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एक असहज जलवायु गठबंधन

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कॉप 28 के अध्यक्ष सुल्तान अल-जबेर की जीवनी पढ़कर हमें भविष्य के जलवायु कदमों पर करीबी अंत:दृष्टि मिल सकती है।

Last Updated- December 25, 2023 | 2:53 PM IST
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संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज का 28वां संस्करण यानी कॉप28 की बैठक पिछले दिनों दुबई में संपन्न हो गई। कई जलवायु कार्यकर्ताओं के लिए यह बैठक विफल रही क्योंकि अंतिम संवाद में जो कदम उठाने के वादे किए गए हैं वे कार्बन उत्सर्जन को औद्योगीकरण के पूर्व के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के लिए जरूरी न्यूनतम अनिवार्यताओं से कमतर हैं।

कई लोग मानते हैं कि यह नाकामी पहले से तय थी क्योंकि कॉप28 का आयोजन जीवाश्म ईंधन के एक बड़े निर्यातक संयुक्त अरब अमीरात को दिया गया था जिसने आयोजन का मुखिया ऐसे व्यक्ति को चुना जो वहां की राष्ट्रीय तेल कंपनी का मुखिया है। ऐसे में पर्यावरण के अनुकूल घोषणाओं की अपेक्षा कम ही लोगों को रही होगी।

यह सही है कि इस कॉप28 में केवल सौदे बाजी नहीं हुई। वहां जीवाश्म ईंधन के प्रतिनिधि भी काफी नजर आ रहे थे। इससे पहले मिस्र के शर्म-अल-शेख में आयोजित कॉप में भी ऐसे ही हालात थे। ऐसे में व्यापक आलोचना अनुचित है और ऐसा करके हम एक व्यापक तस्वीर की अनदेखी कर सकते हैं।

कॉप 28 के अध्यक्ष सुल्तान अल-जबेर की जीवनी पढ़कर हमें भविष्य के जलवायु कदमों पर करीबी अंत:दृष्टि मिल सकती है। वह 2016 से अबू धाबी नैशनल ऑयल कंपनी चलाते हैं जबकि वह अबू धाबी से नहीं बल्कि संयुक्त अरब अमीरात के छोटे अमीरात से आते हैं। परंतु उन्होंने अपने करियर की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात की नवीकरणीय ऊर्जा कंपनी मासदार की स्थापना और संचालन से की थी।

मासदार देश की जीवाश्म ईंधन से हासिल आय का कुछ हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा में लगाती है। तथ्य यह है कि अमीर देशों के खजाने से ज्यादा पैसा नहीं आने की संभावना के चलते और राजनीतिक दृष्टि से ऐसा होना मुश्किल होने के बाद पर्यावरण के अनुकूल तकनीक के लिए निवेश विरासती उद्योगों से ही हासिल होगा। ऊर्जा बदलाव के लिए मौजूदा ऊर्जा कंपनियों के मुनाफे को इस्तेमाल करने की आवश्यकता होग।

उदाहरण के लिए विचार कीजिए, केंद्र सरकार देश में ऊर्जा बदलाव को कैसे अंजाम देने जा रही है। उसने सरकारी तेल कंपनियों के अकार्बनीकरण कार्यक्रम के समर्थन के लिए 30,000 करोड़ रुपये के बजट समर्थन का वादा किया है परंतु यह पेट्रोल और डीजल की राजनीति प्रेरित कीमतों के कारण होने वाली अंडर रिकवरी की क्षतिपूर्ति अधिक नजर आती है।

बजट समर्थन यह सुनिश्चित करने के लिए दिया जा रहा है ताकि तेल कंपनियां देश के भीतर ऊर्जा बदलाव के लिए आंतरिक संसाधनों का आवंटन करती रहे हैं। देश के हरित हाइड्रोजन मिशन के क्रियान्वयन में भी यह रुख देखा जा सकता है। अधिकारियों ने 2024-25 तक सरकारी तेल एवं गैस कंपनियों के लिए 230 किलोटन हरित हाइड्रोजन का लक्ष्य तय किया है।

यह दलील ऊर्जा क्षेत्र के परे विभिन्न कार्बन गहन क्षेत्रों तक लागू है जिनमें इस्पात से लेकर सीमेंट तक शामिल हैं। इन क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने के लिए उन कंपनियों का सहयोग जरूरी होगा जिनका अभी इन क्षेत्रों में दबदबा है। मुख्यतौर पर इसलिए कि अकार्बनीकरण की कीमत उन्हें अपनी आय से चुकानी होगी। मुनाफा अपनी तरह से प्रेरित करता है और जब तक कोई ठोस वित्तीय दलील प्रबंधन और कंपनियों के सामने नहीं हो, वे न केवल प्रतिरोध करेंगे बल्कि अकार्बनीकरण के प्रयासों की अनदेखी भी करेंगे। वे कम कार्बन वाले विकल्पों और नवाचार के लिए अपना मुनाफा देने से भी इनकार कर सकते हैं।

इस समस्या का सबसे सहज उत्तर यह हो सकता है कि सख्त नियमन लागू किए जाएं और बाजार को नए, हरित विकल्प तैयार करने दिया जाए। रचनात्मक विनाश हमें सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध नतीजे देगा, बशर्ते कि हमारा लक्ष्य एक किफायती कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था बनाने का हो। यह हमें उन कंपनियों और निवेशकों से बचा सकता है जिनके हित यथास्थिति को बरकरार रखने में हैं। खेद की बात है कि शायद हमारे पास पहले श्रेष्ठ विकल्प के क्रियान्वयन का समय न हो। अधिकांश जलवायु वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि अगले कुछ वर्षों में काफी निवेश और क्षमता विस्तार की आवश्यकता होगी ताकि 2030 के पहले विश्वसनीय अंतर पैदा किया जा सके। ऐसा किए बिना तापवृद्धि को नियंत्रित करना मुश्किल होगा।

कुल मिलाकर विरासती उद्योगों की पुरानी कंपनियों के साथ सहयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह तरीका कारगर हो सकता है बशर्ते कि हमारे पास उनके प्रोत्साहन को लेकर साफ नजरिया हो। कॉप 28 में जीवाश्म ईंधन कंपनियों की उपस्थिति ने अंतिम वक्तव्य में जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने की हिमायत को नहीं रोका। कुछ वर्ष पहले इस वक्तव्य पर वैश्विक सहमति कायम करना असंभव नजर आता। यह बात ध्यान देने लायक है कि दो वर्ष पहले ग्लास्गो में आयोजित कॉप के पहले तक जीवाश्म ईंधन का अंतिम मसौदे में जिक्र तक नहीं होता था।

कॉप28 में अंतिम समय में भी इस बदलाव के वादे को लेकर काफी तमाशा हुआ। सऊदी अरब और इराक के प्रतिनिधियों ने अंतिम समय तक मामला लटकाए रखा। रॉयटर्स ने तो यह तक लिख दिया कि पेट्रोलियम निर्यातक देशों के समूह ओपेक के महासचिव कुवैत के हैथम अल घैस ने संगठन के सदस्यों को पत्र लिखकर कहा कि वे कॉप 28 में जीवाश्म ईंधन को लेकर होने वाले किसी भी समझौते का विरोध करें। एक ऐसी कॉप में जहां अमेरिका ने वित्तीय मामले में झुकने से इनकार कर दिया और अन्य देशों ने जीवाश्म ईंधन से कोयले तक अपनी अहम चिंताओं को तरजीह देना जारी रखा, यह बात ध्यान देने लायक है कि तेल निर्यातकों ने ही रियायत बरती।

विकासशील देशों की बात करें तो कोयला या तेल जैसे क्षेत्रों को निशाना बनाना ऐतिहासिक रूप से गलत रहा है। आंशिक तौर पर ऐसा इसलिए कि उन्हें लगता है कि इससे समग्र उत्सर्जन से ध्यान कुछ हद तक हट जाता है जबकि विकसित देशों में ऐसा उत्सर्जन अधिक होता है। इसकी आंशिक वजह यह है कि वे ऊर्जा सुरक्षा और स्थिर बदलाव को प्राथमिकता देते हैं। अब इस रेखा का उल्लंघन हो चुका है। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि विरासती कंपनियों और क्षेत्रों की भागीदारी ने ऊर्जा बदलाव की स्थिति में राहत प्रदान की है? अगले वर्ष कॉप का आयोजन अजरबैजान के बाकू शहर में होना है जो तेल और गैस निर्यात पर बहुत हद तक निर्भर है। ऐसे में इसका और कड़ा परीक्षण होगा।

संयुक्त अरब अमीरात कम से कम कॉप के विभिन्न धड़ों के बीच संतुलनकारी भूमिका में नजर आया। क्या अजरबैजान (जो अन्य तेल एवं गैस निर्यातकों की तुलना में रूस के करीब है) भी इतनी सावधानी बरतेगा? अगले वर्ष समझौते का विस्तार होता है या नहीं तथा निजी निवेश के संदर्भ में कोई वास्तविक पहल होती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जीवाश्म ईंधन युग के प्रतिभागियों को कितनी गुंजाइश दी जाती है और क्या वे सकारात्मक रुख के लिए तैयार होते हैं?

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First Published - December 25, 2023 | 2:42 PM IST

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