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बैंकिंग जगत होगा वृद्धि का वाहक, क्या बजट होगा इसमें सहायक?

Last Updated- December 12, 2022 | 9:06 AM IST

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिसंबर में औद्योगिक संगठनों को संबोधित करते हुए वादा किया कि केंद्रीय बजट में जीवंतता होगी, वह आर्थिक सुधार की दृष्टि से अहम होगा और इसमें बुनियादी क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय को जारी रखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत वैश्विक वृद्धि का इंजन बनने को तैयार है।
एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में वृद्धि को नए सिरे से गति देने का दायित्व बैंकिंग क्षेत्र पर है। अतीत में भी बजट के दौरान कई ऐसे वादे किए गए जो पूरे नहीं हुए। उदाहरण के लिए 29 फरवरी, 2000 को यशवंत सिन्हा ने बजट में कहा था कि सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी घटाकर 33 प्रतिशत की जाएगी जबकि इन बैंकों के सार्वजनिक स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
इस बार उम्मीद है कि बैड बैंक की स्थापना होगी, बुनियादी क्षेत्र की फाइनैंसिंग का बोझ बैंकों से हटाने के लिए विकास वित्त संस्थान (डीएफआई) की स्थापना होगी और कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाएगा। हाल ही में बैंकों और गैर बैंकिंग कंपनियों को सही अनुपालन अपनाने और जोखिम को जल्दी पहचानने की सलाह देते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि देश का केंद्रीय बैंक बढ़ते फंसे हुए कर्ज पर विचार करने के लिए बैड बैंक पर विचार कर सकता है। आरबीआई का अनुमान है कि सितंबर 2021 तक बैंकिंग क्षेत्र का फंसा हुआ कर्ज 14.8 फीसदी पहुंच सकता है। पिछले साल की समान अवधि तक यह 7.5 फीसदी था।
सरकारी बैंकों में तो इसका स्तर 9.7 फीसदी से बढ़कर 17.6 फीसदी पहुंच सकता है। ऐसे में दास का बैड बैंक के प्रस्ताव पर विचार करने की बात कहना पुरानी बहस को दोबारा छेड़ गया।
यह विचार नया नहीं है। मई 2020 में भारतीय बैंक महासंघ (आईबीए) ने वित्त मंत्रालय और आरबीआई के समक्ष बैड बैंक की स्थापना का प्रस्ताव रखा था। उससे भी पहले जनवरी 2017 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया था कि एक सरकारी परसंपत्ति पुनर्वास एजेंसी की स्थापना की जाए। आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सुझाव दिया था कि संकटग्रस्त सरकारी बैंकों में फंसे कर्ज की समस्या निपटाने के लिए दो संस्थाओं का गठन किया जाए। पहली, एक निजी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी और दूसरी एक राष्ट्रीय परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी।
आईबीए वैकल्पिक निवेश फंड का हिमायती है ताकि फंसे कर्ज के बदले वाली प्रतिभूति प्राप्तियों का व्यापार द्वितीयक बाजार में किया जा सके। वह फंसे कर्ज के प्रबध्ंान के लिए निजी सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा संचालित परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी का भी हामी है।
विशेषज्ञ इसके लिए मलेशिया का उदाहरण दे रहे हैं जहां एशियाई वित्तीय संकट के बाद दानहार्ता के रूप में बैड बैंक स्थापित किया गया था। मलेशिया की सरकार ने इस उपक्रम को फंड किया और इसे सफल बनाने के लिए कानूनों में बदलाव किए। दानहार्ता सफल उदाहरण है। अमेरिका में भी 426.4 अरब डॉलर का संकटग्रस्त परिसंपत्ति राहत कार्यक्रम सफल रहा। इसे वैश्विक वित्तीय संकट के बाद वित्तीय संस्थानों से खराब परिसंपत्ति और इक्विटी खरीदने के लिए शुरू किया गया था। क्या भारत में ऐसा प्रयोग सफल होगा?
हमारे यहां बेहतर होगा कि हर बैंक को अपने स्तर पर एक बैड बैंक बनाने को कहा जाए जहां फंसे कर्ज का निस्तारण किया जाए। समन्वय और प्रक्रिया को तेज करने के लिए एक केंद्रीय व्यवस्था हो। साथ ही ऋणशोधन कानून की कमियों को दूर करना भी जरूरी है। पूरे उद्योग के लिए एक बैड बैंक के बजाय दर्जनों बैड बैंक पनपने दिए जाएं।
चर्चा है कि सरकार बुनियादी विकास के वित्त पोषण के लिए डीएफआई की योजना बना रही है। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में वित्तीय सेवा सचिव देबाशिष पांडा ने इस बात पर जोर दिया कि बुनियादी विकास के लिए दीर्घावधि की पूंजी चाहिए और बैंक इसके लिए तैयार नहीं हैं, ऐसे में डीएफआई उपयोगी साबित हो सकते हैं। पांडा के अनुसार सरकार ऐसे संस्थान की अंशधारिता जैसे ब्योरों को अंतिम रूप दे रही है और निर्णय कर रही है कि क्या इसे कानून के जरिये बनाया जाए?
सैद्धांतिक रूप से यह सही लगता है। डीएफआई उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकते हैं और उन क्षेत्रों में काम कर सकते हैं जहां अन्य संस्थान जोखिम के कारण हिचकिचाएं। कई लोग मानते हैं कि सन 1990 के दशक में डीएफआई के खात्मे ने फंसे कर्ज का स्तर बढ़ाया। भारत ने सार्वभौमिक बैंकिंग को खुले दिल से अपनाया लेकिन हमारे बैंक जो कार्यशील पूंजी कर्ज के रूप में देने के आदी हैं, उन्हें परियोजनाओं को ऋण देना कभी सहज नहीं लगा। बॉन्ड बाजार भी इतना बेहतर नहीं विकसित हुआ कि बुनियादी ढांचे की मदद कर सके। तो क्या हमें डीएफआई की आवश्यकता है?
इसे तभी कामयाबी मिलेगी जब पता चले कि फंड कहां से आएगा? सस्ती पूंजी का स्रोत समाप्त होने के बाद डीएफआई का अंत निश्चित है। क्या सरकार ऐसे संस्थानों को लंबे समय तक सस्ती पूंजी मुहैया करा सकती है?
अतीत में ऐसे दो प्रयास नाकाम रहे क्योंकि ऐसे संस्थानों के प्रबंधन को जवाबदेह नहीं बनाया जा सका। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के शीर्षस्थ अधिकारी ने वर्षों तक इसे प्रवर्तक की तरह चलाया और इसका पतन हो जाने पर पेशेवर तरीके से अलग हो गए। जुलाई 1996 के बजट की घोषणा के तहत निर्मित इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी को बैंक में बदलना पड़ा क्योंकि वह मूल स्वरूप में बच नहीं सकी।
बजट से यह भी अपेक्षा है कि कमजोर सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाए या उनमें सरकारी हिस्सेदारी कम की जाए। पांडा ने यह भी कहा कि सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के लिए जल्द सामने आने वाली नीति सरकारी बैंकों के विलय और एकीकरण की राह आसान करेगी।
यह अच्छी बात है और सबको इसकी प्रतीक्षा है। भारतीय जीवन बीमा निगम शेयर बाजार में आने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में माना जा सकता है कि आईडीबीआई की तरह बैंक निजीकरण का मखौल नहीं बनेगा। देखना है सरकार यह कठिन कदम उठाती है या नहीं?

First Published - January 29, 2021 | 11:32 PM IST

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