सिनेमा नहीं है जिसका उल्लेख किया जाए। अगर हम अपनी इस विविधताभरी शक्ति की सराहना नहीं करेंगे और जश्न नहीं मनाएंगे और इसकी अनदेखी करेंगे तो भारतीय सिनेमा को पिछड़ते देर नहीं लगेगी। तब हमारा सिनेमा उद्योग भी हॉलीवुड की फिल्मों का एक अड्डा बनकर रह जायेगा।