प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
सोचिए, आपके शहर का कोई पुराना, वीरान पड़ा बंद मॉल हो, जहां पहले कभी भीड़ उमड़ती थी, लोग शॉपिंग और खाने-पीने जाते थे और हर तरफ चहल-पहल रहती थी, पर अब वहां किसी के कदमों की आवाज तक नहीं आती। अब वहां दरवाजों पर ताले लगे हो, लिफ्टें जंग खा रही हैं, फूड कोर्ट की मेजें धूल में ढकी हैं और बड़े-बड़े शो-रूम खाली पड़े हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि ऐसे ही ‘घोस्ट मॉल’ से हर साल करीब 357 करोड़ रुपये का किराया कमाया जा सकता है।
प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी कंपनी नाइट फ्रैंक इंडिया ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें उसने देश के 32 शहरों में 365 शॉपिंग सेंटरों में से 74 की पहचान ‘घोस्ट मॉल’ (वीरान/खाली मॉल) के रूप में की है। हालांकि, मैसूरु, विजयवाड़ा, तिरुवनंतपुरम, विशाखापत्तनम और वडोदरा ऐसे शहर हैं जहां के शॉपिंग सेंटर लगभग भरे हैं, जहां से अच्छा किराया मिल रहा है।
लोग सोचते हैं कि घोस्ट मॉल सिर्फ छोटे शहरों में होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है।
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रिपोर्ट में कुछ शहरों की तारीफ की गई है, जहां मॉल लगभग पूरी तरह भरे हुए हैं:
इन शहरों में नया मॉल बहुत सोच-समझकर बनाया गया, इसलिए ग्राहक भी यहां जमकर आ रहे हैं।
दूसरी तरफ कुछ शहरों में आधे से ज्यादा मॉल खाली पड़े हैं:
यहां बहुत सारे मॉल एक साथ बना दिए गए, लेकिन ब्रांड्स और ग्राहक की संख्या नहीं बढ़ पाई।
नाइट फ्रैंक के चेयरमैन शिशिर बैजल ने कहा, “भारत का रिटेल सेक्टर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। लोग अब अच्छे मॉल में ही जाना पसंद करते हैं। पुराने मॉलों को अगर नया लुक दिया जाए और अच्छे ब्रांड्स को लाया जाए, तो बात बन सकती है। साथ ही को-वर्किंग स्पेस या कम्युनिटी सेंटर बढ़ाने पर भी इसमें दोबारा चमक देखी जा सकती है। सिर्फ 15 मॉल ठीक करने से ही 357 करोड़ रुपये सालाना किराया आ सकता है। ये डेवलपर्स और निवेशकों के लिए बड़ा मौका है।”