facebookmetapixel
Advertisement
NPS में एसेट एलोकेशन और निकासी के विकल्प: करार में दी गई शर्तें पूरी होने पर ही कर सकेंगे एन्युटी सरेंडरEditorial: जियो-एनएसई के मेगा आईपीओ से बदलेगी बाजार की तस्वीरडेटा सेंटर क्षमता बढ़ाए बिना पूरा नहीं होगा एआई का बड़ा सपनासत्ता से नहीं, विचारधारा से कायम रहती है दलों की एकजुटतावैश्विक उथल-पुथल खत्म होने के बाद मजबूत वृद्धि की उम्मीद: IFSCA चीफ के राजारामनबाजार हलचल: जियो प्लेटफॉर्म्स पर मेटा, गूगल का दांव; IPO के लिए व्यस्त सप्ताहडिफेंस ऑर्डर और ट्रक कारोबार की मजबूती से भारत फोर्ज का शेयर रिकॉर्ड ऊंचाई परफैक्ट्री नहीं, फिर भी ₹400 करोड़ का कारोबार; HRV फार्मा का वर्चुअल API मॉडल बना नई मिसाल पश्चिम एशिया संघर्ष का असर: भारत में स्टार्टअप फंडिंग 43% घटी, निवेशक हुए सतर्कFPI नियमों की समीक्षा करेगा सेबी, विदेशी निवेशकों को मिल सकती है राहत

रद्दी में उछाल से न्यूजप्रिंट कंपनियां बेहाल

Advertisement
Last Updated- December 07, 2022 | 5:42 PM IST

मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में रद्दी कागज की कीमतों में 30 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी होने से न्यूजप्रिंट उत्पादकों में बेचैनी देखी जा रही है।


जानकारों के मुताबिक, न्यूजप्रिंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले लगभग सभी कच्चे मालों मसलन लुग्दी, कोयला और बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन सबसे ज्यादा वृद्धि रद्दी कागज की कीमतों में ही हुई है जिससे न्यूजप्रिंट उत्पादक काफी परेशान हैं।

फिर भी उत्पादक उम्मीद कर रहे हैं कि अगली तिमाही के लिए न्यूजप्रिंट की कीमतें निर्धारित करने से पहले कच्चे माल की कीमतें नरम पड़ जाएंगी। रमा न्यूजप्रिंट और पेपर्स लिमिटेड (आरएनपीएल) के कार्यकारी निदेशक वी.डी. बजाज के अनुसार, पिछली तिमाही में एक टन रद्दी कागज के लिए 7 से 8 हजार चुकाना पड़ता था।

इस तिमाही का हाल यह है कि एक टन रद्दी कागज की कीमत अब तकरीबन 1.5 गुना होकर 11 से 12 हजार रुपये हो चुकी है। बजाज ने बताया कि एक टन न्यूजप्रिंट तैयार करने में लगभग 1.35 टन रद्दी कागज की खपत होती है। इस तरह, न्यूजप्रिंट की लागत केवल रद्दी कागज के महंगे होने से लगभग 5,400 रुपये प्रति टन तक बढ़ चुकी है।

मालूम हो कि आरपीएनएल हरेक साल लगभग 1.8 लाख टन रद्दी कागज का इस्तेमाल करता है। कंपनी के मुताबिक, रद्दी कागज की कुल खपत के आधे का आयात किया जाता है। हालांकि, अखबार के खरीदारों के लिहाज से मौजूदा स्थिति थोड़ी बेहतर है।

अब जहां पुराने अखबारों के बदले इन्हें 5 से 6 रुपये प्रति किलो की बजाय 8 से 9 रुपये प्रति किलो तक मिल जा रहे हैं, वहीं अखबारों की कीमत में अब तक कोई वृद्धि नहीं हुई है। पिछली तिमाही में विदेश से मंगाए जा रहे एक टन रद्दी की कीमत 240 डॉलर थी तो इस तिमाही में इसके लिए 300 डॉलर चुकाए जा रहे हैं। इस तरह, आयातित रद्दी कागज की कीमत में 25 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है।

फिलहाल इसके आयात पर 5 फीसदी का आयात शुल्क अदा करना पड़ रहा है तो तैयार न्यूजप्रिंट पर 3 फीसदी का कर उत्पादकों को चुकाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की तुलना में डॉलर के मजबूत होने से भी इसका उत्पादन थोड़ा महंगा हुआ है।

बजाज ने बताया कि इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसियशन ने बजट से पहले सरकार से अनुरोध किया था कि रद्दी कागजों के आयात पर लगने वाले शुल्क को 5 फीसदी से घटाकर शून्य फीसदी कर दिया जाए। लेकिन दुर्भाग्यवश सरकार ने इस अनुरोध को नहीं माना।

Advertisement
First Published - August 19, 2008 | 1:29 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement