भारतीय समर्पित माल गलियारा निगम लिमिटेड (डीएफसीसीआईएल) और सरकार नियंत्रित भारतीय रेल वित्त निगम (आईआरएफसी) ने विश्व बैंक से डॉलर में लिए गए करीब 10,000 करोड़ रुपये का ऋण चुकाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। रेल माल ढुलाई गलियारों के लिए डीएफसीसीआईएल विशेष उद्देश्य इकाई (एसपीवी) है।
डीएफसीसीआईएल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, ‘वित्त मंत्रालय, रेल मंत्रालय, डीएफसीसीआईएल, आईआरएफसी और विश्व बैंक के साथ हुई इस तरह की पहली पुनर्वित्त व्यवस्था से भारत सरकार को 2,700 करोड़ रुपये बचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।’
डीएफसीसीआईएल के अनुसार, यह कदम ‘एक ऐतिहासिक शुरुआत और आत्मनिर्भर भारत की ओर एक निर्णायक कदम है।’ यह ऋण विश्व बैंक से 51,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार 1,337 किलोमीटर लंबे पूर्वी समर्पित माल गलियारा (डीएफसी) के लिए लिया गया था। यह गलियारा पंजाब से बिहार तक जाता है जो कोयला और प्रमुख औद्योगिक कच्चे माल के लिए प्रमुख माल केंद्रों को एक दूसरे से जोड़ता है।
गर्मी के मौसम में भारतीय रेल पर कोयला परिवहन का बोझ कम करने में यह गलियारा काफी सहायक साबित हुआ है। इस दौरान बिजली की मांग चरम पर होती है और ताप विद्युत संयंत्रों तक कोयला भंडार पहुंचाया जाता है और इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाता है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने मार्च में खबर दी थी कि आईआरएफसी मुद्रा में अस्थिरता के कारण विभिन्न पक्षों से डॉलर में लिए ऋण लौटाने के लिए बातचीत कर रहा है। मुद्रा विनिमय में उतार-चढ़ाव के बीच पिछले कुछ समय से रुपये पर दबाव काफी बढ़ गया है।
पूर्वी और पश्चिमी डीएफसी (उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र को जोड़ने वाला 72,000 करोड़ रुपये की लागत से बना गलियारा) दोनों बहुपक्षीय ऋण लेकर तैयार किए गए थे। भारतीय रेल के अनुसार इनमें पूर्वी और पश्चिमी गलियारों के लिए क्रमशः विश्व बैंक (14,900 करोड़ रुपये) और जापान इंटरनैशनल कोऑपरेशन एजेंसी (38,722 करोड़ रुपये) से लिए ऋण शामिल हैं। शेष रकम का प्रावधान बजट सहायता के जरिये किया गया था।
मंत्रालय ने पिछले सप्ताह पेश रेलवे पर रिपोर्ट में संसदीय स्थायी समिति को बताया, ‘पूर्वी डीएफसी के लिए ऋण अवधि 22 साल है जिसमें विश्व बैंक को 7 साल तक कर्ज भुगतान पर अस्थायी रोक भी शामिल है। पश्चिमी डीएफसी के लिए दस वर्षों की अस्थायी रोक के बाद ऋण की अवधि में वित्त मंत्रालय को 7 प्रतिशत की दर से ब्याज का भुगतान किया जाएगा।’
ईवाई इंडिया में पार्टनर कुलजीत सिंह ने कहा कि ऐसे कई कारण हैं जिनसे सरकारें बहुपक्षीय ऋणों को चुकाने का विकल्प चुन सकती हैं। सिंह ने कहा,‘मुख्य रूप से सरकार बहुपक्षीय ऋण की सीमाओं को मुक्त करना चाहती है ताकि इसे सीमित व्यवहार्यता वाली अन्य परियोजनाओं के लिए आवंटित किया जा सके क्योंकि बहुपक्षीय संस्थानों से आम तौर पर अंतिम विकल्प के तौर पर ऋण लिए जाते हैं। इसके अलावा, परियोजनाओं को मुद्रा में उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रखने और संभावित लागत कम रखने के लिए भी सरकार ऐसा करती है।’