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अमेरिकी टैरिफ का असर बेअसर: लखनऊ के चिकन परिधान का एशियाई बाजारों में जलवा, अफ्रीका में भी बढ़ा निर्यात

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लखनऊ का चिकनकारी उद्योग अमेरिकी शुल्क से प्रभावित नहीं है, बल्कि खाड़ी, अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देशों में बढ़ती मांग से निर्यात और कारोबार तेजी से विस्तार कर रहा है।

Last Updated- August 31, 2025 | 9:59 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ट्रंप के शुल्क से चमड़ा और दूसरे धंधे बेशक झटका खा रहे हों मगर लखनऊ के चिकन कपड़ों का कारोबार इससे अछूता दिख रहा है। इसकी बड़ी वजह है कि इसके निर्यात में अमेरिका की 1 फीसदी हिस्सेदारी भी नहीं है। इसलिए चिकन कारोबारी खाड़ी, अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देशों में अपना सामान और भी आक्रामक तरीके से भेजने की तैयारी में जुट गए हैं।

राजधानी लखनऊ के चिकन कारोबारी एक तरह से बेफिक्र बैठे हैं। उनका कहना है कि पहले ही अमेरिका में चिकन परिधान नहीं के बराबर जाते थे, शुल्क लगने पर बिल्कुल नहीं जाएंगे तो भी उनके धंधे पर रत्ती भर असर नहीं पड़ेगा। चिकन के कपड़ों का सबसे बड़ा निर्यात बाजार खाड़ी देशों में है, जहां इसकी मांग बदस्तूर कायम है। पिछले कुछ साल में यूरोप और अफ्रीका के देशों से भी चिकन की मांग आने लगी है। बहरहाल लखनऊ में बनने वाले चिकन के कपड़ों का बड़ा हिस्सा देसी बाजार में ही खप जाता है। मगर पिछले कुछ साल में इस कारोबार में उतरी नई पीढ़ी ने निर्यात पर जोर बढ़ाया है। यही वजह है कि 2024-25 में करीब 3,000 करोड़ रुपये के चिकन परिधान विदेश भेज दिए गए। मगर अमेरिका इसमें कहीं नहीं है।

लखनऊ चिकन हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के अजय खन्ना बताते हैं कि पिछले तीन साल में अमेरिकी बाजारों में 20-25 करोड़ रुपये सालाना का ही माल जाता है, जो कुल निर्यात को देखते हुए नगण्य ही है। खन्ना के मुताबिक अमेरिका में कुछ इंडियन स्टोर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ही लखनवी चिकन के कपडे मंगाते हैं। मगर इसकी बड़ी वजह अमेरिका का मौसम है, जिसमें लखनवी चिकन के कपड़े बहुत राहत देते हैं। अब शुल्क लगने से माल बेशक महंगा हो जाए मगर अमेरिका में चिकन पहनने के शौकीनों के पास लखनऊ के अलावा कोई विकल्प ही नहीं क्योंकि चमड़ा, कालीन और रेडीमेड कपड़ों में तो कई देश होड़ में हैं मगर जैसा चिकन लखनऊ और आसपास बनता है वैसा दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकता। यही वजह है कि माल महंगा होने पर भी वहां के ग्राहक लखनऊ से ही माल मंगाते रहेंगे।

इस बीच खाड़ी देशों और अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा दक्षिण एशियाई देशों तक में चिकन का निर्यात लगातार बढ़ रहा है। खन्ना ने बताया कि कोरोना महामारी के समय ही कारोबारियों ने नए बाजार तैयार करने शुरू कर दिए थे। अब तो रूस, मेक्सिको, ब्राजील जैसे कई देशों से व्यापार हो रहा है और ऑर्डर आ रहे हैं। इसलिए अमेरिका के शुल्क से 5-6 करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा चोट कारोबार को नहीं लगेगी।

चिकन व जरदोजी का कारखाना चलाने वाले नादिर खान दूसरा पहलू दिखाते हैं। वह कहते हैं कि भारी शुल्क लगने से रेडीमेड कपड़े बनाने और निर्यात करने वाली कई भारतीय कंपनियों के धंधे पर असर पड़ेगा। इसका फायदा भी चिकन उद्योग को मिल सकता है। नादिर कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में नोएडा के रेडीमेड परिधान का उद्योग तो इस शुल्क के कारण पूरी तरह चौपट होता दिख रहा है। यदि वहां काम ठप हो जाता है तो उसका बाजार भी लखनवी चिकन को मिल सकता है।

कारोबारी मानते हैं कि कीमत काफी कम होने के कारण चिकन के कपड़े भी नए निर्यात बाजारों में ज्यादा आसानी से बिक सकते हैं, जिससे व्यापार के नए अवसर खुलेंगे। साथ ही चिकन परिधानों में गुणवत्ता की समस्या ज्यादा नहीं होती है। इसीलिए ऑर्डर पूरे करने में भी कोई समस्या नहीं आती है। खान कहते हैं कि देश के भीतर चिकनकारी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है और इसकी सस्ती नकल चीन से भी नहीं आ सकती। इसलिए  चिकनकारी उद्योग के सामने अमेरिकी शुल्क या दूसरे देशों से होड़ का कोई खतरा नहीं है।

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First Published - August 31, 2025 | 9:58 PM IST

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