दवा विनिर्माण इकाइयों के लिए अच्छी विनिर्माण प्रथा (जीएमपी) का अनुपालन करने की समय सीमा इस महीने समाप्त होने जा रही है। मगर देश में मौजूद 8,500 एमएसएमई दवा विनिर्माताओं में से करीब 1,700 इकाइयों द्वारा ही जीएमपी मानकों का अनुपालन किए जाने का अनुमान है।
उद्योग विशेषज्ञों ने बताया कि लगभग 2,000 इकाइयों के पास डब्ल्यूएचओ- जीएमपी प्रमाण पत्र पहले से ही मौजूद हैं। इसका मतलब यह है कि शेष 6,500 एमएसएमई इकाइयों में से 25 से 26 फीसदी इकाइयां ही संशोधित अनुसूची एम का अनुपालन कर पाएंगी।
उद्योग के सूत्रों के अनुसार, फार्मा इकाइयों द्वारा खामियां पहचानकर उन्नयन योजनाएं पेश किए जाने में गुजरात एवं महाराष्ट्र जैसे राज्य अग्रणी रहे हैं जबकि हिमाचल प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश पीछे रहे हैं।
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘अनुपालन के मामले में गुजरात ने शानदार प्रदर्शन किया है। वहां की 647 में से 639 एमएसएमई इकाइयों ने सफलतापूर्वक उन्नयन योजनाएं प्रस्तुत की हैं जो करीब 98.8 फीसदी दर है।’
अधिकारी ने कहा कि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दवा विनिर्माण की अधिक गतिविधियां वाले राज्यों में भी ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स ऐक्ट के संशोधित अनुसूची एम के अनुरूप उन्नयन में इकाइयों की दिलचस्पी देखी गई है। उन्होंने कहा, ‘दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश में 650 से अधिक दवा विनिर्माण इकाइयों में से महज 116 ने ही अनुपालन की प्रक्रिया शुरू की हैं।’
सालाना 250 करोड़ रुपये अथवा इससे कम कारोबार वाली सूक्ष्म एवं लघु दवा कंपनियों को संशोधित अनुसूची एम का अनुपालन करने के लिए 31 दिसंबर, 2025 तक एक वर्ष का विस्तार दिया गया था। मगर यह विस्तार आवेदकों द्वारा खामियां पहचानने और मई 2025 तक दवा नियामक के साथ अपनी अनुपालन रणनीति की रूपरेखा के साथ आवेदन दाखिल करने पर निर्भर था। भारत में लगभग 10,500 दवा विनिर्माण इकाइयां हैं और इनमें से करीब 8,500 इकाइयां एमएसएमई श्रेणी में आती हैं।
टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी ऋषि अग्रवाल ने कहा, ‘शेष 6,500 कंपनियों में से करीब 1,700 इकाइयों यानी महज 26.15 फीसदी इकाइयों ने विस्तारित समय-सीमा हासिल करने के लिए अपनी खामियां और उन्नयन योजनाएं सफलतापूर्वक प्रस्तुत की हैं।’
करीब दो-तिहाई लघु दवा विनिर्माण इकाइयां यानी करीब 4,300 एमएसएमई अनुपालन के लिए आवश्यक पहल करने में विफल रही हैं। करीब 60 फीसदी एमएसएमई इकाइयों ने अब तक अपनी योजनाएं प्रस्तुत नहीं की हैं। ऐसे में आगामी जनवरी से शुरू होने वाले निरीक्षण के बाद उनकी इकाइयां बंद हो जाएंगी।
दिल्ली औषधि नियंत्रण विभाग के एक अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘हम अनुपालन की जांच के लिए जनवरी 2026 में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ संयुक्त निरीक्षण शुरू करेंगे। अगर कोई इकाई अनुपालन नहीं करती है तो किसी भी सूरत में हम उसे परिचालन की अनुमति देने के मूड में नहीं हैं।’ अनुपालन न करने वाली इकाइयों के बंद होने से घरेलू बाजार में दवाओं की आपूर्ति बाधित होने की संभावना नहीं है। मगर रोजगार पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बाजार विश्लेषण फर्म फार्मा रैक की उपाध्यक्ष (वाणिज्यिक) शीतल सापले ने कहा, ‘सालाना 250 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाली कंपनियां कुल मिलाकर भारतीय औषधि बाजार में महज 7 फीसदी योगदान करती हैं। इनमें से कुछ पुरानी एवं स्थापित कंपनियां हैं जो खास श्रेणियों पर केंद्रित हैं और इसलिए उनका टर्नओवर कम है।’
सापले ने कहा कि एमएसएमई के खिलाफ सरकारी कार्रवाई से दवा की उपलब्धता या स्थापित छोटी कंपनियों पर कोई खास असर पड़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि ये पहले से ही जीएमपी मानदंडों का अनुपालन कर रही हैं।
अग्रवाल ने कहा कि दवाओं की आपूर्ति में किसी भी अस्थायी व्यवधान को भारत अपनी व्यापक विनिर्माण क्षमता के जरिये निपट लेगा। उन्होंने कहा, ‘समय के साथ-साथ जीएमपी प्रमाणन वाली अनुबंध विनिर्माण इकाइयों का उदय हो सकता है। इससे छोटी कंपनियों के लिए फॉर्मूलेशन का स्वामित्व रखने, उत्पादन को आउटसोर्स करने और उसके बाद भी लाभप्रद बने रहने की गुंजाइश होगी।’
उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियों की वृद्धि भविष्य में रोजगार के नुकसान की भरपाई भी कर सकती है। बड़ी दवा कंपनियां और अनुबंध विनिर्माता अपने कारोबार का विस्तार कर सकते हैं।
साल 2022 में अधिसूचित संशोधित अनुसूची एम मानकों के तहत सभी दवा इकाइयों को सख्त गुणवत्ता नियंत्रण अपनाने की जरूरत है। इसमें संदिग्ध या दोषपूर्ण पाए गए उत्पादों को बाजार से वापस मंगाने के लिए एक दमदार व्यवस्था भी शामिल है। अग्रवाल ने कहा, ‘हमारा अनुमान है कि इसे लागू करने में औसतन चार से छह महीने लगेंगे। उन्नयन की लागत इकाई के आकार, उत्पादन आदि के आधार पर 50 लाख से 2.5 करोड़ रुपये तक हो सकती है।’
एमएसएमई उद्योग के संगठन का कहना है कि कई छोटी कंपनियों को पूंजी के अभाव के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
छोटी दवा विनिर्माताओं के संगठन कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री (सीआई पीआई) के चेयरमैन आर के जैन ने कहा, ‘सभी तरह के उन्नयन के लिए कम से कम 2 करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश की जरूरत होगी। इसमें अतिरिक्त भूमि, आवश्यक सुविधाएं और कर्मचारियों का प्रशिक्षण शामिल हैं।’