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बजट में ऋण प्रबंधन के संकेत संभव

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Last Updated- December 12, 2022 | 9:46 AM IST

भारत सॉवरिन रेटिंग में कटौती का सामना नहीं कर सकता है क्योंकि उसका ऋण और सकल घरेलू अनुपात (जीडीपी) का अनुपात चालू वित्त वर्ष में 90 फीसदी पर पहुंचने के आसार हैं और अगले वित्त वर्ष में भी राजकोषीय विस्तार की मांग कारण देनदारी उच्च बनी रह सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने चेताया है कि अर्थव्यवस्था के एक बार अपने सामान्य स्थिति में लौट जाने के बाद ऋण प्रबंधन का एक भरोसेमंद प्रारूप होना चाहिए। उन्होंने इसकी उम्मीद जताई कि आगामी बजट में उस प्रारूप के बारे में कुछ संकेत मिल सकते हैं।
केंद्र सरकार का ऋण पहले ही चालू वित्त वर्ष में 30 सितंबर को जीडीपी के 56.2 फीसदी के स्तर को छू लिया था जो 2019-20 के अंत में 46.5 फीसदी रहा था। यह उल्लेखनीय है कि जीडीपी के अनुपात के रूप में ऋण के आकलन के लिए 2019-20 की दूसरी छमाही में रही अर्थव्यवस्था के आकार पर भी विचार किया गया था और इसलिए चालू वित्त वर्ष के अंत में ऋण बहुत अधिक हो सकता है क्योंकि देनदारी में और वृद्घि हुई है और अर्थव्यवस्था में संकुचन आया है। औपचारिक तौर पर चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था में मौजूदा कीमत पर 4.2 फीसदी का संकुचन आने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
मार्च 2020 को राज्यों की बकाया देनदारी 25.8 फीसदी थी। यदि कोई संरक्षणवादी रुख को अपनाते हुए माने कि चालू वित्त वर्ष में सितंबर के अंत के रुझान को जारी रखा गया है तो केंदद्र और राज्यों की बकाया देनदारी पहले ही 80 फीसदी को पार कर चुकी होगी। यह उल्लेखनीय है कि भारत का ऋण सीधे सीधे केंद्र और राज्यों के ऋण का योग नहीं है क्योंकि उसमें कुछ निश्चित अतिव्यापी मदें हैं।
भारत के ऋण और जीडीपी के अनुपात के कई सारे अनुमान हैं जिनमें करीब करीब सभी में यह आमराय है कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह 80 फीसदी से ऊपर होगा। यह 90 फीसदी के करीब भी जा सकता है। उदाहरण के लिए, फिच रेटिंग्स में सॉवरेन रेटिंग्स के निदेशक थॉमस रूकमाकर ने अनुमान जताया है कि यह जीडीपी का 89 फीसदी रह सकता है जबकि भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने इसे 87.6 फीसदी पर रहने का अनुमान जताया है।
ब्रिकवर्क रेटिंग में मुख्य आर्थिक सलाहकार एम गोविंद राव का कहना है कि सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद कर्ज की निरंतरता को लेकर सरकार के कदम अहम हैं। उन्होंने कहा, ‘ऐसे में सरकार के लिए यह अहम है कि एफआरबीएम (वित्तीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन) अधिनियम में संधोधन करे और 2022-23 से राजकोषीय समेकन का खाका तैयार करे।’ उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें खाका तैयार करने में दिशा दिखा सकती हैं। फरवरी 2020 में बजट दस्तावेजों के साथ पेश मध्यावधि राजकोषीय नीति और राजकोषीय नीति की रणनीति संबंधी बयान में अनुमान लगाया गया ता कि 2020-21 में केंद्र का कर्ज जीडीपी का 50.1 प्रतिशत रहेगा।
सभी 3 वैश्विक रेटिंग एजेंसियों स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स, फिच रेटिंग और मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारत को न्यूनतम निवेश ग्रेड में रखा है। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग में एशिया प्रशांत के अर्थशास्त्री विश्रुत राणा ने कहा कि विश्व के उभरते देशोंं की तुलना में राजकोषीय नीति से भारत का समर्थन अभी उल्लेखनीय रूप से नीचे है। राणा ने कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि उपभोक्ताओं का व्यय धीरे धीरे बढ़ रहा है, जबकि बाहरी मांग तेज बनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी वृद्धि में रिकवरी 10 प्रतिशत तक होगी।’
मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने इस मसले पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है।

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First Published - January 14, 2021 | 11:04 PM IST

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