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नई जीडीपी सीरीज में बड़ा बदलाव, अब बदलेगी विकास दर की तस्वीर

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नई जीडीपी सीरीज में महंगाई समायोजन की पद्धति में बड़े बदलाव से विकास दर के आंकड़े अधिक सटीक और विश्वसनीय होंगे।

Last Updated- February 21, 2026 | 11:26 AM IST
GDP
Representative Image

देश की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) की नई सीरीज अगले सप्ताह जारी होने वाली है। इससे पहले सांख्यिकी मंत्रालय ने राष्ट्रीय आय के आकलन को अधिक सटीक, स्थिर और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में अहम बदलावों का संकेत दिया है। खास तौर पर महंगाई के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों को स्थिर कीमतों में बदलने की प्रक्रिया में बड़े सुधार प्रस्तावित हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की नई रिपोर्ट के अनुसार, उपभोग, निवेश और बाहरी व्यापार के आंकड़ों को स्थिर कीमतों में बदलने की मौजूदा पद्धति में व्यापक संशोधन किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जीडीपी के वास्तविक आंकड़े अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को अधिक वास्तविक रूप में दर्शाएं।

उपभोग व्यय की गणना में बदलाव

अब तक निजी अंतिम उपभोग व्यय यानी पीएफसीई को स्थिर कीमतों में बदलने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक का मिश्रित उपयोग किया जाता रहा है। नई प्रणाली में इस व्यापक मिश्रण से हटकर वस्तु-विशिष्ट उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों का उपयोग किया जाएगा, जहां तक संभव हो।

जहां किसी विशेष वस्तु या सेवा का अलग मूल्य सूचकांक उपलब्ध नहीं होगा, वहां ही अनुमानित मूल्य सूचकांक यानी इम्प्लिसिट प्राइस डिफ्लेटर का सहारा लिया जाएगा। इससे उपभोग के आंकड़े अधिक यथार्थवादी माने जा रहे हैं।

निवेश आकलन में संपत्ति आधारित तरीका

सकल स्थिर पूंजी निर्माण यानी जीएफसीएफ के मामले में अब एक समग्र थोक मूल्य सूचकांक पर निर्भरता कम की जाएगी। इसके स्थान पर संपत्ति-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।

मशीनरी, परिवहन उपकरण और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी से जुड़े उत्पादों के लिए संबंधित विशिष्ट थोक मूल्य सूचकांकों का उपयोग होगा।

अनुसंधान और विकास खर्च को औद्योगिक श्रमिकों और शहरी क्षेत्रों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के भारित औसत से समायोजित किया जाएगा। सॉफ्टवेयर और डेटाबेस के लिए शहरी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को आधार बनाया जाएगा। खनिज अन्वेषण के लिए सामान्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और बौद्धिक संपदा से जुड़े अन्य उत्पादों के लिए उपयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों का इस्तेमाल होगा।

निर्माण क्षेत्र के लिए अलग संकेतक

आवास, अन्य भवन और संरचनाओं के लिए कोई साफ-सुथरा मूल्य सूचकांक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में स्थिर कीमतों पर निर्माण क्षेत्र के सकल उत्पादन की वृद्धि दर को मात्रा संकेतक के रूप में अपनाने की सिफारिश की गई है।

भंडार में परिवर्तन के लिए उद्योग-वार थोक मूल्य सूचकांक या इम्प्लिसिट डिफ्लेटर का उपयोग जारी रहेगा। वहीं सोना और चांदी जैसे कीमती सामानों को अब थोक कीमतों के बजाय आभूषणों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर समायोजित किया जाएगा, ताकि खुदरा स्तर की वास्तविक कीमतों का बेहतर प्रतिबिंब मिल सके।

आयात और निर्यात के आंकड़ों की गणना में बदलाव

विदेशी व्यापार के आंकड़ों को भी अधिक विस्तृत तरीके से समायोजित किया जाएगा। वस्तुओं और सेवाओं के आयात तथा निर्यात के लिए जहां प्रत्यक्ष मूल्य या मात्रा संकेतक उपलब्ध नहीं होंगे, वहां उपयुक्त यूनिट वैल्यू इंडेक्स का उपयोग किया जाएगा। साथ ही, तिमाही और वार्षिक आकलनों में बेहतर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास होगा।

उत्पादन पक्ष में भी बड़े सुधार

केवल व्यय पक्ष ही नहीं, उत्पादन पक्ष में भी व्यापक बदलाव प्रस्तावित हैं। कई क्षेत्रों में एकल अपस्फीति पद्धति से हटकर मात्रा आधारित आकलन और चयनित क्षेत्रों में दोहरे अपस्फीति मॉडल को अपनाने की सिफारिश की गई है।

वन और मत्स्य क्षेत्र में अब राज्य-वार भौतिक उत्पादन सूचकांक का उपयोग होगा, ताकि वास्तविक सकल मूल्य वर्धन का आकलन उत्पादन की मात्रा के अनुरूप हो सके।

खनन क्षेत्र में थोक मूल्य सूचकांक आधारित पद्धति छोड़कर भारतीय खान ब्यूरो और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़ों के आधार पर मात्रा आधारित आकलन किया जाएगा। इससे आंकड़ों में उतार-चढ़ाव कम होने और वार्षिक तथा तिमाही अनुमानों में तालमेल बढ़ने की उम्मीद है।

विनिर्माण क्षेत्र में दोहरी अपस्फीति

विनिर्माण क्षेत्र में सबसे व्यापक सुधार देखने को मिल सकते हैं। यहां बड़ी संख्या में श्रेणियों के लिए आउटपुट और मध्यवर्ती खपत को अलग-अलग मूल्य सूचकांकों से समायोजित किया जाएगा। इसके लिए वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण के इनपुट बास्केट और वस्तु-विशिष्ट थोक मूल्य सूचकांकों का उपयोग होगा।

जिन श्रेणियों में इनपुट कीमतों का पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है, वहां संशोधित एकल अनुमान पद्धति जारी रहेगी।

क्यों जरूरी हैं ये बदलाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुधारों से जीडीपी के स्थिर कीमतों पर अनुमान अधिक भरोसेमंद होंगे। इससे महंगाई के प्रभाव को बेहतर तरीके से अलग किया जा सकेगा और वास्तविक आर्थिक वृद्धि की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।

नई श्रृंखला के साथ भारत की राष्ट्रीय आय गणना प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अधिक करीब लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे नीति निर्माण और विश्लेषण दोनों को मजबूत आधार मिल सके।

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First Published - February 21, 2026 | 11:19 AM IST

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