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लेखक : आर जगन्नाथन

आज का अखबार, लेख

आम चुनाव में जीत की गारंटी कभी थी ही नहीं

वर्ष 2024 के आम चुनाव में मोदी की संभावित जीत को लेकर कई आलेख और यहां तक कि किताबें भी लिखी गईं। यह सब चुनाव होने के पहले हुआ और अब हम कह सकते हैं कि ऐसे दावे करने वाले काफी हद तक गलत थे। देश में जिस हद तक सामाजिक और आर्थिक समस्याएं व्याप्त […]

आज का अखबार, लेख

नई सरकार के गठन के बाद की चुनौतियां…

चुनाव के बाद चाहे जो भी सरकार बने, उसे कुछ अहम समस्याएं हल करने के लिए काम करना होगा। जनगणना के बाद परिसीमन, महिला कानून और रोजगार की समस्या प्रमुख हैं। बता रहे हैं आर जगन्नाथन चार जून को लोक सभा चुनाव (Lok Sabha Elections) नतीजों में चाहे जिसकी जीत हो, अगली सरकार के सामने […]

आज का अखबार, लेख

द्वैत दृष्टिकोण की नाकामी और बदलती दुनिया

दुनिया अब ऐसे युग में प्रवेश कर रही है जहां वे बातें कारगर साबित नहीं होंगी जिन्हें महज कुछ दशक पहले तक हम हल्के में लेते थे। हर जगह लोकतंत्र खतरे में नजर आ रहा है और इसकी परिभाषा भी कुलीनों की सहमति पर आधारित है। माना जाता है कि हिंसा और शक्ति पर सरकार […]

आज का अखबार, लेख

लोकसभा चुनाव के बाद सुधारों पर बने सहमति

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दशक भर लंबे शासन और मौजूदा सरकार के बहुमत वाले दस वर्ष के शासन से एक बड़ा सबक निकला है: समयबद्ध और सुविचारित आर्थिक सुधार दोनों ही परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण हैं। यह सही है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले दस वर्षों में मनमोहन सिंह के दशक की तुलना में […]

आज का अखबार, लेख

Opinion: यूपी के आर्थिक उभार को धार्मिक पर्यटन की धार

सन 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही भारत नियति के साथ एक नए साक्षात्कार की राह पर है। मंडल राजनीति के उभार और राम जन्मभूमि आंदोलन की इसमें अहम भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 1998 से 2004 के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पहले कार्यकाल के दौरान दोनों के बीच […]

आज का अखबार, लेख

बेहतर होगा राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान

पश्चिमी देशों की ‘सार्वभौमिकता’ की अवधारणा साम्राज्यवाद का ही पुराना रूप है जिसे नए कलेवर में पेश किया जा रहा है जो संदिग्ध प्रतीत होता है। बता रहे हैं आर जगन्नाथन वामपंथी-उदारवादियों को भले ही यह बात पसंद न हो लेकिन लगभग हर जगह राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान हो रहा है। राष्ट्रवाद के पहले चरण की […]

आज का अखबार, लेख

सामाजिक न्याय की आड़ में हकीकत पर पर्दा डालना गलत

सामाजिक न्याय का झंडाबरदार बनने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कोई आपकी जवाबदेही तय नहीं करेगा और आपके सुझाए समाधान नाकाम रहने पर भी सवाल-जवाब नहीं करेगा। सामाजिक न्याय का विषय उठाने के लिए सबसे पहले आपको कुछ आंकड़े प्रस्तुत करने होंगे ताकि किसी खास पक्ष या समूह की तरफ इनका झुकाव साबित […]

आज का अखबार, लेख

लोकतंत्र, एक राष्ट्र-एक चुनाव और सरकार

दुनिया के लोकतंत्र लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विशेषकर, यह कथन दुनिया के उन लोकतांत्रिक देशों की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में सटीक हैं, जहां राजनीतिक एवं बुद्धिजीवी अब भी लोकतंत्र में निष्ठा व्यक्त करते हैं। लोकतांत्रिक देश तभी अपना अस्तित्व बचाए रख सकते हैं जब वे स्वयं का […]

आज का अखबार, लेख

जलवायु परिवर्तन पर घबराहट नहीं तार्किक समाधान की जरूरत

जलवायु परिवर्तन हमें एक नए प्रकार के ध्रुवीकरण की तरफ ले जा रहा है। यह विषय विचारधारा के टकराव का रूप ले चुका है और वामपंथी विचार वाले जलवायु आपातकाल घोषित करने की मांग कर रहे हैं, परंतु दक्षिणपंथी सोच रखने वाले ऐसी किसी पहल के विरोध में तर्क दे रहे हैं। अमेरिका में डेमाक्रेटिक […]

आज का अखबार, लेख

Opinion: अर्थव्यवस्था के लिए केंद्र में यथास्थिति क्यों जरूरी ?

केवल नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने के उद्देश्य से बना गठबंधन अर्थव्यवस्था रूपी पोत को सही दिशा में खेने का सही उपाय नहीं है। बता रहे हैं आर जगन्नाथन जिस किसी व्यक्ति ने यह कहा था कि अच्छी राजनीति से अच्छी आर्थिकी तैयार होती है या इसका उलटा होता है, उसे अपने मस्तिष्क […]

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