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GPS टोल प्रणाली में अपना लाभ देख रहीं बीमा कंपनियां

वास्तविक लोकेशन के आधार पर दावों का निपटान करने में होगी आसानी, लेकिन नियम स्पष्ट नहीं होने से ऊहापोह

Last Updated- June 30, 2024 | 11:05 PM IST
GPS टोल प्रणाली में अपना लाभ देख रहीं बीमा कंपनियां, Insurance companies are seeing their profit in GPS toll system

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की सैटेलाइट आधारित टोल संग्रह व्यवस्था लागू होने से न केवल सड़कों से टोल बूथ और जाम खत्म हो जाएगा, बल्कि बीमा कंपनियां भी इसमें अपना काफी फायदा देख रही हैं। बीमा कंपनियों के अनुसार वे मोटर वाहन बीमा को वास्तविक लोकेशन डेटा के अनुकूल कर बीमा मामलों को देखेंगी।

बीते मंगलवार को एनएचएआई ने ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) पर एक कार्यशाला का आयोजन किया। इसके लिए इस महीने के शुरू में ही निविदाएं जारी की गई थीं। कार्यशाला के आयोजन से पहले विचार-विमर्श के दौरान यह बात उभर कर आई कि प्राधिकरण सभी वाहनों में 24/7 यानी चौबीसों घंटे लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस-ऑन बोर्ड यूनिट (ओबीयू) लगाना अनिवार्य करने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन की योजना बना रहा है।

यह ओबीयू लगातार फास्टैग पेमेंट सिस्टम से जोड़ी जाएगी, ताकि बिना बूथ वाले टोल से गुजरने पर स्वत: ही टोल कट जाए। यह यूनिट हर पांच सेकंड में गाड़ी की लोकेशन संबंधी डेटा एकत्र करेगी और प्रत्येक 60 सेकंड में इसे प्रसारित भी करेगी।

मुद्रीकरण का रास्ता

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय सचिव अनुराग जैन ने कहा कि उपभोक्ताओं के लोकेशन डेटा का भी अंतत: मुद्रीकरण किया जा सकता है। बीमा कंपनियों का कहना है कि मोटर बीमा की कीमत मुख्य रूप से परिसंपत्तियों के आधार पर तय की जाती है। इसकी कीमत आमतौर पर कार के मेक और मॉडल पर आधारित होती है। दावों की आवृत्ति भले ही अलग-अलग हो, लेकिन इन पर प्रीमियम एक समान वसूला जाता है।

आईसीआईसीआई लोम्बार्ड में बिजनेस हेड (मोटर इंश्योरेंस) रोहित डागा ने जीएनएसएस पर आयोजित एनएचएआई की कार्यशाला में कहा, ‘जीएनएसएस बीमा उद्योग में व्यापक बदलाव ला सकता है। फिलहाल बहुत तरह के परोक्ष तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।

उदाहरण के लिए हम ग्राहक से अपने ओडोमीटर का फोटो देने के लिए कहते हैं और उसके बाद यह तय करते हैं कि गाड़ी कितने किलोमीटर चली है। सर्विस रिकॉर्ड बुक के आधार पर भी डेटा जुटाया जाता है। कई विनिर्माता कारों में ही इसे लगा रहे हैं। इससे बहुत आसानी से जानकारी एकत्र की जा सकती है।’

उन्होंने कहा, ‘हालांकि ऐसे उत्पाद अभी बहुत कम कारों में लगे हैं, लेकिन इसकी उपयोगिता यह है कि इनसे यह जानने में मदद मिलती है कि एक चालक किस क्षेत्र में गाड़ी चला रहा है और गाड़ी कितने किलोमीटर चल रही है। दावों की आवृत्ति और दुर्घटना अनुपात मार्ग के आधार पर तय हो सकता है। इसके आधार पर बहुत सूक्ष्म डेटा भी जुटाया जा सकता है और परिसंपत्ति आधारित कीमत के बजाय चालक के व्यवहार के आधार पर शुल्क वसूली की जा सकती है।’

इसी कार्यशाला में अपनी बात रखते हुए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस में मुख्य तकनीकी और दावा अधिकारी उदयन जोशी ने कहा कि यह प्रणाली जिंदगियां बचाने में खासी मददगार साबित हो सकती है, क्योंकि दुर्घटना के समय लोकेशन का आसानी से पता लगाया जा सकता है और गोल्डन आवर यानी दुर्घटना के बाद 60 मिनट के अंदर ही जरूरी चिकित्सीय सहायता पहुंचाई जा सकती है। जिन वाहनों का बीमा नहीं होता, उनसे उद्योग के साथ-साथ अर्थव्यवस्था भी त्रस्त है।

सही लोकेशन मिलने से वाहन की पहचान करने में आसानी होती है और इससे वाहन मालिक को बीमा प्रणाली से जोड़ने में मदद मिल सकती है। जितने ज्यादा लोग बीमा प्रणाली में शामिल होंगे, देश में प्रत्येक गाड़ी मालिक के लिए बीमा प्रीमियम उतना की कम होगा।’

संभावित गति में उछाल : डेटा गोपनीयता

विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा पर स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं होने के कारण वाहन मालिक और उपयोगकर्ता की गोपनीयता भंग होने की आशंका रहती है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन में एसोसिएट्स पॉलिसी वकील दिशा वर्मा कहती हैं कि कार संचालक अथवा निर्माता द्वारा कार का जीपीएस जैसा कोई भी डेटा मंत्रालय को आसानी से दिया जा सकता है।

इसके बाद मंत्रालय इसे खरीद भी सकता है अथवा इसका दूसरे तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। ऐसा होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ये सब प्लेटफॉर्म लॉन्च होने से पहले ही चल रहा है। इसके लिए अभी डेटा नीति भी नहीं बनी है।

इस मौके पर एनएचएआई अध्यक्ष संतोष यादव ने कहा कि प्राधिकरण गोपनीयता को लेकर उठ रहे मुद्दे से वाकिफ है। इस पहलू से निपटने के लिए मंत्रालय गंभीरता से विचार-विमर्श कर रहा है। टेलीमेटिक्स इंश्योरेंस पर चर्चा पत्र में भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के गैर-जीवन विभाग ने गोपनीयता के मुद्दे पर पहले ही आगाह किया था।

आईआरडीएआई ने कहा, ‘जब कोई बीमा धारक एक कंपनी से दूसरी में जाता है तो डेटा को लेकर मुद्दा खड़ा हो सकता है। नई कंपनी पूर्व के डेटा को लेने से इनकार कर सकती है। डेटा गोपनीयता को लेकर भी समस्या आ सकती है। बड़ा मुद्दा यह भी सामने आ सकता है कि कौन-सा डेटा साझा किया जा सकता है और कौन-सा नहीं। टेलीमैटिक्स को लागू करने में लागत भी आएगी। यह लागत गाड़ी की कीमतों में ही जोड़ी जा सकती है।’

First Published - June 30, 2024 | 11:05 PM IST

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