Crude Oil Price: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिख रहा है। सोमवार को ब्रेंट कच्चा तेल करीब 8 प्रतिशत बढ़कर 78 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। पिछले एक सप्ताह में तेल की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। इसकी मुख्य वजह अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता टकराव माना जा रहा है।
दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल स्ट्रेट ऑफ होरमुज से होकर गुजरता है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी मार्ग से आता है। ऐसे में इस रास्ते पर किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकती है। रिपोर्टों में कहा गया है कि इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। हालांकि इसे पूरी तरह और लंबे समय के लिए बंद किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की सप्लाई कितने समय तक और कितनी ज्यादा प्रभावित होती है, उसी से आगे कीमतें तय होंगी।
जेएम फाइनेंशियल के विश्लेषकों का कहना है कि अगर तनाव ज्यादा नहीं बढ़ता, तो तेल की कीमतें 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल तक और बढ़ सकती हैं। अगर ईरान के तेल ठिकानों को नुकसान होता है, तो कीमतें 10 से 12 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं। अगर स्ट्रेट ऑफ होरमुज में बड़ी रुकावट आती है, तो तेल 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है। और अगर पूरे क्षेत्र में बड़ा युद्ध छिड़ जाता है, तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ज्यादा हो सकती हैं।
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इतिहास बताता है कि 1973-74 के योम किप्पुर युद्ध और अरब तेल प्रतिबंध के दौरान तेल की कीमतों में सबसे बड़ी उछाल आई थी। उस समय कीमतें 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 डॉलर प्रति बैरल हो गई थीं, यानी करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि देखने तो मिली थी। दूसरी बड़ी तेजी 1978-80 के दौरान ईरान की क्रांति के समय दर्ज की गई, जब तेल 14 डॉलर से बढ़कर लगभग 39 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। इसके अलावा ईरान-इराक युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक युद्ध के दौरान भी कीमतों में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई थी।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे महंगाई बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है। एमके ग्लोबल के अनुसार, ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से डीजल करीब 0.52 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल करीब 0.55 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है।
यदि तेल 10 डॉलर प्रति बैरल महंगा होता है तो चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले लगभग 0.5 प्रतिशत बढ़ सकता है। खुदरा महंगाई में करीब 0.35 प्रतिशत और थोक महंगाई में लगभग 1.30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। आर्थिक वृद्धि दर पर 0.15 से 0.20 प्रतिशत तक असर पड़ने का अनुमान है।
एमके ग्लोबल की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा के अनुसार, 65 डॉलर प्रति बैरल के अनुमान के मुकाबले यदि कीमतें 10 डॉलर ज्यादा रहती हैं, तो इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अतिरिक्त बोझ सरकार, तेल कंपनियां और उपभोक्ता किस तरह साझा करते हैं।