शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग इस उलझन में रहते हैं कि SIP कब शुरू की जाए। आम धारणा यह है कि अगर बाजार ऊंचाई पर है तो निवेश नहीं करना चाहिए और गिरावट आने के बाद ही SIP शुरू करनी चाहिए। लेकिन DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट और Nifty 500 Index के 7 साल के SIP आंकड़े इस सोच को गलत साबित करते हैं।
आंकड़ों के अनुसार, चाहे SIP ऑल-टाइम हाई पर शुरू की गई हो, बाजार के 20% चढ़ने के बाद या 20% गिरने के बाद- लंबे समय में रिटर्न में बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखता। 7 साल की अवधि में SIP रिटर्न लगभग 12% से 14% के दायरे में ही रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे निवेश की अवधि बढ़ती है, वैसे-वैसे एंट्री टाइमिंग का असर कम होता चला जाता है। असल फर्क पड़ता है नियमित निवेश और लंबे समय तक बाजार में बने रहने से।
| SIP शुरू करने की स्थिति | 7 साल का औसत (Median) रिटर्न |
|---|---|
| जब इंडेक्स ऑल-टाइम हाई पर था | 13% |
| जब इंडेक्स पिछले 1 साल में 20% या ज्यादा चढ़ चुका था | 14% |
| जब इंडेक्स पिछले 1 साल में 20% या ज्यादा गिर चुका था | 12% |
| स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट | |
| कैटेगरी | लंबी अवधि का रिटर्न (2007 से 2025) |
|---|---|
| लो बीटा | 18.2% |
| हाई बीटा | 13.6% |
| स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट | |
शेयर बाजार में यह मान्यता भी काफी प्रचलित है कि ज्यादा जोखिम उठाने से ज्यादा रिटर्न मिलता है। हाई बीटा और हाई वोलैटिलिटी वाले शेयरों को अक्सर बेहतर कमाई का जरिया माना जाता है। हालांकि DSP के विश्लेषण से सामने आया है कि कम जोखिम वाले पोर्टफोलियो ने लंबे समय में न सिर्फ ज्यादा स्थिर बल्कि कई बार बेहतर रिटर्न भी दिए हैं।
| कैटेगरी | लंबी अवधि का रिटर्न (2007 से 2025) |
|---|---|
| लो वोलैटिलिटी | 16.5% |
| हाई वोलैटिलिटी | 13.3% |
| स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट | |
कम बीटा और कम वोलैटिलिटी वाले निवेशों ने बाजार की गिरावट के दौरान कम नुकसान उठाया, जिससे उनकी कंपाउंडिंग बेहतर बनी रही। इसके उलट, ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले निवेश तेजी के दौर में भले ही अच्छा प्रदर्शन करें, लेकिन गिरावट के समय भारी नुकसान उनके लंबे समय के रिटर्न को कमजोर कर देता है। यही वजह है कि लंबी अवधि के निवेश में जोखिम को नियंत्रित करना उतना ही जरूरी है जितना मुनाफा कमाना।
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| समय / साइकल (लगभग) | Large Cap (LC) | Mid Cap (MC) | Small Cap (SC) |
|---|---|---|---|
| तेजी का दौर (2003–07) | 49% | 62% | 100% |
| गिरावट के बाद (2008–09) | 21% | 20% | 24% |
| अगली तेजी (2009–11) | 26% | 31% | 37% |
| स्थिर दौर (2013–15) | 19% | 18% | 19% |
| तेज़ी (2016–18) | 17% | 22% | 23% |
| मंदी (2018–20) | 14% | 15% | 15% |
| हालिया साइकल (2020–23) | 16% | 19% | 19% |
| स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट | |||
तेजी के बाजार में स्मॉल और मिडकैप शेयरों की शानदार तेजी निवेशकों को आकर्षित करती है और ऐसा लगता है कि ये शेयर हमेशा लार्जकैप से बेहतर रिटर्न देंगे। लेकिन इतिहास बताता है कि हर मार्केट साइकिल में यह बढ़त स्थायी नहीं रहती। BSE के लंबे समय के आंकड़े दिखाते हैं कि जैसे ही बाजार में मंदी आती है, स्मॉल और मिडकैप शेयर अपनी पूरी अतिरिक्त बढ़त खो देते हैं और लार्जकैप के मुकाबले ज्यादा गिरावट झेलते हैं।
| इंडेक्स | सबसे ज्यादा Alpha | सबसे कम Alpha |
|---|---|---|
| BSE Midcap | +24% | -25% |
| BSE Smallcap | +24% | -20% |
| स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट | ||
उनकी ज्यादा वोलैटिलिटी के कारण गिरावट के समय नुकसान भी ज्यादा होता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि स्मॉल और मिडकैप में निवेश तभी फायदेमंद होता है जब उनकी अल्फा बन रही हो। अल्फा (Alpha) का मतलब होता है कि कोई शेयर या कैटेगरी (जैसे स्मॉल या मिडकैप) बाजार के बड़े इंडेक्स या लार्जकैप शेयरों से ज्यादा रिटर्न दे रही है। जब यह बढ़त खत्म हो जाए, तो लार्जकैप शेयरों की ओर झुकाव निवेशकों के लिए ज्यादा सुरक्षित विकल्प साबित हो सकता है।