टाइगर ग्लोबल कर मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले से भारत में निवेश करने वाले अन्य निवेशक भी जोखिम में आ सकते हैं। कर विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के लिए जोखिम गणना में काफी बदलाव आ गया है। इस फैसले से कर अधिकारियों को निवेश से बाहर निकलने के वक्त ढांचे के दुरुपयोग की जांच शुरू करने का अधिकार मिल गया है, भले ही 1 अप्रैल, 2017 के पहले निवेश किया गया हो।
हालांकि अदालत ने भारत और मॉरीशस के बीच कर संधि के ‘ग्रैंडफादरिंग’ प्रावधानों को रद्द नहीं किया है, लेकिन कर विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला प्रभावी सुरक्षा को काफी कम कर देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय ने साफ किया है कि संधि के लाभों का दावा मशीनी रूप से नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके कारोबारी मायने होने चाहिए।
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंडों पर पड़ने की संभावना है, जिन्होंने 2017 के पहले का भारत में निवेश बरकरार रखा है, या जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल्स (गार) लागू होने के बाद इस तरह के निवेश से बाहर निकल गए हैं।
इस विवाद को व्यापक नीतिगत और संवैधानिक संदर्भ के रूप में देखते हुए न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने चेतावनी दी कि कर संधियों को किसी भी दुरुपयोग से बचाव को देखते हुए लागू किया जाना चाहिए और इसकी व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती है कि इससे सरकार की कर लगाने की संप्रभु शक्ति खत्म हो जाए। उन्होंने पाया कि कर लगाने और एकत्र करने की शक्ति संप्रभुता का एक अंतर्निहित गुण है। यह केवल संवैधानिक सीमाओं और उस सीमा तक सीमित है, जब एक देश अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत उस शक्ति को प्रतिबंधित करने के लिए जानबूझकर सहमत होता है।
उन्होंने कहा कि कर समझौते आर्थिक सहयोग के लिए होते हैं, जिससे दोहरे कराधान से बचा जा सके और यह दोहरे गैर कराधान को सुविधाजनक बनाने के लिए नहीं है।
इस फैसले में प्रकाश डाला गया कि कैसे भारत-मॉरीशस संधि का अनुभव संधि के प्रावधानों के दुरुपयोग के जोखिमों को दर्शाता है, जिनकी मूल रूप से अनुबंध करने वाले राज्यों ने कल्पना भी नहीं की थी।
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने जोर देकर कहा कि विकसित हो रहे वैश्विक निवेश ढांचों और तेजी से बदलती सीमा पार व्यवस्थाओं पर विधानमंडलों को लगातार परिष्कृत करने की जरूरत है, जिससे कि कर चोरी के नए तरीकों का मुकाबला किया जा सके।
इस फैसले को देखते हुए सलाहकारों का कहना है कि इससे विदेशी निवेशकों के लिए व्यावहारिक दायरा सख्त हुआ है।
ट्राईलीगल के अरिजित घोष ने कहा कि 1 अप्रैल, 2017 से पहले पूरे गए सौदे इसके दायरे में नहीं आएंगे।
उन्होंने कहा, ‘1 अप्रैल, 2017 से पहले निवेश से बाहर निकलने को बिना संशोधन वाली भारत मॉरीशस संधि द्वारा शासित किया जाना जारी रहना चाहिए, और अनुच्छेद 13 के तहत पूंजीगत लाभ पर कर न देने की पात्रता का लाभ बरकरार है।’ उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में ऐसे मामलों को फिर से खोलने के लिए समय सीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है।
हालांकि अगर 1 अप्रैल, 2017 के बाद धन निकाला गया है तो ऐसी स्थिति में बदलाव आया है, भले ही निवेश गार के पहले का हो।
घोष ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने नियम 10यू(2) की व्याख्या गार को 1 अप्रैल, 2017 के बाद उत्पन्न होने वाले कर लाभों पर लागू करने की अनुमति देने के लिए की है, भले ही संरचना पहले रखी गई हो। इसकी वजह से 2017 के बाद निवेश से निकलने के मामले में नियम के दुरुपयोग की जांच हो सकती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस फैसले ने निवेश और अरेंजमेंट के बीच अंतर साफ कर दिया है। सीएमएस इंडस लॉ के लोकेश शाह ने कहा कि ग्रैंडफादरिंग केवल वास्तविक निवेश पर लागू होगा।
डीएमडी एडवोकेट्स के तुषार जरवाल ने कहा कि यह फैसला वोडाफोन युग से एक स्पष्ट प्रस्थान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ताजा फैसला स्वीकार करता है कि वोडाफोन के बाद विधायी परिदृश्य बदल गया है। शार्दूल अमरचंद मंगलदास की गौरी पुरी ने कहा कि 31 मार्च, 2017 से पहले के निवेशों पर गार को लेकर मुकदमेबाजी बढ़ने की संभावना है।