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अचल संपत्ति बेचना ‘सेवा’ नहीं, यह सर्विस टैक्स के दायरे से बाहर: सुप्रीम कोर्ट 

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राजस्व विभाग ने सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपील न्यायाधिकरण के 2019 के उस आदेश का विरोध किया था, जिसमें 10 करोड़ रुपये से अधिक की कर मांग को रद्द कर दिया गया था।

Last Updated- November 12, 2025 | 8:44 AM IST
Supreme Court

उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि अचल संपत्ति की बिक्री अपने आप में वित्त अधिनियम, 1994 के तहत ‘सेवा’ नहीं है। इसलिए यह सेवा कर के दायरे से बाहर है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और संदीप मेहता के पीठ ने इलाहाबाद की एक साझेदार फर्म मेसर्स एलीगेंट डेवलपर्स के खिलाफ नई दिल्ली के सेवा कर आयुक्त द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

राजस्व विभाग ने सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपील न्यायाधिकरण के 2019 के उस आदेश का विरोध किया था, जिसमें 10 करोड़ रुपये से अधिक की कर मांग को रद्द कर दिया गया था। विभाग ने आरोप लगाया था कि एलीगेंट डेवलपर्स ने सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड को कई राज्यों में भूमि की खरीद और विकास के संबंध में कर योग्य ‘रियल एस्टेट एजेंट’ सेवाएं प्रदान की थीं। लेकिन फर्म ने कहा कि उसने सलाहकार या ब्रोकरेज की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वह सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन के साथ भूमि की सीधी बिक्री और हस्तांतरण में शामिल थी।

वर्ष 2002 और 2005 के बीच उन्होंने राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में भूमि खरीदने के लिए तीन समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए थे। इनके तहत, एलीगेंट डेवलपर्स ने मूल्य भिन्नता से जुड़े सभी वित्तीय जोखिमों को वहन करते हुए एक निश्चित प्रति-एकड़ दर पर सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन के लिए भूमि की पहचान, समेकन और हस्तांतरण करने का बीड़ा उठाया।

मामले की जांच के बाद केंद्रीय उत्पाद शुल्क खुफिया महानिदेशालय ने कारण बताओ नोटिस जारी कर 10.28 करोड़ रुपये के सेवा कर की मांग की, जिसमें तथ्यों को दबाने का आरोप लगाया गया और फर्म को ‘रियल एस्टेट एजेंट’ के रूप में वर्गीकृत किया गया। आयुक्त ने 2013 में मांग की पुष्टि की, लेकिन सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण ने बाद में लेनदेन को भूमि की साधारण बिक्री से संबंधित मानते हुए इस आदेश को पलट दिया।

ट्रिब्यूनल के तर्क को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वित्त अधिनियम की धारा 65 (88), 65 (89) और 65B (44) के तहत संविदात्मक शर्तों और वैधानिक परिभाषाओं की जांच की। पीठ ने पाया कि फर्म ने अपने खाते पर काम किया था, वाणिज्यिक जोखिम उठाया था और पंजीकृत बिक्री विलेखों को निष्पादित कर स्वामित्व हस्तांतरित किया था – ये गतिविधियां स्पष्ट रूप से ‘सेवा’ की परिभाषा से बाहर रखी गई हैं।

अदालत ने कहा, ‘ये लेनदेन सेवा शुल्क, कमीशन, एजेंसी या कंसल्टेंसी के लिए नहीं किए गए थे, बल्कि भूमि की बिक्री के साधारण और सरल लेनदेन से संबंधित थे, जो ‘सेवा’ के दायरे में नहीं आते।’ पीठ ने विभाग द्वारा विस्तारित सीमा अवधि को लागू करने के प्रयास को भी खारिज कर दिया, जिसमें धोखाधड़ी या जानबूझकर तथ्यों को दबाने का कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने दोहराया कि कर का भुगतान न करना, कर चोरी के इरादे के अभाव में, वित्त अधिनियम की धारा 73 (1) के तहत विस्तारित वसूली अवधि को उचित नहीं ठहराता है।

अपील न्यायाधिकरण के निष्कर्ष को सही मानते हुए शीर्ष न्यायालय ने माना कि भूमि में स्वामित्व के हस्तांतरण की राशि वाले लेनदेन सेवा कर के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं। इसी के साथ अपील को खारिज कर दिया गया। विशेषज्ञों ने फैसले के बाद कहा कि रियल एस्टेट खिलाड़ी और लैंड-बैंकिंग इकाइयां पुराने सेवा-कर विवादों के बारे में आसानी से सांस ले सकती हैं।

कानून फर्म ऋषभ गांधी ऐंड एडवोकेट्स के संस्थापक ऋषभ गांधी ने कहा, ‘यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि यदि कोई लेनदेन बिक्री की तरह होता है, तो उस पर सेवा के रूप में कर नहीं लगाया जा सकता है।

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First Published - November 12, 2025 | 8:44 AM IST

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